मन मेरे..
झोंटों के उझराइल में कब तलक हौंड़ाये रहोगे, चिल-चिल धूप की नहाइल में, बालू गड़ें गोड़ की गड़ियाइल में? कब. कभी पलकों पर सरसराती, थरथराती बयार उतरेगी? छाती में उजियार? बरसेगी? कि सब बिछिलते, बहिते-बहिते दिन में रात और रात में झंझाबात जइसन बीतेगा?..


3 कमेंट:
धीर ही धरे ?
aisan bhatbhatail bhaashaa mein etnaa gehraa chintan aape kar sakte hain mahaaraaz.
मन रे ....तू काहे न धीर धरे !
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