ब्लडी-श्लडी, हार्डली स्टेडी..
कुरते की जेब में भांग की गोली लिये तमोली के ठेले पे बबुनी के बोले पे हम क्या महीन-महीन मुस्कियाये थे. चार कदम झूमके चले सातवीं पे लहिराके थमे तीन कदम पीछे लौट एक झड़ी ग़ज़ल गाये थे. हाय, खुद पे कितना शरमाये थे? मगर वह कल की बात है, आज तो कोंते का सर्राटा और कोंते से ज़्यादा अपना कांटा लिये इनको डरा रहे हैं उनकी उड़ा रहे हैं, जाने किस बात पे चहक रहे हैं फुदक के कहां जा रहे हैं. हंसते-हंसते सकपकायेंगे तो आजू-बाजू क्या पायेंगे? कि मालिक वह चार मर्तबा पढ़े गए और तुर्रे तह बारह बार? और हमने भी भले कर ली ज़रा टिल्ल-टिल्ल अंतत: गए एक समूचा दिन हार? बप्पा हो, ब्लॉग के कितने झमेले हैं कहां-कहां की फटही टंगेले हैं? आदमी कहां से कितना उत्साह सोहायेगा, ऐसा कैसे होगा कि दिन में चार दफे लात नहीं खायेगा? ओह, हिंदी क्यों ऐसी मरगिल्ली है कि कभी-कभी लगता है, गुरु, ब्लाग अपना अब्दाली के बाद की लुटी हुई दिल्ली है? शीर्षक में बिना ब्लाग, वाणी, ब्लडी, व्यूटी, वॉयलेंस, वाद, बलात्कार के पत्ता क्यों नहीं खड़कता. जब जहां खड़कता है तो क्यों कैसे खड़कता है ऐसे कि हम सहमे खड़े-खड़े रह जाते हैं? कि हंसते-हंसते लरबराने लगते हैं बेबात घबराने लगते हैं. कि दीवार की दूसरी ओर कूद जाने में ही अपनी खैर मनाने लगते हैं?..


4 कमेंट:
बिना इन सब के पता खड़क जाए तो क्यों ब्लॉग तक सड़क जाए...ब्लॉग का मतलब ही है कि ब्यूटी के ऊपर वायलेंस करके उसे ब्लडी कर डालें...कोई घायल हो जाए तो उसके ऊपर मिर्चा डालें... नमक के बारे में सोचने के लिए तैयार नहीं हैं, सो नमक बच जाता है....
आप अपना काम करते जाइए। खींच दीजिए एक बड़ी रेखा। वे अपने आप मर जाएंगे। पापी को मारने को पाप महाबली है।
इस पोस्ट का शीर्षक अगर यह होता 'ब्लाग अपना अब्दाली के बाद की लुटी हुई दिल्ली है' तो अब सवा सौ से ज्यादा लोग पढ़कर लौट चुके होते।
आप भी क्या मित्र प्रकाशन हो रहे हैं!!! (अस्सी के दशक के - वैसे आज पढे कि शमशेर भी माया/ मनोहर कहानियों के सम्पादन में रहे साठ के दशक में - और भौंचक रह गए - सोचा आप जैसे गुनी जनों से पूछेंगे कभी राईट टाईम में ) - दिन में चार दफे लात खाने पे याद आया कल एक भाई समझा रहे थे कि अकल बादाम खाने से नहीं ठोकर और लात खाने से आती है और हम उन्हें समझा रहे थे के ठोकर और लात खाने से अकल नहीं ठोकर और लात खाने कि आदत आती है - आप ही बताएं ? - manish
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