Saturday, April 5, 2008

तेल, नून और तिब्‍बत..

हम तेल ओर नून की सोचते तबाह रहते हैं, तिब्‍बत की कहां सोच पाते हैं? पैट्रिक फ्रेंच कहते हैं शांतिप्रिय तिब्‍बत की छवि सन् पचास के बाद के सोशे हैं, भारत आने के बाद दलाई लामा ने गांधी की अहिंसा अपनायी, अलबत्‍ता गांधी का अहिंसक प्रतिरोध सीखने की जगह हॉलीवुड में हुलु-लुलु करके तिब्‍बत सेंकते रहे. वर्ना तो पहले ल्‍हासा की सड़कों पर भी प्रतिद्वंद्वी मठों में जमकर हुआ करती थी सिर-फुटव्‍वल, मगर इतनी-कितनी बातें हैं उन्‍हें सोचने का सुभीता कब है?

देश में उच्‍च शिक्षा पर उच्‍च खर्च की मंज़ूरी मनवाने को मानव संसाधन राज्‍यमंत्री डी पुरंदेश्‍वरी राज्‍यसभा में सरेआम झूठ का पुलिंदा पढ़ती हैं मानो अमरीका में नासा और अस्‍पताल महज़ भारतीयों के बूते ही चल रहा हो, मगर उस झूठ की गिरेबान थामने कौन जाये? या तमिलनाडु के धरमपुरी और सालेम का सच का सुर समझने- जहां माएं अनचाही शिशु कन्‍यायें सरकारी सहाय्य स्‍कीम के सुपुर्द कर आती हैं, फिर सरकारी क्लिनिक से उन बच्चियों का विस्‍थापन किन दुनियाओं में होता है, इसकी तथ्‍यात्‍मक रपट किसी के पास नहीं, न है कोई सरकार से पूछवैया..

तो भैया, न सोच पाने की जाने कितनी वजहें हैं, और सोचो तो सोचना भी ससुर, अंधेरे में सिर घुसाना है, तक़लीफ़ की परतदार खटिये पर ढिमिलयाते रहना है, दबी आवाज़ में लाहौल विला कुवत बुदबुदाना है. पाकिस्‍तानी फ़ि‍ल्‍म ‘खुदा के लिए’ फ़ि‍ल्‍म तो क्‍या है, खासी चिरकुटई है, मगर जिरह के कुछ पेंच दिलचस्‍प हैं- कि भई, आज अच्‍छा और नेक़ मुसलमां होने के मानी क्‍या हैं, और सच्‍चा होना तो सचमुच बड़ी टेढ़ी खीर है! जैसे जिम्‍बाव्‍वे में ज़िंदगी चला लेना, मुगाबे की सरकार से पार पा लेना हंसना नहीं लोहे के चने चबाना ही होगा, या कि फिर उसके लिए भी तरस जाना? आदमी सोचे जिम्‍बाव्‍वे की तो फिर खाये क्‍या? तिब्‍बत, धरमपुरी, सालेम जाये ही क्‍यों? सुनता रहे सितार परम पताका पुरंदेश्‍वरी की, अनसुना करे खाद्य संकट के जाने कहां के बेमतलब किस्‍सों को, हें-हें करे, गाल बजाये, किसी तरह, भइय्या, दिन से पार पाये?

1 comment:

  1. पार पाना ही क्यों? पार जाना ही क्यों? ...सरकारी और बेसरकारी मशीनरी हमें तो अभी तक यही बताती रही है की नाशा जमाल पाशा ही चलाते हैं...खाद्य संकट कहाँ है? हम तो आत्मनिर्भर हैं. बारह साल रुकिए, हम सुपर पॉवर हो जायेंगे तो बात करेंगे.

    देश, सही जा रहा है..........:-)

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