Thursday, April 3, 2008

फूलमतिया आयी है!..

पता नहीं उन सपनों के रास्‍ते आयी थी जो विमल के लिए फंसावट बनते रहे हैं.. या चंदू के लेखक की उस मिट्टी से होकर जो चंद सौभाग्‍यशालियों को मिलता है, बकिया के अभागों को कहां मिलता है?.. या उस धूप से जो अपना रास्‍ता बदल लेती है.. या बतकुच्‍चन के उन ढेलों से जो सीधे कपार पर चोट करते हैं? रचना की तक़लीफ़ या असंतोष से.. या डाक साहब जिसे सिरिफ़ अवसाद जनित मानसिक डायरिया कहके चिन्हित करते हैं? मालूम नहीं क्‍या वजह रही होगी.. मैं इतना अनुसंधानक नहीं कि हर वजह की खोह तक पहुंचकर बिल का बैलेंस-शीट बराबर कर लूं.. बहुत मर्तबे जानना बाद में होता है, पहले बस मन महसूस करता है.. वही कर रहा था. महसूस. कि फूलमति आयी है!..

गजर-मजर, गदर-बदर, गम-गम, बम-बम.. इनारा पर लखन बो पुरनका रस्‍सी की पुरनका बाल्‍टी से पानी खींच रही थी, झटका में बाल्‍टी छूट गया, खुद इनारा में छूटते-छूटते बचीं.. रामकदम हल्‍का-हल्‍का पछुआ बयार लेते हुए नीम का नीचे बकरी को पतइ खिला रहे थे, झांवर-झांकी में अइसा उझिराये कि बकरी कान्‍धा पर गोड़ भिड़ाके, आंख कइसे तो फूटते-फूटते बच गया, बाबू रामकदम को ज़मीन पर गिराके मुंह में पतइ दाबे उड़ गयी! सनीचरा के मझिलका कका मंदार ओझा छत पर खपड़ा का मरम्‍मती के लिए चढ़े थे, नज़ारा देखके अइसा चिंहुके कि खपड़ा सब खटर-खटर नीचे आवे लगा, ऊ हुंवे हवा में चिहुंके अटक गये.. मुंह से फुर्र-फुर्र आं-बां का हावा फेंकने लगे.. कहने का मतबल फूल‍मतिया सबका छाती छेंकने.. मन का अरमानी सेंकने आ गयी थी!

बिल्‍लेसुर का मौसी का दुकानी में अब रेस्‍कोना साबून का टिकिया खुदै ले चहुंप जायेगा.. फूलमति थोड़े ले पूछेगी, खुदै अलता-बिंदी-टिकुली का सुनहला संसार गुलज़ार हो जायेगा.. राधेमोहन ठेंहुना का ऊपर टूटही कटोरी में बैंगन का बजका सजाके बेमतलब सबको राम-नाम बोलके बेमतलबे चाह का न्‍यौता देंगे कि जरका-सा खबर लगे कौन छौंड़ी फूलमतिया का केसी में जवाकुसुम का तेल डारी थी.. कि कौन कलर का प्‍लास्टिक का चटाकी कीनाया है शहर का हाट-बजारी से! बिन्‍नू बो के बेमरिया भसुर ओसारा में पसारे छींट का हरियर साड़ी पे पियरका-पियरका फूल देखके धन्‍न हैं.. हरियर पेटीकोट और ललका बिलाऊज अन्‍नरे पसारल है, बहरी उसका झलकी मिल जाता तो मालूम नहीं केतना जवान- अऊर बूढ़-पुरनिया हुंवे ठाड़े-ठाड़े फेन्‍टी- फेन्‍ट हो जाते.. मज़ाक बात नहीं है, जी, फूलमतिया आयी है!..

हवा केतना नीमन-नीमन लग रहा है.. मन और मुंह का स्‍वाद अच्‍छा जिमन-जिमन.. जीवन धन्‍न नहीं है, जी, कि फूलमतिया आयी है?..

5 comments:

  1. धन्न ! धन्न ! - है कि फुलमतिया एकजाई आ गई ।

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  2. हवा केतना नीमन-नीमन लग रहा है.. मन और मुंह का स्‍वाद अच्‍छा जिमन-जिमन.. जीवन धन्‍न नहीं है, जी, कि फूलमतिया आयी है?.. बड़ा निम्मन लगा, ठठा के हँसने का मन कर रहा है...हमने अपने मित्रों को पढ़वाया और सब खी खी कर रहे हैं...मस्त है ऐसे ही आप लिखा कीजिये..मज़ा आता है..

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  3. फूलमतिया तो एस्नों टिकुली लगा लेती है तो पहिचाने मे नहीं आती है...ऐसी लच्छेदारी अच्छी लग रही है...आपकी फूलमतिया का जवाब नहीं!

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  4. तेरे आने कि जब खबर महकी,तेरी खुश्बू से सारा घर महके… अन्त मे ये गज़ल भी पोस्ट करते आप्…तो क्या बात होती -----

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  5. फ़ुलमतिया का स्वागत कीजिये जी।

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