Monday, March 17, 2008

एज़ पर..



पता नहीं क्‍या बात है क्‍यों है ऐसा, कहीं भी जाता हूं वापस एज़ पर चला आता हूं. तुम कहती हो संभल सकते हो, बचके चल सकते हो, मैं अविश्‍वास में पलकें झपकाता सुनता हूं, खुशी-खुशी बहलता हूं हल हल हललता हूं. मगर ज़्यादा वक़्त नहीं होता फिर कहीं लुढ़कता, पैंट झाड़ता सिहरता सकपकाया खड़ा होता हूं. तुम मुस्‍कराकर कहती हो हद है, दुनिया-ज़हान की इतनी ज़मीन है और तुम खड़े नहीं हो पा रहे हो. सबकी आंखों में मुझे छोटा बना रहे हो! तुम चोट खायी एक नज़र देखती उंगलियों से इत्‍ता-सा छू लेती हो, मैं पेड़ की फुनगी पर फाहे की तरह उड़ने लगता हूं. अनजानी ज़बानों में रेंकने जाने कैसी-कैसी स्निग्‍धताओं में स्‍वयं को सेंकने लगता हूं. तुम नेह में उमड़ती मुझे बहुत दूर रखकर बहुत करीब लाती हो, हल्‍के-से फूंक देती हो, मैं हवा में अलबलाने लगता हूं. पैर ऊपर सिर नीचे बजाने लगता हूं. जाने कैसा दिन होता है कैसी रात, एज़ से छूटकर निकला वापस एज़ पर आता हूं.

(ऊपर की तस्‍वीर: डेविड जे नाइटिंगेल)

3 comments:

  1. आप तो एज पर हैं पर उनका जो कहीं नहीं हैं,मेरे जैसे लोग उनके बारे में कुछ लिखियेगा?वैसे गद्य कवित्त का लिखने में आप लाजवाब लिखते हैं मित्र।

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  2. हाथ फैला के, पंजे के बल, आँख ऊंची और बादल ?

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