Tuesday, March 25, 2008

एक फ़ार्मासिस्‍ट और दारु की दुकान के बीच कहीं.. कछुआ..

एक पुराने मोज़े की टेंट में क्‍या क़ि‍स्‍से होते होंगे? या उतारकर फेंक दी गयी कमीज़ के हिस्‍से? क्‍या सोचता होगा, कि किसी कोने पड़ा ख़ामोशी से अपने अंत की राह तकता होगा? या इस बात को तरसता कि कोई माचिस की तीली बालकर झटके में उसे खत्‍म क्‍यों नहीं कर देता? एक घड़ी जो वर्षों से पहनी नहीं गयी, एक बाजा जो बदलती ज़रूरतों में बेमतलब हुआ. एक खिलौना जो जैसलमेर की रुमानी मुहब्‍बत की याद था एक चुनरी जो..

मेज़ की अनछुई दराजों के पीछे, जाने कहां से खरीदकर लाये लिहाफ़ के नीचे, कहां-कहां छिपी होती है दबी पुरानियां. कहानियां? सहमी, सकपकाई, शायद अब भी किसी कोने थोड़ी उम्‍मीद सहेजे. उम्‍मीद और बिसराहटों के बीच इक ज़रा-सी ज़मीन भर तो होती है जहां जाने कब किस मिजाज़ से बे-लिखे उनकी किस्‍मत लिख ली जाती है. फिर कोई पुराना दोस्‍त उन्‍हें खोजने नहीं आता, कोई पुरानी याद दुबारा उनकी सोच पागल, कातर, बेबस नहीं होती!

पीठ पर सूखी कीच लिए अक्‍वेरियम से बाहर निकल आया हथेली भर का कछुआ घर के सूने-बीहड़ अंधेरों में खोजता है घर में अपने हिस्‍से की कहानी.

3 comments:

  1. "मुक्‍त गद्य के गल्‍प" में आपका जवाब नहीं है!!

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  2. पूरी उम्मीद और भरी बिसराहट के साथ साथ - पुराने तो बांच ही रहे हैं - और पुराने नहीं तो नए ही सही - दवा दारू के बीच कहानियाँ ? कम्प्यूटर ठीक होने की बधाई - मनीष

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  3. सुन रहे थे हुज़ूर की तबीयत नासाज़ है ! शुक्र है, कुछ दिन तो कष्ट में रह लिए :)
    कछुआ तो एक्वेरियम से बाहर आ गया मगर पुराने किस्से वाला खरगोश उसका साथ देने क्यों नहीं आया ? उसके हिस्से की कहानी क्या जंगल में ही गुम हो गई ? या सुस्ती की पस्ती में कछुए की बाकी जिंदगी एक्वेरियम में ग़र्क हो गई और खरगोश कुलांचे भरता रहा ?

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