Friday, April 4, 2008

देखिए, एक बुचिया मंच पर जा रही है.. ज़रा हौसला अफजाई कीजिए!..

गुड़ि‍या, अच्‍छा नाचना, भई.. वैसे मेरा यह कहना चिरकुटई ही है मगर टेढ़े आंगन में गिरे हुए हम नाचकर तो दिखा नहीं सकते, कहकर बेमतलब की अपनी इल्‍लम-गिल्‍लम बता ही सकते हैं.. तो स्‍वामी सत्‍यरत्‍न बाबा की तर्ज़ पर अपनी ठेल रहे हैं, दांत चियारे तुम झेल लो.. फिर हमारी सब चिलिर-बिलिर भूल- भागकर मंच पर चढ़ना और इस छोर से उस छोर तक इंद्रधनुष बन जाना! हुमसकर नाचना, तरंग में.. समूची आत्‍मा से नाचना.. तुम्‍हारी उम्र का यही तो फ़ायदा है कि ससुरी, चाहो भी तो कहीं मिलावट नहीं होती.. सब हुमस में और समूची आत्‍मा से ही होता है.. हंसना और रोना सब तरंग में उमगता, छूटता रसप्‍लावित होता चलता है!

प्‍यारी गुलिरिया, कुछ ऐसा समां बांधना कि हमारी बुड्ढी थकी आंखें रंगबहार की कल्‍पना में जुड़ा जायें.. अपने कर्महारेपन में लजा जायें! कि हम सबसे बचाके भी कहें तो बुदबुदाके इतना ज़रूर कह दें कि उम्‍मीद बाक़ी है!.. कि कोशिश को उसकी हदों तक न जिये की नाउम्‍मीदी हारे हुए अंधेरों का दस्‍तावेज़ नहीं, फक़त मुंह चुराये के भगोड़पने की लतखोरी है? हां, ऐसा नाचो कि हम भी हिल जायें.. और हिले रहें.. इतना हिलें कि फिर नया संगीत बन जायें!.. ताज़्ज़ुब करें कि देखो, एक नन्‍हीं सी लड़की ने हमारा मनकल्‍प कर दिया?..

ओहो, गुलिया, बुचुरकी, गुनी-गुनी गुलिरिकी.. सोचकर कितना अच्‍छा लग रहा है कि तुम अपनी नन्‍हीं ज़ि‍म्‍मेदारी में नयी रंगीनियों का फेंटा बांध रही हो.. अभी उमगते व दमकते चेहरे से एक नज़र दुनिया को निरखोगी और पलक झपकते में गुरुत्‍वाकर्षण का नया सम-ताल बुनने लगोगी.. मैं उछल जाऊंगा.. थोड़ा बहल जाऊंगा.. मगर फिर जल्‍दी ही खुद से बेदखल जाऊंगा?..

9 comments:

  1. har jagah dushasan haen blog per bhi aap kis ko nyot rahae haen ? nimentrn sahii karae agan taedhaa ho nachnaa phir bhi ho sakta haen per protasshit kartey dushaan sae kaese bachegi buchiya ?? aur jab un dushaasan nae ghughat pehnaa ho annonymous ka . buchiya na jaana tum manch per naa lena protsaahn kya karogi protsaahit ho kar phelae kwaab tumko dikhyaa jayaga phir sadko per nirvastr tumko dauraaya jayega

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  2. मेरे नाच पर कभी किसी ने इतना चढाया होता तो मैं भी सोनल मानसिंह हो जाती. ये कैसा भेदभाव है गुरुदेव?

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  3. @रचनाजी,
    आपके इस आततायी, खौफ़दायी नज़रिये से मैं बहुत सहमत नहीं.. बाहर दुनिया भेड़ि‍यों से भरी है तो क्‍या इसीलिए बच्‍चे को शुरू से बताया जाये कि सर्कस में उतरना है, तैयारी करो?

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  4. @इरफ़ान मियां,
    हम बीमार पड़ते थे जभी संतरा और चाय में डुबोकर पावरोटी देखना नसीब होता था.. तो अब इसका ये मतलब निकले कि आप भी बच्‍चों को संतरा और पावरोटी दिखाने के लिए उनके बीमार होने की राह तकें? आलोक बाबू ने किताब निकाली थी या नहीं- कि 'दुनिया रोज़ बदलती है' ? आप भी इत्‍तेफाक़ रखते होंगे..

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  5. रचना,
    बुचिया बुचिया बनी रहे । हर गड्ढे में गिरते रहने की आशंका से फिर जीना छोड दे ? कमरे में बन्द करके ताला लगा देने से बात बनती है क्या ? बाहर आये , दौड़े नाचे , जीवन जीये । दिन रात का डर उसके मन को कैसे मजबूत करेगा ? क्या उसके मन को मजबूत करेगा ? डरते रहने का डर , दुनिया में घूमते रहते लोलुप भेड़ियों का डर या खुल कर उनका सामना करने का , अपनी मर्जी से जीने का , अपने होने का जोश ? और आप क्यों फिर ऐसा डर किसी भी बुचिया के मन में भरना चाहती हैं ? आप में और "उनमें' क्या फर्क फिर ?

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  6. @pramod
    @pratyaksa
    yae post padne sae pehlae ek 12 saal ki bacchi kae saath usake padosi nae balatkaar kiya khaber padii thi aur iskae allawa blog kae prabudh guni aur sahitik logo kae kament annonymous kae rup mae kuch apnae baare mae aur kuch anay mahilao kae baare mae pad rahee thee. aap ki psot aaye jo pehlae vichar aaya likh diya kyoki impulsive writer hun

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  7. एक आशीर्वाद - दुश्यन्त कुमार
    ======================
    जा तेरे स्वप्न बड़े हों।
    भावना की गोद से उतर कर
    जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।
    चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये
    रूठना मचलना सीखें।
    हँसें
    मुस्कुराऐं
    गाऐं।
    हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें
    उँगली जलायें।
    अपने पाँव पर खड़े हों।
    जा तेरे स्वप्न बड़े हों।

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  8. प्रमोदजी,
    बहुत देर बाद नज़र गई इस पोस्ट पर....गुड़िया को आशीष और प्रोत्साहन देने का शुक्रिया।

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  9. http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/

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