Monday, April 7, 2008

नायपॉलियन नेल्‍स..

आंदोलनकारी आधार और खालिस जीवन-व्‍यापार बहुत दुरुस्‍त न हो तो आदमी के लगातार तीन कदम दायें और चार कदम बायें निकलते रहने के ख़तरे बने रहते हैं.. एक्‍सेलरेटेड स्‍टार्ट के तत्‍काल बाद भान हो कि शुरूआत एक्‍चुअली फॉल्‍स स्‍टार्ट था तो ताज़्ज़ुब नहीं.. मैं हर तीसरे नयी योजना बनाकर चौथे दिन उसे खारिज करता चलता हूं, रियल भुक्‍तभोगी हूं, तो इस ‘झमेले’ को अलग से कहने-समझने की ज़रूरत नहीं.. शायद दिलदार-समझदार लोग इसी को बिन पेंदी के लोटे की नियति कहकर चिन्हित करते होंगे.. और जिसे सुनकर मेरी तरह लोग प्रतिकार में हाथ-पैर छोड़, फिर किसी दूसरी ओर लुढ़क अपनी हार स्‍वीकार भी करते रहते होंगे?..

ख़ैर, लुढ़कने के पीछे इतना लड़ि‍याने की कोई वजह नहीं है. हिलगने की ज़रा-सी वजह इतनी भर है कि अपने को मेरा दोस्‍त बतानेवाले (और मेरे मान लेनेवाले) चंद हलकों से एक नया प्रस्‍ताव आया है.. और नैचुरली, मैं लुढ़कने के पहले के उड़नेवाले फेज़ में हूं.. और जबर्ज़स्‍ती ऐसे उत्‍साहित हो रहा हूं कि प्‍यार से किसी को तमाचा जड़ दूं तो मानकर चल रहा हूं कि बेचारे को उसे बुरा मानने की वजह नहीं होनी चाहिए!..

तो दोस्‍त का सुझाव यह है कि अपनी सारी ऊर्जा ब्‍लॉग पर झोंकने की जगह एक ऐसी वेबसाइट खड़ी करूं जो अपने समय के सवालों, संदर्भों और स्‍वरों को एक जगह सुव्‍यवस्थित तौर पर संकलित करता चले- प्रगतिशील, पतनशील- दोनों मोर्चों से. और सिर्फ़ टेक्‍स्‍ट न हो, साऊंड, वीडियो सब तरह के फ़ाइल्‍स हों.. एंट्री ठेलनेवाला मैं अकेला ही न होऊं, देश और देश के बाहर जहां-जहां से आवाज़ और लोगों के मिज़ाज मिलें, लोग अपनी-अपनी चिन्‍तायें और कील ठोंकें! सीधा सहभागी सुर इतना भर हो कि सहयात्री मानते हों कि इंडिया नेक्‍स्‍ट एशियन और वर्ल्‍ड जायंट होने का टिल्‍ला सुर छेड़ते रहने के साथ-साथ उन लोगों की भी ज़रा बात करता चले जिनके लिए रेल पटरियों से अलग शौच की जगह मुहैय्या नहीं.. या अभिषेक बच्‍चनों व लल्‍लनों को देख-देखकर ही जो अपना दिन और जीवन धन्‍य होता नहीं मानते रहना चाहते?

फ़ि‍लहाल जब तक लोटे में पानी का कुछ भार है, उछलने व उत्‍साहित होने में क्‍या हर्ज़ है.. लेकिन, फिर भी, देखिए, मैं अभी सोच ही रहा हूं, जबकि नायपॉल साहब ने अपने एंड से चंडीगढ़ जाने के रास्‍ते अपनी एंट्री आल्‍रेडी दर्ज करवा रखी है- और अभी नहीं, सन् नब्‍बे में ही करवा रखी थी:
“Always in India this feeling of a crowd, of vehicles and services stretched to their limit: the trains and aeroplanes never frequent enough, the roads never wide enough, always needing two or three or four more lanes. The overloaded trucks were often as close together as wagons of a goods train; and sometimes- it seemed to depend on the mood or local need of drivers- cars and carts same in the wrong direction. Hooters and horns, from scooters and cars and trucks, sounded all the time, seldom angrily…”
(इंडिया: ए मिलियन म्‍युटिनिज़ नाऊ से)

4 comments:

  1. जो नया प्रस्ताव आया है,उसके बारे में थोड़ा और विस्तार से लिख देते?हमारे लिये भी कुछ जगह रखियेगा मित्र...

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  2. sounds good!!

    Looks like a great idea!

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  3. इस पर मार पड़ेगी - लेकिन - इसी सोच में ठस गए कि बरगद के नीचे बाग़ बनेगा कैसे? - अम्ल हो तो ठीक मदिरा हो तो ? - थोड़ी लम्बी सोच हो - वैसे .... .... सोच भली है

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  4. ये सुझाव वाले मित्र निश्चित ही सगेवाले होंगे । मित्र तो हम भी समझते हैं आपको पर सुझाव नहीं दे पाते , सीधे बकलमखुद का आग्रह कर देते हैं , सो अच्छे तो लगने से रहे। इसकी घोषणा भी आपको अज़दक पर करनी ही पड़ती है।
    पर हमें उम्मीद है कि नया सुझाव (जो कि सचमुच अच्छा है) अमल में आए , उससे पहले एक ठौ बकलमखुद लिख देंगे। आपके कुछ सगेवाले और हैं जो रोज़ हमें याद दिलाते हैं कि प्रमोदजी से ज़रूर लिखवा लीजिएगा।

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