एक पतित पति (जापानी) के नोट्स..
कभी-कभी समझ नहीं आता मैं किधर देख रहा हूं.. या सोच रहा हूं.. दफ़्तर में बोनितो के उलाहने के पीछे क्या चाल छुपी थी की बात सोचते हुए अपने बड़े बेटे कदोमा की पढ़ाई के खराब नतीजे की सोचने लगता हूं.. और अभी यह मसला दिमाग में सुलटा भी नहीं होता कि बैंक वाले फ़ोन करके क्यों बुला रहे हैं की बात परेशान करने लगती है.. और अभी बैंकवाला क़िस्सा साफ़ नहीं होता कि बीवी नात्सुको बीमार पड़ी क्यों मेरी जान खा रही है की चिंता खौलाने लगती है.. या बीच सड़क ट्रक से लड़ाने!.. जो अभी होते-होते एकदम-से रह गया!.. चार सेकेंड की और देर होती और बीमार नात्सुको की जगह अपनी ओर गिरे आ रहे तीन सौ गैलन वाले निस्सान ट्रक का नहीं सोच लिया होता तो यहीं सड़क पर मेरी समाधि बन जाती?..
तेजी से आगे निकल गए ट्रक को इतमिनान से मां-बहन की सुनाने और एक पुलिसवाले को अपनी ओर आता देख उतनी ही तेजी से एक लेन में खिसक लेने के बाद मैं नात्सुको की जगह डोंबुरी से भरे एक बाउल की सोचने लगता हूं.. साथ में साशिमि और सुकीयाकी का भी एक-एक प्याला मिल जाये तो क्या कहने!.. मगर यह सब अकेले बाहर खा लूं इतने पैसे कहां हैं? यही झमेला है घर में इतने झमेले रहते हैं कि वहां पहुंचते ही भूख मर जाती है.. और बाहर भूख के डमरू बजते हैं तो जेब में पैसा नहीं बजता!..
अगले सेमिस्टर कदोमा का रिज़ल्ट खराब हुआ तो उसे लात मारके घर से बाहर कर दूंगा.. जा साले, सड़क पे भीख मांग? होश ठिकाने आ जायेंगे हीरो के! लेकिन नात्सुको के क्यों नहीं आ रहे? बीमार पड़-पड़के क्या दिखाना चाहती है? चाहती क्या है कि चौबीस घंटे घर पड़ा मैं उसकी देखभाल करूं?.. कल पड़ा तो था घर में.. नात्सुको भी बाजू में गिरी पड़ी थी.. चेहरे का रंग उड़ गया है.. देह पर ज़रा भी मांस नहीं बचा.. उसके साथ सोने के ख़्याल तक से अब ऊबकाई आती है! पता नहीं मेरे बारे में यह औरत कुछ सोचती क्यों नहीं.. ठीक है कि कल बच्चों के अलग हटते ही मेरे बालों में हाथ फेरती रही थी लेकिन सेक्स? वो क्या मैं अब बाहर जाके पाऊंगा? और उसके पैसे कौन नात्सुको का बाप देगा? उसका भाई भी देने की हालत में नहीं.. उसकी भी साले की भिखमंगों वाली हालत हो गई है!.. पता नहीं क्यों बाहर के लोगों को लगता है जापान में बहुत पैसा है.. उन्हें एक दिन के लिए मेरे घर आकर देखना चाहिए! काइतो और काकु भी हर घड़ी अपनी मां के किमोनो से लगे रोते-कलपते रहते हैं! भुक्खड़ों को जैसे कभी खाने को नहीं मिलता! नहीं ही मिलता होगा लेकिन तो मैं क्या करूं?..
नाकानो से निकलकर अभी नरिमा पहुंचा ही था कि घर से कदोमा का फ़ोन आ गया.. कि भागके आओ, मां मर रही है!.. ये साली ज़िंदगी कहीं जो चैन लेने दे! और वह औरत भी रोज़ मरती रहती है.. ऐसा नहीं कि एक दिन मरके छुट्टी दे दे?..
नात्सुको को गालियां बकता, झींकता घर पहुंचा तो वहां पहले से ही काउंटी का बूढ़ा डाक्टर एक जवान नर्स के साथ पहुंचा हुआ था. नर्स देखने में बुरी नहीं थी, और मैं वही देख रहा था, कि बुड्ढा डॉक्टर मेरी जान खाने लगा- कि इसे सम्भालो.. इसकी (माने नात्सुको की) आंख लग गई तो ये बचेगी नहीं! एम्बुलेंस आने तक इसे किसी तरह से जगाये रखो.. कुछ करो! मैं क्या करता, सब नात्सुको ही कर रही थी? ज़मीन पर आंखें झपकाती ऐसे कराह रही थी मानो महीने भर से किसी ने सोने न दिया हो! जबकि बुड्ढा कह रहा था सोओ मत, सोओ मत!- और यह हरामख़ोर आंख मूंदने से बाज नहीं आ रही थी! और गंजी-कच्छे में इधर-उधर गिरे-लेटे बच्चे घर की गरीबी का अच्छा पोस्टर बनाये हुए थे! मैं क्या करता- डॉक्टर से झगड़ता या अपनी बेवकूफ़ बीवी से? अदबदा के नात्सुको पर बरसना शुरू किया- तू कर क्या रही है, हरामी.. बीच दिन झपकी ले रही है? लाज-शरम सब धोके पी गयी है, बदकार? बच्चे यहां भूखे मर रहे हैं और तू नींद ले रही है? उठके सबके लिए सुशी बना, चल?..
मेरा हड़काना था, बच्चे रोने लगे.. मगर बदकार औरत एकदम-से पटरी पर आ गयी! कराहते-कराहते किसी तरह उठी, चावल, सब्जी बाहर किया, विनेगर की बोतल बाहर की, सुशी तैयार किया.. फ़र्श पर प्लास्टिक सजायी, खाली बाउल लगाये.. बच्चे चिंहुकते हुए सुशी पर टूटे.. और मुझको भी भूख लगी ही थी.. बुड्ढे डाक्टर को समझ नहीं आ रहा था कि मामला हो क्या रहा है.. जबकि मुझे खूब समझ आ रहा था.. अंदर-अंदर नात्सुको भी समझ रही थी.. बेचारी के चेहरे पर कितना संतोष था कि बच्चे आखिरकार खाना खा रहे हैं.. और अपने हाथ का मुझे खिलाकर तो बेवकूफ़ को हमेशा खुशी होती ही है.. मैंने भी लड़ियाने वाले अंदाज़ में कहा- आज सुशी बुरा नहीं बना! नात्सुको के चेहरे पर कैसी तो खुशी तैर गई.. और उसी क्षण भद्द से वह एक ओर कटे कुम्हड़े की तरह गिर भी पड़ी.. बुड्ढा झपटकर उस पर गिरा.. बेवकूफ़ ने घबराकर मुझे इत्तिला की- कि आपकी पत्नी हैज़ जस्ट पास्ड अवे!
बच्चे इस खबर को सुनते ही भां-भां रोने लगे.. मुझे भी बात अजीब लगी.. लेकिन जो भी लगना था वह सुशी का बाउल खत्म करके ही मैं लगाना चाहता था.. रोते हुए बच्चों में से भी किसी ने अपना बाउल हटाकर अलग नहीं किया..


5 कमेंट:
हँ सूँ कि रो ऊँ !!
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बदकार औरतें .....एक ही बार में
नहीं मरतीं
करती हैं नाटक मरने का हर रोज़
मरते- मरते भी उठ कर
बना लाती है भर भर बाउल
सुशी
पर मर-मिट कर भी नही दे पातीं
एक अदद आदमी को
भर-पेट खुशी !!
क्या कहें, कुछ सूझ ही नहीं रहा. कहेंगे भी तो रेशम में टाट के माफिक ही लगेगा. सो कहते कुछ नहीं, बस करते हैं: सलाम! वो भी झुक कर.
अरे यह है असली पतनशील पोस्ट...
पतनी भी है ...सुशी(ल) भी है, ...और पतित पति के हाथों पतन भी हो रहा है...
मुन्शी जी की 'कफन याद आ गई'
ठगिनी क्यों नैना झमकावै ठगिनी....
मुंशी प्रेमचंद की कफन याद आ गई। द्विवेदी जी को हमसे पहले याद आई। घीसू भी दिखा और दम तोड़ती बुधिया भी नज़र आई...
सदानंद...सदानंद...
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