कैसे कटें रैन.. तोरे बिन.. किसना?..
होली बहाना रहा होगा, नानान आई थी. पिछले दो दिनों से अपनी कल्पनाओं व बीमारी में बिछावन पर हलकान होता सलोना, स्नेहसिक्त चेहरा सामने देखकर खुश होना चाहिए था, मैंने चिढ़कर कहा- अबे, तू अकेली आई है? व्हेयर इज़ यूअर मदर? मुझे सूप-टूप कौन पिलायेगा? बालों में हाथ कौन फेरेगा? गोद में गोड़ लेकर कौन दबायेगा? पूरा चीन ‘लेने’ पर पिला पड़ा है.. ‘देने’ की बात क्या तुमलोगों ने संस्कृति से उठा ही लिया है?..
नानान के आगे फैलना कवर-अप था, चिढ़ा तो मैं खुद से था. अपने महकते बाल, बिछावन, बसाइन चादर, बढ़ी दाढ़ी, दो समूचे दिनों की पस्त देह, मुंह का कसैला स्वाद चूंकि अब बात निकल ही गई थी, उसे थोड़ी दूर खींचे रहने, निकाल देने में हर्ज नहीं था. आं-बां करता, मसनद का सहारा लेकर किसी तरह देह ऊपर करता मैंने लड़की से शिकायत की- क्या-क्या नहीं किया मैंने उस औरत के लिए? मेरा सब पूण्य धोकर पी गई.. और देखो, बेटी के चेहरे पर गिल्ट की एक महीन रेखा तक नहीं?..
कमरे के तनावी बिखराव के बीच अपेक्षाकृत एक कम गंदा कोना झाड़-पोंछकर किसी तरह अपने बैठने लायक लड़की ने दुरुस्त किया, फिर सहज होकर मुझसे मुखातिब हुई- व्हेन विल यू लर्न टू टेक रेस्पॉंसिबिलिटी फॉर यूअर लाइफ़? मेरी बेचारी दुखियारी मां आके तुम्हारा झाड़ू-पोंछा करेगी इस मुग़ालते में तुम बीमार हुए? पता नहीं लास्ट टाइम खाना कब खाया था (कब खाया था?).. देख रही हूं दवाइयों का भी कोई हिसाब-किताब नहीं है.. थोड़ी देर में पता चलेगा प्रॉपरली तुम किसी डॉक्टर के पास तक नहीं गए?..
नानान कितनी तेज़ी से बड़ी हो रही है (लड़कियां क्यों इतनी तेज़ी से बड़ी होती हैं?).. इच्छा हो रही थी किसी तरह देह में जान आ जाये कि छौंड़ी की उंगलियां थामे उसे अपने साथ लेकर किसी दोस्त के घर जाऊं, बेबात उसकी हर बात पर खिलखिलाकर हंसूं, हंसता रहूं.. करीने और अदब से अपनी प्यारी नानान को सड़क पार करवाऊं, घास के किसी मैदान में कुहनियों के बल लेटे उसकी बेमतलब की बेवकूफियों के किस्से सुनूं और आवाज़ भारी बनाकर उसे अपनी भारी-भारी समझदारी दूं (न लेना चाहे तब भी उसके सिर पर सवार होकर अपनी ठेलूं!).. यह सब करने की जगह अपने चीखने की बेहया, बोरिंग स्ट्रेटेजी पर टिका रहा- अबे, स्टॉमक इन्फ़ेक्शन में खाने की बात करती है? किस स्कूल गई है तू? यही पढ़ाया है तेरी मां ने?.. भगवान भला करे इस ससुरी चीन का!..
लड़की चुपचाप गाल पर हाथ धरे मेरी बकलोली सुनती रही तो मेरा हौसला बढ़ा- सुन बेटा, होली के दिन कहीं कोई गुजिया, दही-बड़ा के लिए पूछता सो तो अलग.. ससुर टोटल दिन फोन कंपनी की या तुम्हारे मां के श्राप का प्रताप था, ससुर अपना फ़ोने बंद पड़ा रहा.. तीन-चार दिन से कंप्यूटर बंद है.. मेल-टेल की कवनो ख़बर नहीं.. तू यह सब ज़रा दुरुस्त कर दे, फिर मैं तुझसे रियल डायलॉग करता हूं!
- तुम्हारे सुधरने की उम्मीद करना फिजूल है.. कहकर नानान उठी और कंप्यूटर का उल्टा-सीधा ठीक करने में जुटी.. बीमारी की नीमबेहोशी में भी जानता था कंप्यूटर के आगे बैठी मेरी वह दुलरिनी नानान सच्चाई नहीं सपने का ही एक फेर थी.. लेकिन जाने क्यों मगर उसके सपने में होने का भी संतोष मुझे किसी सच्चाई सा ही हुआ.. मेरे नाचते मन-मयूर के पंख थाम बदतमीज़ लड़की मुझे छेड़ती हुई बोली- तुम्हारी 'वो' पुरानी रुना लैला दिख रही है, कहो तो उसकी अलल-बलल की टोंटी खोलके तुम्हें थोड़ी देर के लिए सुखी कर दूं?..


3 कमेंट:
गज़ल दिल को गहराइयो तक छू गई.
बहुत सुन्दर...गजल तो दिल में उतर गई, जनाब..बहुत आभार इसे लाने का. आपकी नानन बड़ी हो रही है, अच्छा लगा सुन कर.
अच्छा?
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