Thursday, March 27, 2008

मन मेरे..

झोंटों के उझराइल में कब तलक हौंड़ाये रहोगे, चिल-चिल धूप की नहाइल में, बालू गड़ें गोड़ की गड़ि‍याइल में? कब. कभी पलकों पर सरसराती, थरथराती बयार उतरेगी? छाती में उजियार? बरसेगी? कि सब बिछिलते, बहिते-बहिते दिन में रात और रात में झंझाबात जइसन बीतेगा?..

3 comments:

  1. aisan bhatbhatail bhaashaa mein etnaa gehraa chintan aape kar sakte hain mahaaraaz.

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  2. मन रे ....तू काहे न धीर धरे !

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