Wednesday, March 19, 2008

काली सफ़ेद फ़ि‍ल्‍म के जंगल में..

किसी पुरानी बिसरायी काली-सफ़ेद फ़ि‍ल्‍म की छवियां थीं या बीहड़ में रास्‍ता भूली घबरायी किसी रेल की आत्‍मा का भौंचकपन, सांस रोके मैं एक-दो-तीन गिनता रहा. उन नीम अंधेरों में सपने के भीतर सपने का क्‍या कैसा भेद है गहरा, गुनता रहा. बारुदी सुरंग नहीं थी फिर भी बीच-बीच में धमाका होता, ज़ोरदार. धुएं के चमकते बगूले उठते पैरों पर जले पत्‍ते गिरते, फौजियों की सधी पदचाप घास पर तैरती फिरती तन् तनी तनाक्. हथेली पर गिलहरी-सी जान बचाये मैं इस पेड़ के पीछे से भागकर उस झाड़ तक आता. मां की फुसफुसाती आवाज़ आती बेटा, तू कहां फंस गया है. मैं हकलाकर जवाब देना चाहता तुम्‍हीं बूझती रहीं समझदार, मैंने कब दावा किया था. जाने क्‍या तुक होता कहां से छठवीं जमात की वह सांवली लड़की सामने चली आती, मुस्‍कराती, इस अंधेरे से उस अंधेरे में कहीं मेरा मज़ाक बनाती गुज़र जाती बचपन में जिसकी चोटी गूंथने को ओह, कैसा तड़पता रहा था मैं. कुछ काले घोड़े कुछ भूरे भागते पानी में हदर-बदर मानो बांध टूटने के अंदेशे से भागते हों, मेरी बेहोशियों को रौंदते हुए. नशे में सरोबार कोई आवारा आरमेनियन अकोर्डियन की बंजारा लोरी बजाता जैसे अंधेरी दुपहरियों में निकला हो थपथपाने, भटके सपनों को जगाने. अचानक जंगल में शोर उठता, रेल भक्‍क-भक्‍क धुआं उगलती मैं सांस रोके बुदबुदाता एक-दो-तीन.

3 comments:

  1. सुखी कैसे हों कि तकलीफदेह पड़ताल में जुटे प्रमोद सिंह की नोटबुक का एक पन्ना लग रहा है....

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  2. बचपन, माँ, छठवी जमात की लड़की बकिया सब अगड़म बगड़न...

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  3. साहेब - मुरीद अपने मन से कहेंगे कि यही है रंगीन बारूदी सुरंग जिसका सुगबुगाता पलीता अपना रास्ता तलाश ले रहा है - कैलाईडोस्कोप घुमाते रहें - सादर - मनीष [मुरीद अभी टूटी चूड़ियाँ और शीशे के फट्टे ढूँढने में हैं]

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