एक मोड़ पर आकर रत्‍ना और ओनिर दूसरे पर निकल रहे हैं. निकलनेवाले विपसना या समीरलाल भी हो सकते थे.. या सुधीरलाल.. असल बात यह नहीं कि मोड़ पर आकर दूसरे पर निकल रहे हैं.. असल बात है ऐसे मोड़न मुकाम पर आकर जो मुंहजोर मुंह से निकल रहा है! इन ख़ास मौक़ों पर आदमी (औरत भी) नमूना बनने से कहां बच पाते हैं?.. ख़ैर, तो नमूने हैं.. नोश फ़रमाइए..

हाऊ कैन यू इवन मेंशन सच अ थिंग?.. सो मीन.. सो चीप ऑफ़ यू!.. अरे, रहने दो, रहने दो.. जैसे आप बड़ी दूध की धुली हैं? गंगा नहाके निकली हैं! हंह.. नाइंटी सेवन में वो जयपुर वाली पूरी कहानी मालूम है मुझे! आई माइट बी डंब बट नॉट एज़ डंब एज़ यू हैव बीन टेकिंग मी फॉर! ओह, शट अप! क्‍यों, भई, क्‍यों शट अप, भई? इसलिए कि अपनी सच्‍चाई सुनके आपको मिरची लगने लगी? और हमारे बारे में महीने भर से जो सोशल नेटवर्क पर आपने बहार फैला रखा है, वो कुछ नहीं? आपने समझा सब सुनके हम अनसुना किये रहेंगे?..

आई डोंट वॉंट टू टॉक टू यू एनिमोर! लाइफ़ का बहुत सारा साल वेस्‍ट कर लिया.. ओहोहोहो? भूल गयीं मनाली में मेरे सिर से सिर सटाके जनम-जनम के जो वादे किये थे? (नकल करते हुए) तुम्‍हारे बिना मैं एक दिन नहीं रह सकती! सब निकाल के फेंक दिया नाली में?.. वो फ़्रेम क्‍यों उठा रही हो? दैट इज़ नॉट यूअर्स!.. हू सेज़ सो? सिंस व्‍हेन यू स्‍टार्टेड टू कीप ऑर अंडरस्‍टैंड एनि आर्ट?.. यही है, यही है! मंदा और जन्‍मेजय गलत नहीं कहते! बिना अपने बैगेज का झंडा लहराये तुमसे एक सिंपल पादना तक नहीं हो सकता! ओह, शट अप! जैसे तुम ईडियट वैसे तुम्‍हारे दोस्‍त! और तुम्‍हारे दोस्‍त आइंस्‍टाइन हैं? वो अंकित साला नाक में और टांग में हमेशा उंगली डालके फनफनाता रहता है इज़ ही यूअर इं‍टैलिजेंट आइडल?..

मैंने कहा न, मुझे तुमसे बात नहीं करनी! वुड यू बी प्‍लीज़ काइंड इनफ़ कि मैं चैन से अपना सामान कलेक्‍ट कर लूं? नहीं, तुम वो लेवी स्‍त्रास नहीं उठाओगी! और वो इनसाइक्‍लोपीडिया भी वापस रखो! तुम्‍हारे बाप ने नहीं खरीद के गिफ़्ट किया था, पांच किलो का वज़न मैं ढो के लाया था लखनऊ से! डोंट मेंशन माई फादर इन यूअर चीप एंड स्‍टुपिड जारगंस.. तुम हमेशा के चीप थे और हमेशा के रहोगे! रहने दो, रहने दो, तुम तो ससुर, निष्‍पाप कुमारी हो! तुम्‍हारे करमों का ज़ि‍क्र छोड़ना शुरू कर दूंगा तो यहां बैठना मुश्किल हो जायेगा!..

इट्स नॉट यूअर फ़ॉल्‍ट.. मुझे यहां अकेले आना ही नहीं चाहिए था! अरे, तब लेके आयी होतीं न अपने उस मिष्‍टी मॉलय को? तुम समझती हो मुझे मालूम नहीं है? आई नो एवरी डैम थिंग अबाऊट यू, स्‍वीटहार्ट! डोंट यू स्‍वीटहार्ट मी.. एवर अगेन? व्‍हॉट आई डू एंड हूम आई मूव विथ इज़ कम्‍प्‍लीटली माई बिज़नेस! अरे, तो थूको न! हम कहां कह रहे हैं कि हमारे मुंह में आके थूको? बहुत थुकवा लिये एक जीवन में, अब माफ़ करो, बाबा, आगे बढ़ो! तुमसे बात करना इम्‍पॉसिबल है!

हमारे साथ बात करना क्‍या, अब सांस लेना भी इम्‍पॉसिबल होगा.. सांस में तो कोई और चढ़ा हुआ है न! यू नो नथिंग! यू नेवर अंडरस्‍टुड एनिथिंग! अरे, रहने दो, रहने दो, नब्‍बे चूहा भकोस के बिल्‍ली रानी हज को चलीं? मैं तुम्‍हें वॉन करती हूं, डोंट क्‍वोट मी यूअर पथेटिक प्रोविंशियल क्‍वोट्स!

उस घड़ी को हाथ मत लगाना, दैट इज़ नॉट यूअर्स! साली तुम्‍हारे पीछे ज़िंदगी वेस्‍ट कर दिया और यहां घड़ी और घोड़ा का हिसाब कर रही हैं! आई नेवर लव्‍ड एनिवन सो मच! एंड फॉर व्‍हाट? ओह, आई वॉज़ सच अ फ़ूल.. आई ऑल्‍वेज़ हैव बीन.. ओह, गॉड!

(पता नहीं क्‍यों साट रहा हूं, मगर चूंकि अब साट ही रहा हूं तो फ़ुरसत लगे तो ज़रा यह लिंक भी देखते चलें.. जीवन की ऐसी चिरकुटइयों का कोई अंत क्‍यों नहीं है?)

 
This Post has 14 Comments Add your own!
Ghost Buster - April 2, 2008 12:07 PM

मजेदार समस्या है. प्रणाम गुरुवर.

चंद्रभूषण - April 2, 2008 12:49 PM

जो लिंक आपने दिया है, वह बहुत दिलचस्प है, लेकिन उसका कोई लिंक आपकी पोस्ट से जुड़ता नजर नहीं आया। आपकी पोस्ट में रिश्ता जिस मोड़ पर पहुंचा हुआ है, उसका कोई संबंध सोने-जागने से नहीं जान पड़ता। यह तो बड़ा मॉडर्न, डेमोक्रेटिक किस्म का झगड़ा लगता है जिसकी मुख्य वजह परस्त्री/परपुरुष गमन शायद ही रही हो।

अपने यहां जो रिश्ते पार्टनर के किसी और के साथ सो जाने की वजह से टूटते हैं उनमें चुप्पियां ही सिर चढ़कर बोलती रहती हैं। अगर इतनी बातों की गुंजाइश दोनों में निकल आए तो बातें खत्म होते-होते शायद उनमें दुबारा 'प्यार' पनप उठने की नौबत आ जाए। मेरे ख्याल से चोखेर बाली पर डॉ. सपना चमड़िया की तकलीफ भी यही है!

Pramod Singh - April 2, 2008 1:08 PM

तुम्‍हारी बात सही है, चंदू, मगर वह क्‍या है कि बहुत बार होता है न आदमी मनुहार करे- कि लाओ, मैं बच्‍चा खिलाता हूं, और खिलाने की जगह बच्‍चे को पटक दे.. तो कुछ उसी तर्ज़ पर लिंक हमने लिपटाया है.. इसी या किसी बहाने ऐसी चिरकुटइयों पर भी लोग नज़र डाल लें, कुछ वैसा ही मोह रहा होगा..

सुजाता - April 2, 2008 1:32 PM

बहुत बार होता है न आदमी मनुहार करे- कि लाओ, मैं बच्‍चा खिलाता हूं, और खिलाने की जगह बच्‍चे को पटक दे..
******
gurudev aap .. aap had ho !
----
Chandrabhooshan jee ne mera comment pahle hi churaa kar yahaan chipka rakha hai ,ab unse sahmat hi ho sakti hoo.

Pramod Singh - April 2, 2008 1:37 PM

हां, सुजाता डियर, हद हूं.. मगर प्रेम में होना हद पार कर जाना नहीं होता?..

काकेश - April 2, 2008 2:31 PM

यह बैठे ठाले था..पतित नहीं क्या ??

सुजाता - April 2, 2008 3:13 PM

hmmm....
prem me .....
hum ne aap ko had kahaa , behad nahee .aap had me rahiye to achchha varna ....

Pramod Singh - April 2, 2008 4:10 PM

@काकेश बाबू,

सब जगह तुम पतित ही देखना चाहते हो.. बैठे-ठाले को भी लतिया के पतिताओगे ही? बाज नहीं आओगे? और जहां अपना मौका बना, चुप्‍पे स्‍त्री के आगे सिर नवा आओगे?

neelima sukhija arora - April 2, 2008 4:44 PM

लिकं भी पढ़ा और ब्लाग भी, पर इनका तो सिर-पैर भी नहीं जुड़ता।
ये इंडिया है बाबू , यहां इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि पति क्या कर रहा है।

Shiv Kumar Mishra - April 2, 2008 5:31 PM

बहुत खूब...बैठे-ठाले मनुष्य क्या-क्या सोच सकता है...सॉरी लिख सकता है...कितने लोग हैं जो बैठे-ठाले अपने बारे में भी नहीं सोचते हैं...

Rachna Singh - April 2, 2008 7:54 PM

ये इंडिया है बाबू , यहां इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि पति क्या कर रहा है।

sahii kehaa bhartiyae mahillo ko aadat hae pati nahin patit kae saath rehnae kee aur unhey farak bhi nahin padtaa issiiliyae patansheeltaa ki ghutan ko wo apni suvidha sae nikaltee haen
bgal mae pati haath mae patansheelta ka jhanda , jab man hua jhanda utara ghughat banaya , danda udhaya pati ko lagayaa aur phir karva chauth per saprem pati kae per chuuyae , man mae gali dee

Udan Tashtari - April 2, 2008 8:00 PM

ओह, गॉड!

ये अजदकी सोच कब कौन मोड़ से कौन मोड़ पर निकलेगी..आप खुद जान पाये हैं क्या!! कौन कहा है आपसे इस तरह के बेहतरीन टुकड़े परोसने को..फुल डिश सजाइये...पूरा ८ कोर्स डिनर विथ ड्रिंक..तब कौनो बात बनें वाली इच्छा भी पूरी हो..लिंक की चिरकुटाअई भी देखे मगर कुछ कहेंगे नहीं... :)

डा० अमर कुमार - April 3, 2008 1:39 AM

अब क्या मिसाल दूँ, मैं तुम्हारे दिमाग की !
ई बैठे-ठाले होई का जात है , आपका ?
कुछ दिन आराम कर लेयो, सिरिफ़ अवसाद
झटके बरे पोस्ट लिखब बतावा गा है, तो
सात ख़ून माफ़ !
सच बोलूँगा, सच के सिवा यदि कुछ नही बोलूँ
तो ब्लाग कम, मानसिक डायरिया ज़ादा लग रहा है ।

डा० अमर कुमार - April 3, 2008 1:41 AM

*

Post a Comment