सिडनी बेशे का ट्रंपेट और जीवन की रेल..

जनाब सिडनी बेशे का ट्रंपेट कहां पहुंचता है? या जीवन की रेल? कहीं पहुंचती है? या रोज़-रोज़ की हमारी बेचैनियां?.. ठोड़ी पर हाथ धरे की गंभीरता.. या हदबद कुछ कर लें, कहीं पहुंच लें की निरीह हास्यास्पदता? पता नहीं क्यों मन खुद को लात लगाने की जगह दूसरों पर फेंकने लगता है.. या बहककर हंसने.. हालांकि वहां भी हास्यास्पदता से मुक्ति कहां मिलती है?..
आप भी कोई रास्ता नहीं बताते.. या आगे बढ़कर चुप कराते? खैर, लीजिए, आधुनिक बोध की दीवार पोस्टर नुमा कवितायें सुनिये.. और जनाब सिडनी बेशे की क्लैरिनेट..


8 कमेंट:
महाराज, ग़ज़ब ही कर रहे हैं इन दिनों । सिर धुनते हैं और यही रटते हैं गजबै गजबै गजबै....
सचमुच आनंदम् आनंदम् है...
हमको तैरना नहीं आता - हम किनारे में ही बैठेंगे - तरंगें परोसेंगे - बुलबुले पकाएँगे - सादर मनीष
बाप रे ! क्या कम्पनी में बैठे हैं बेशे जी महाराज ! और उस तीसरे निरीह प्राणी के बाल नोच लेने की इच्छा ऐसी बलवती हुई है , क्या करें ? करुण रस के साथ रौद्र रस भी बह रहा है । दया कीजिये महारज ! पूरा बैलैंस गड़बड़ा गया है। टेरीलीन की साड़ी तो दिख ही रही है , कवि की विराट काव्य प्रतिभा भी दिख रही है।
ka pramod jee,
duba ke chhodiyegaa ho!
स्वागत है बडे भाई, अनुराग बसु भाई के साथ आईये हमारे भिलाई में हम फुरसत से सुनेंगें आपकी आधुनिक असल कविता । हम भी कहेंगें ही आनंदम् आनंदम ।
आरंभ
ए भाई जी एक गो कहानी हमरे पास भी है गोपालगंज में सुनाए थे वहां पर लोग बहुतै हंसे थे..तो उस निरीह प्राणी का भी कहनियाँ सुना डालिये..इधर तो हम ठठा के बेहाल हुए जा रहे हैं कैसे कैसे लोग आपकी ऑरकेश्ट्रा में शामिल हैं उनका भी परिचय ज़रूर दिया जाय भाईजी।बहुत चोखाया कविता सुना रहे हैं,वैसे एक गो कहानी हम भी सुनायेंगे भाई जी...भागियेगा जिन, अपनी सुना ले रहे हैं उस बेचारे ने क्या बिगाड़ा है भाई जी
ठीक है.... हम भी तैरना सीखते हैं
बहुत शानदार पीस है जी। कविता तो ऐसी आधुनिक की क्या कहें। देर से सुने लेकिन जब सुने तो बहुत मजा लिये। अद्भुत कोलाज है कविता में तो!
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