Tuesday, March 18, 2008

देश सही जा रहा है..

लोग कमा रहे हैं. तेल-साबुन लगा रहे हैं. गांव से छूट-छूटकर शहर आ रहे हैं. हैसियत बनती है तो गोल बना रहे हैं, वर्ना खाने की पुरानी आदत है लात खा रहे हैं. जो थेथर हैं जमे हुए हैं (ज़्यादा थेथर ही हैं, ज़िंदगी ने बना दिया है); हाथ में रोटी आने पर अब भी जिनकी चमकती है आंखें, ऐसे बकिया ग़लत गा‍ड़ि‍यों पर चढ़कर वापस गांव भी आ रहे हैं! गांव की धरती ‘सोना उगले, उगले हीरा-मोती’ की लीक पर उबल रही है. बहुत सारे गांववाले जल रहे हैं. ज़मीनों के भाव बढ़ रहे हैं. पूरी दुनिया का यही हाल है. लात खायी दुनिया के मूर्ख, ज़ाहिलों, गंवारों की ज़मीनें कौड़ि‍यों के मोल खरीदी जा रही हैं. देश सही जा रहा है. आप भाग्‍यवान हैं आपको ख़बर होगी, मगर मैं समझ नहीं पा रहा किधर जा रहा हूं. अलबत्‍ता यह तेज़ी से भूल रहा हूं कहां से आ रहा था! पैसा और हाय-हाय की कोई ऊंची इमारत है जिसकी लिफ़्ट में घर्र-बर्र घबरा रहा हूं. या ईएमआई की ठंसी हुई रेल है जिसमें बेदम, बौखला रहा हूं, लेकिन साथ ही साथ रेल में बसे धंसे रहने के नोट भी बना रहा हूं. अंधेरे में आईने के आगे जाकर कभी-कभी लगता है खुद पर कितना तो इतरा रहा हूं. सही जा रहा हूं. देश सही जा रहा है. ‘मेरा गांव मेरा देश’ बकवास फ़ि‍ल्‍म थी, अब ‘डेटेड’ हो गई है, ‘मेरा शहर मेरा घरइज़ मोर रीयलिस्टिक. मेरे बच्‍चे, मेरी बीवी मेरा स्‍पेस मेरा मेरा मेरा! सब स्‍वस्‍थ है. मेडिकल इंश्‍युरेंस हैज़ बीन टेकेन केयर ऑफ़. वी बाइ ऑल अवर बेदिंग वॉटर. यू हर्ड ऑफ़ दैट अमेज़िंग गुड शॉप व्‍हेयर दे सेल स्‍लीप? सम वन जस्‍ट मेंशन्‍ड दे आर गोइंग टू स्‍टार्ट सेलिंग शिट. आई अम गोइंग टू बाइ इट! बाइ इन माई सपना, बाइ इन माई स्‍लीप. बाइ बाइ बाइ. टिल आई डाय. ओह, सो मेसमैराइजिंग, आई कांट टेल हाऊ हाई आई फ्लाई. आई डोंट रिमेंबर व्‍हेन वॉज़ द लास्‍ट टाईम आई आस्‍क्‍ड व्‍हाई. व्‍हाई बॉदर, गेट वेस्‍टेड एंड ट्राई? देश सही जा रहा है. बच्‍चे ज़्यादा समझदार हो गए हैं, मां-बाप के यार हो गए हैं. लड़कियां भी धारदार हो गई हैं. सेक्‍स वॉज़ नेवर सो एक्‍साइटिंग बिफोर. व्‍हॉटेवर वॉज़ सो एक्‍साइटिंग अर्लियर, यू बगर, रिटार्डेड, बास्‍टर्ड? हंसते-हंसते आप मुझे गालियां दे सकते हैं, चलती रेल से ठेल कर गिरा सकते हैं, गिराने का कैसा दु:ख हुआ है उसपर फिर टीवी के लिए एक शो भी बना सकते हैं. हाथ-पैर पटकूं तो ताज्‍जुब कर सकते हैं, घर के अंदर बनायी अपने मंदिर में ओम जय जगदीश गा सकते हैं. आपके इरादे नेक़ हैं. आप दायें बायें कहीं भी दे सकते हैं हमें फेंक. सब सही होगा. क्‍योंकि देश सही जाता होगा..

नीचे उड़ाये हुए संगीत से कुछ धुन जैसा सजाने की कोशिश की है.. मर्द आदमी होंगे तो शर्तिया मेरी रेंकाइयों को झेल जाइएगा

11 comments:

  1. मन की इत्ती बड़ी गाँठ को शानदार कैसे कहूं? लेखन शानदार हो सकता है, लेकिन गाँठ?

    ReplyDelete
  2. जी हाँ देफ़ बिल्कुल फ़ही जा रहा है.

    ReplyDelete
  3. @शिव बाबू, अब वही बात है, जैसे इरफ़ान मियां का मुंह देश कहने में फ़लफ़ला रहा है, कुछ वैसे ही मेरे मन की गांठें हैं, अलबलाती रहती हैं.. बाकी ज़िंदगी के क्‍या हाल-चाल? आप सही जा रहे हैं ना?

    ReplyDelete
  4. देश तो सही जा ही रहा है, साथ- साथ आप भी सही जा रहे हैं । विशेषकर तब, जब हमारी बगिया को पढ़ने पहुँचते हैं । उससे भी सही तब जब टिपिया भी जाते हैं ।
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  5. क्या गाया है जी मतलब अब आपके ब्लोग पर चश्मे को लाना जरूरी नही रहा...:)देस कहा जा रहा है ये भी बात अब भी कुछ को सीलती है ,यही बडी बात है.

    ReplyDelete
  6. देश तो सही जा रहा है पर किधर जा रहा है ये कोई बताने वाला है..कोई बता क्यौं नहीं रहा,पर देश तो अब क्रिकेट हॉकियों में ज़िन्दा है,देशगान सुर बड़ा अच्छा लगाए हैं, पर लोगों का सुर थोड़ा बेसुरा हुआ जा रहा है...पर सही जा रहा है....पता नहीं!

    ReplyDelete
  7. रहीम जी नै कि न जानै किन्नै कही है 'जहां गांठ तहं रस नहीं' सो गांठमय/गांठवान/ईएमआईमय नोटवान पर चूहादौड़ को सो हबड़-तबड़मय रसहीन जीवन रह गओ है सो जनता जिएं जाय रई है .

    का करो जाय आपइ बतावौ नैक ?

    ReplyDelete
  8. यही कह सकते हैं (पॉड कास्ट नहीं आता) - अजी इई इनसे बच कर, कहाँ आं आं, जा आआ इयेगा, जहाँ आं जा आआ इयेगा इन्हें एँ पा आआ इयेगा [ :-)] - मनीष [ अरण्य रोदन ? शरण्य रोदन ? ]

    ReplyDelete
  9. फही जा रहा है! फही जा रहा है!
    जाना था कहीं पर कहीं जा रहा है!

    ReplyDelete
  10. इत्ती देर में देख पाये देश को। न जाने कहां निकल गया होगा जी अब तक!

    ReplyDelete
  11. इसको पढ़ते हुये इसको सुनना अद्भुत है। विकट।

    ReplyDelete