Sunday, March 16, 2008

किस चिरकुट ने कहा होली आती है..?

किसने कहा.. शायद आपके लिए आ रही हो? या आपकी पटाखा पड़ोसन के लिए?.. हमारे अज़ीज़ बंशीधर चौबे और कयामत अली के लिए तो नहीं ही आ रही है.. आखिरी मर्तबा कभी आई होगी तो उसे लंबा ज़माना हुआ.. क्‍या मालूम तब के. आसिफ साहेब ने अनारकली के रोल के लिए मधुबाला को पक्‍का किया था या नहीं.. या जनाब राजेश खन्‍ना साहब किस कक्षा में थे.. या कच्‍छे में भी थे या नहीं.. कहने का मतलब आखिरी मर्तबा के बाद जीवन के दूसरे मर्तबे आते हैं.. ऐसे मौके भी आते हैं कि कयामत और बंशीधर बाबू की बाख़ साहेब चिरकुटई संगत करें.. बैकग्राउंड में किसी लतखोर ठुमरी ठेलवैये को भी सिर झुकाये झेल जायें!.. जो इस मुगालते में रहते हैं कि यह आता और वह नहीं आता उनके हिस्‍से और कुछ भले आये, समझदारी नहीं आती.. और आती है तो वैसी ही आती है कि हमारे क़ि‍स्‍से उनकी समझ में न आ सकें!.. मगर ऐसी आती है? होली? कमअज़कम बंशीधर चौबे और कयामत अली तो कुछ ऐसा ही बता रहे हैं...

6 comments:

  1. हमने तो नहीं कहा होली है। वैसे आप जब जामुन के पेड़ पर कटहल खा रहे थे तो लग रहा था होली आ गयी।

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  2. बढिया है जी , आनंद आ गया !

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  3. जामुन के पेड़ पर कटहल? गलत लिख गया है उ होता है कटहर कटहर का कोआ मुझे बहौत भाता है, वैसे ये आदत ठीक नहीं नहीं कि घर में आप रबड़ी खाते खाते टुमरी सुनना चाहते हैं...हुर्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्त्र्र्र्र्र्र होली हय्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य.

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  4. हाय!अल्लाह
    कभी तो ऐसी पोस्ट लिखिए, जो हम समझ कर टिपिआएं।

    वैसे हम भी यहाँ शपथपत्र देने आए थे कि हमने भी नही कहा कि होली आ गयी है। हम पर कोई झूठा इल्जाम ना लगाए।

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  5. क़यामत की खुशी नसीब में - चप्पल चुराके आगरे के नागरे करीब में - कटहल का अचार, काली काली जामुन के बीच में - रबड़ी जलेबी नहीं पूंछता तो सुलाकी की खोया गुझिया ही पूछ लेता होली में - आप सई कहते हो - भोंपू में बोला - आमीन

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  6. ये ठुमरी ठलवैया कौन है ?

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