Tuesday, April 8, 2008

हाल-चाल: एक

बड़के का सटका हुआ और छुटके बेटे का भटका हुआ में फंसी है दीदी, मुझे फ़ोन कब करती, मगर करती तो यही कहती शकरकंद खाने के बारे में कही थी, खा रहे हो कि नहीं, दीदी बोल रही हूं? मैं किसी दफ़्तर के संकरे वेटिंग लाउंज में अपनी बारी की राह तकता ‘चांदनी बेगम’ की महीन ज़बान- सनअती तमद्दुन में इंसान की तनहाई और बेचेहरगी- फरिया रहा होता, चौंककर कहता दीदी? किसकी? और दीदी तमककर बोलती तुम्‍हारा दिमाग़ चल गया है, संटु? सामने दीवार पर घड़ी देखकर सोचता यहां आये मुझे ठीक पैंतीस मिनट हुए हैं अलबत्‍ता किसलिए आया था अब इसकी याद नहीं, छूटकर अलबलाया फ़ोन पर जवाब देता अरे, मज़ाक कर रहा था, दीदी. कहने का मतलब यही कि दीदी, दद्दा, दीन सब गजर-मजर हुआ खड़ा, मेरी पकड़ से बहुत बड़ा हुआ पड़ा है. पटाखे के रॉकेट की तरह फुर्रर्रर्र छूटी दिन ससुरी जाने कहां सूं-सनाक् किये फिरती है. हम पीछे-पीछे उड़े, ज़रा मुहलत पाये तो हकबकाये फेसबुक और आरएसएस फीड में खुद को खोजते फिरते हैं, और जब अंतत: दिन की चिंदियां उड़ चुकती हैं तो हम किसी बुक लायक होते हैं, न हमारे फेस की कोई फीड होती है. फीलिंग्‍स की तो नहीं ही होती. बड़ा रायता है, डियर, मुंह में कलाकंद धरने के बाद भी, सब कड़वा जायका ही है, सर. उस छोर पर आपका दिन कैसा चल रहा है, खरगोश की चाल से कछुए को पछाड़ रहा है, या मगरमच्‍छी मुंह में आपको लीले खंगाल रहा है? हें-हें-हें, वेरी फ़नी ना? आई अम आलमोस्‍ट फीलिंग लाइक अ डमी ना.

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