Friday, March 28, 2008

सांझ को मोटे तारों में मद्धम..

जंगले की जाली में फंसी उंगली होगी, या हारा झूलता हुआ हाथ. अटक-अटककर बताओगे ज़रा-सी, ज़्यादा रहोगे छुपाये- बात. भटकी आंखें सब बचाकर निकल जाना चाहेंगी दूर कहीं लेकिन हारके- बार-बार लौट आयेंगी वहीं नीचा तकतीं. जैसे उड़ने को व्‍याकुल चोट खायी चिड़ि‍या धरती पर उठती-उठती रह जायेगी पलटती. सांझ की हूक सी उठेगी बदहवास कुछ पतिंगे टकरायेंगे. कांपता कोई स्‍वर फुसफुसायेगा इस तरह जी छोटा करने का क्‍या मतलब, ओह, सबका अंत नहीं हुआ है- और खुद की ही सूखी फीकी हंसी में रीत जायेगा.

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