Sunday, March 30, 2008

सरकलमख़ुद?.. क्‍यों?..

अनामदास की घबराहट समझदारों के समझ आयेगी, मगर किस डाक्‍टर ने कहा है कि हिंदी ब्‍लॉगिंग में समझदार लोग बसते हैं? या बसेंगे? बकलम-बकलम करते कुछ वडनेरकर टाइप भी चले ही आयेंगे और जैसाकि अनामदास ने कहा ही, सिर कलम करवाने की ज़ि‍द से बहुतों का खाना और जाने क्‍या-क्‍या हराम कर जायेंगे! फिर भी लोग बेशर्म हैं मुस्‍करा-मुस्‍करा के फ़ोटो खिंचवाये जा रहे हैं, इतने से खुश नहीं हैं ऊपर से क़ि‍स्‍से भी सुनाये जा रहे हैं!.. मानो स्‍कूल के सालाना फैंसी ड्रेस जलसे की रिहर्सल कर रहे हों.. जबकि सिर कलम करवाने की आशंका की जबसे मुझे ख़बर हुई है, मैं चेहरे पर रूमाल लिये टहल रहा हूं कि पता नहीं कौन असल को फैंसी से कन्‍फ़्यूज़ करके फ़ोटो उतार ले!.. कहने का मतलब घिग्‍घी बंधी हुई है.. और अजित बडनेरकर हैं कि शब्‍दों को समझ लेने का दावा करते हैं, मगर गरीब और सलीब की ‘सटल’ मुश्किल समझ नहीं रहे हैं?

मैं अनामदास सा धूर्त और खिलंदड़ा होता तो हाय-हाय वाली एक पोस्‍ट लिखकर सबकी सहानुभूति भी पा लेता और बडनेरकर की फरमाइश को बैठे-बैठे लंगी दे लेने का सुख लेता सो अलग! मगर मैं अनामदास नहीं.. ग़ुमनामदास भी नहीं.. और ऊपर मैंने पहले ही कह दिया कि हिंदी ब्‍लॉगिंग में समझदारों का आना कम हुआ है. तो अजित के इसरार में उलझकर मैं पहले ही ओखल में सिर दे चुका हूं.. और बडनेरकर ने सहर्ष ले भी लिया था!.. मगर फिर जाने फ़ोन पर विमल ने क्‍या उल्‍टी-सीधी सूतली पकड़ायी कि अजित बाबू ने निर्दोष भाव से मेरे सरकलम को विमल वर्मा का बकलमख़ुद बनाकर अपने ब्‍लॉग पर चढ़ा दिया! और हिंदी ब्‍लॉगजगत के लोग- जैसाकि उनकी नासमझी में स्‍वाभाविक ही है- उस पर दाद भी देते रहे.. और विमल जैसाकि बेशर्म वह है, लेता भी रहा? इसका लब्‍बोलुवाब यह कि हम अभी भी अपने हाथों अपना सिर लिये ओखल ताक रहे हैं.. और ताकने के साथ-साथ कांप भी रहे हैं!..

हद है. क्‍या बिना तीन-पांच के, बिना अपनी पीठ में छुरी घोंपे हमें एक कदम आगे बढ़ने का हक़ नहीं? मगर साथ ही यह बात भी है ही कि अपनी या किसी और की पीठ में छुरा घोंपने का मलाल बना रह जाये तो फिर वह खाक़ हिंदीब्‍लॉगिंग की दुनिया हुई! हालांकि विमल का मेरे जीवन का मसाला अपने नाम से जारी कर लेने के इस छोटे से अंतराल के बाद अब समय आ गया है कि मैं स्‍वीकार लूं कि स्‍वयं के संबंध में ढेरों तथ्‍य थे जिसको मैं दबाकर पी गया था! माने हिंदी में ‘अच्‍छी-अच्‍छी बातों का ब्‍लॉग’ की तर्ज़ पर अजित बाबू ने भी जोर नहीं दिया था कि अपने बारे में गंदी-गंदी बातें लिखकर मैं अपना मुंह काला करवाऊं, मगर उत्‍तर-आधुनिक यूरोपीय साहित्‍य के सहज संपर्क ने मुझे गहरी भ्रांतियां भी दे रखी हैं कि वह कैसा बकलमख़ुद हुआ जिसमें सिरकलमखुद न हुआ?..

जैसे मुझे यह समझ नहीं आता कि कैसे कोई पूरबिया समझदार आदमी अपने अस्तित्‍व के रहस्‍यवाद को सार्वजनिक प्रकाश में लाने की हठधर्मी करेगा. अस्तित्‍व का आ जाना ही पर्याप्‍त हठधर्मी न हुआ? अब उसके अनंतर उसके रहस्‍यवाद के साथ भी चीर-फाड़? हद है? लेकिन चूंकि मैं मौलिक हूं सो आपको बताता चलूं कि इन ऊलजुलूल हदों को पार करता कैसे मैं मां से रहस्‍यवादी सवाल करने से बाज नहीं आता था..

माने स्‍कूल की कापी या कलम के लिए पैसे मांगने पर उसके हाथ खड़े कर देने पर फिर चिढ़कर कह ही देता था कि यह सब पहले सोचना चाहिये था न? हमने नहीं कहा था हमें अस्तित्‍व में लाओ? मां ऐसे उत्‍तरों से हतप्रभ रह जाती थी, बाबूजी हतप्रभावस्‍था से बाहर रहकर लात छोड़ने लगते थे.. या गालियां! मेरे दोस्‍तों के लिए भोजपुरी में एक उनकी प्रिय गाली थी- ससुर, तोर महतारी के बियाह करूं! चूंकि ये गालियां न परम्‍परा-पोषित थीं न प्रयोगधर्मी.. ऐसे पारिवारिक संस्‍कार पाकर मैं भी वैसा ही बन गया.. माने न परम्‍परा का हो सका न प्रयोगी-उपयोगी प्रयोग का.. तो इसे विज्ञ व मूर्ख लोगों द्वारा नोट किया जाये कि मेरे अधकचरे बने रहने में मेरे बाबूजी की गालियों का विशेष योगदान रहा है..

दूसरे, चूंकि बच्‍चों पर पैसा खरचने के सवाल से बाबूजी मुंह चुराते थे, मैंने बहुत जल्‍दी मंदिर व अन्‍य सार्वजनिक स्‍थलों से चप्‍पल चुराने की कला सीख ली थी, और सीखे रहा.. मगर ये ऐसी बातें हैं जिन्‍हें किसी अजित या कुलजीत के इसरार पर सार्वजनिक नहीं किया जा सकता! पता नहीं लोग क्‍यों नहीं समझ रहे कि जिन-जिन स्‍कूलों (या कॉलेजों) में रहा, वे मेरे खिलाफ़ चुराये व उड़ाये चीज़ों की एक लंबी रिपोर्ट जारी कर सकते हैं, या वह लड़कियां जिनका जीवन मैंने चुराया (और अपना बुड़ाया)! इतनी और ऐसी ही जाने कितनी तो अन्‍य दूसरी क्रांतिकारी धांधलियां हैं, अजित बाबू क्‍या चाहते हैं सब प्रकाश में लाकर हम खुद को अंधेरे में डाल दें? सरकलमख़ुद करवा ही लें? अनामदास की घबराहट से, समझदार न भी हों, तो सबक न लें? पता नहीं क्‍यों मुझे बड़ा असमंजस महसूस हो रहा है..

(ऊपर की तस्‍वीर मेरी है, और अस्‍सी नहीं, नब्‍बे के दशक की ही है, लेकिन मुझे भय है कि उसे अजित फिर विमल की कहकर इस्‍तेमाल न कर लें?)

7 comments:

  1. धन्य हैं अनामदास और अज़दक जो बकलमखुद के नाम पर लिखे जा रहे हैं और हामी भरने के बावजूद हमें दूर से रंगीन रूमाल दिखाए जा रहे हैं।
    बहरहाल सुकूंन की बात यही है कि सरकलम कराए बिना भी बकलमखुद लिखे जा सकते हैं , जो छप रहे हैं। और खुशी की बात ये कि आप दोनों ने हमें लिखने का भरोसा दिलाया हुआ है।

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  2. अजित जी सरकलम भी होगा और बकलम भी। टिरेलर तो देख ही लिए हो दोनों के। फिलम बनने में देर लगती है और पब्लिसिटी के लिए पहले कुछ शगूफे भी रचे जाते हैं। हमारे यहाँ कहावते हैं- 'गाड़ी देख लाड़ी के पग भारी'और नखरे न करे तो काहे की दुलहन। अब दुलहन बनाना है तो नखरे तो झेलने ही होंगे।

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  3. हजूर, गुस्ताखी माफ, जान का अमान पाऊं तो कुछ अर्ज करूं ;)

    अभी तक आपकी जितनी तस्वीर देखने को मिली, लगता है फोटू खिचाते समय पोज़ देने मे गुरु हो आप
    :)

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  4. एक बोझ हटा सर से...हम भी नहीं भेजें हैं अब तक बडनेकर जी को. यह फोटो कहाँ हिंचवाये हैं? हम तो एक कांग्रेसी रैली में बंद हुए थे, तब का ऐसा अपना एक ठो फोटो धरे हैं. हालांकि इत्ता सुन्दर औउर उजरका नहीं है मगर बैकग्राउन्ड एईसन ही है. :)

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  5. वो सुबह कभी तो आयेगी-----

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  6. जो बकलमखुद के लिये लिखना है वो आप और अनामदास जी अपने यहाँ चिपकाए जा रहे हैं, अरे यही सब लिखिये पर लिखिये ज़रूर,आपलोग रणछोड़ तो है नहीं,अपनी दुनियाँ का जो भी अंधेरा उजाला आप दिखाएंगे वो सब हम देखने को तैयार हैं,पर दिखाईये ज़रूर,क्या हुआ जो आपका सच मैने दुनियाँ ज़ाहिर कर दिया,आप मेरा सच ही बता दीजिये...मुझे कोई एतराज नहींं....

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  7. सही है जी.. ये हम फ़ुरसतिया जी से प्रेरित होकर लिखते जरूर है पर लिखा हमने ही है और इसे हमारा लिखा ही माना जाना चाहिये. ये आपने चप्पल उठाना अब तक बंद नही की है जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण यहा मौजूद है.देखिये लोग आपसे और आपकी पतनशीलतासे डर कर किस कदर चप्पलो की सुरक्षा मे लगे है..

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