रोज़ फुदुर-फुदुर..
लड़की हंसेगी चुपा जायेगी, मैं ठिठुराया ठंडे पानी से नहाकर निकलूंगा कि इसके बाद अब. फुदुर-फुदुर अकुलायी चिड़िया घूम-फिरकर आखिर कहां जायेगी? जंगले से उड़कर खंभे के तार पर और अधबने छत की मुंडेर, टूटही चबूतरे पर मौसाजी के छोड़े अख़बार पर? आकाश अनंत नहीं होता जैसे रोज़ हम संत नहीं होते और कहनेवाले कहते होंगे लेकिन जो गिरे हैं पंक में जानते होंगे प्यार भी हमेशा पंथ नहीं होता. रोटी रोज़ मीठी होती होगी या हथेली पर गुड़ धरा मिलता होगा? कि झोले में चार कपड़े खोंसकर निकल जाने की सुगमता किताबों और फ़िल्मों से होकर जाने जीवन में कैसे आती होगी. और नहीं आती होगी तो जीवन विशद विषाद में सुगम लय-ताल कहां से पाता होगा? भागती हवाओं व उझरायी दिवाओं में कितने पत्र व पुस्तकों के पृष्ठ फड़फड़ाते छूटते छुटे रहते होंगे? और सांसें? सवाल. संझायें? कितनी पुस्तकों का मज़बूत कवच जीवन के झंझावात से पार पाने का सबल हथियार बनता होगा? या वह भी ख़ामख्वाह पढ़वैयों की दिलदारी होती होगी? महज पुस्तक-दरबारी? हिलगकर जीवन के पास फिर कैसे आना होता होगा? चहकते ठुमकते हुए फिर नया कुछ जान लेना. बताना?


4 कमेंट:
हमसे रोज़ फुदुर फुदुर नहीं हो पाती इसलिए ब्लॉग पर बुदुर बुदुर करते रहते हैं. बिंब सुंदर हैं हमेशा की तरह, इसी को तुर-तुर के लिख दीजिए तब कपि लोग मानेंगे कपिता है.
बहुत खूब.
जानता नहीं हूँ आपको
या शायद जानता भी हूँ, पहचानता नहीं हूँ आपको
पर यह जो आप यह-जो-भी-है लिखते हैं
कभी कभी बहुत भाता है
और वैसे तो यहाँ सब रजाइयों के नीचे सहमा सा है
ये कुछ कुछ फुदका जाता है
लिखते रहिएगा :-)
सोचेंगे जरूर इस ही जीवन में... कि ... जीवन विशद विषाद में सुगम लय-ताल कहां से पाता होगा? ..फिर मान लेंगे .. कि ...वह भी ख़ामख्वाह पढ़वैयों की दिलदारी ही होती होगी?
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