Wednesday, April 9, 2008

आदमी और भेड़-बकरी का फर्क..

आदमी और भेड़-बकरी में कोई फर्क है? अपने यहां सरकार इस बात का विशेष ख़्याल रखती है कि ऐसे किसी भ्रामक भेदभाव से समाज गंदा न हो. कांजीहाउस वाली गंदगी किसी मानवीय संसाधन के क्षेत्र में भी न दिख रही हो तो मानो सरकार का दिल टूट सा जाता है. आप अभी भी किस्‍मतवाले हों, और महानगरों की जगह किसी छोटी दुनिया में टूटा हुआ दिल लिये बसर करते हों तो ज़रा उपक्रम करके आसपास के किसी सरकारी अस्‍पताल, स्‍कूल की एक मुआयनामारी कर डालें, देखिए, कितनी जल्‍दी आपका टूटा हुआ दिल एक दहले हुए दलदल में बदल जाता है!

अभी थोड़े दिन पहले विमल ने मेरे मेल में एक फ़ोटो फॉरवर्ड किया था. किसी भाई ने, कोई पश्चिमी इलस्‍ट्रेशन होगा, उस पर देवनागरी की एक चिप्‍पी लगा होली के संदर्भ में उसे एक मौजूं इलस्‍ट्रेशन की शक्‍ल दे दी थी. लेकिन ज़रा कल्‍पनाशील होकर देखिए तो चिप्‍पी हटाकर यह रेखांकन ढेरों दूसरी सामाजिक तक़लीफ़ों के रुपकों के नमूने के बतौर भी इस्‍तेमाल में लाया जा सकता है! माने भारी रस्‍सी बच्‍चों की विकराल दुनिया मान लें और खाली बाल्‍टी वह सरकारी सरंजाम जो उन्‍हें शिक्षित करने के नाम पर इकट्ठा किया गया है? या फिर रस्‍सी देश के आंतरिक हिस्‍सों में घटिया सेहत स्थितियों का प्रतीक है और रस्‍सी स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के संसाधनों का?

इन दुरव्‍यवस्‍थाओं का अंतत: उपचार क्‍या है? कि आप कोशिश करें कि किसी भी तरह आपका बच्‍चा किसी अमीर घर में ही पैदा हो? कि किसी सरकारी तंत्र में उसके नाक रगड़ने की किसी भी सूरत में गुंजाइश ही न बचे, और होश संभालने के साथ ही- मतलब नाक साफ़ करना सीखते ही- वह यहां की छोटी दुनिया में लात खाने की जगह विदेशों में गाल बजाने चला जाये? क्‍या उपचार है?.. या कि आप अपने को बेचकर, पड़ोसी की गरदन काटकर लगातार इतना पैसा लहाते रहें कि आपकी संतान प्रचुर मात्रा में सब्‍सीटाइज़्ड होकर शिक्षित होती रह सके? इस देश में गरीब आदमी आखिर क्‍या करे? घटिया सूरते-हाल से बचने के लिए बांग्‍लादेश भाग जाये?..

बीबीसी की हिंदी सेवा ने भारत के अलग-अलग प्रदेशों में सरकारी स्‍कूलों की स्थिति पर एक सीरीज़ बनायी है, कुप्रंबधन पर छोटे-छोटे अच्‍छे ऑडियो निबंध हैं; आप भी सुनिये- बस इतनी कोशिश कीजिएगा कि गुस्‍से और क्षोभ में ‘देश सही जा रहा है!’ गानेवाले किसी उत्‍साही की जान न लें!..

8 comments:

  1. सही चिंतन परिलक्षित हो रहा है..

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  2. अजदक = आओ जरा दुखी करें?

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  3. प्रमोद आपने जो फ़ोटो लगा रखी है..वो होली के अवसर पर किसी फ़ोटो प्रतियोगिता में चुनी गई सर्वश्रेष्ठ फ़ोटो है...आप अपना विचार ज़ारी रखें.....समस्या गम्भीर है..

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  4. 'देश सही जा रहा है', ई गाने वाले जान का लेंगे? उत्साही का जान त ओइसे ही सांसत में आ जायेगा.....

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  5. हाँ जी यही है भारत के समग्र विकास की दिशा, यही देगा हमें खुला बाजार, हर चीज उपलब्ध होगी खुले बाजार में। सरकारें बन्दी होंगी बाजार की, या कठपुतलियाँ।

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  6. हम सरकार की इस लूली-लंगड़ी स्कूली व्यवस्था के भोक्ता भी हैं और उत्पाद भी . कुछ दिन -- मात्र दो बरस -- इस व्यवस्था को एक शिक्षक के रूप में भी देखा-परखा है . क्या लिखूं . जी कसैला हो जाता है . अजब असहायता का बोध होता था .

    पर इसी में आशा की किरण भी है . कुछ लोग हैं जो अपने बूते इस पिटी-पिटाई, जर्जर व्यस्था में भी हारेदर्जे कुछ परिवर्तन -- कुछ बेहतरी -- ले ही आते हैं . इस महादेश में बच्चों की एक बड़ी संख्या के लिए और कोई विकल्प भी तो नहीं है . इस टूटी-फूटी व्यवस्था में भी -- इस खाद-पानी से रहित बंजर में भी -- कुछ दुर्दम्य और इच्छाधारी पौधे सूखी रेती फोड़कर निकल ही आते हैं . बल्कि आते ही रहते हैं .

    अभी पिछले इतवार को हरियाणा के एक सज्जन रणवीर सिंह गुप्ता से मिलना हुआ ,वे पिछले तीन-चार दशक से अमेरिका में कंसल्टेंट हैं और हाल ही में आईआईटी खड़गपुर को (जहां से उन्होंने आर्कीटेक्चर में बीटेक किया था) एक परियोजना के लिए एक मिलियन डॉलर दिया है . उनसे यह नहीं पूछ सका कि उन्होंने हरियाणा के अपने उस स्कूल के लिए क्या किया जहां से उन्होंने प्राथमिक और माध्यमिक परीक्षा पास की . पर मानता हूं ज़रूर कुछ किया होगा .

    सरकार से कितनी आशा करें ? वह भी इस बदलते समय में जब शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजीकरण के खतरे मुहं बाए खड़े हैं . अब तो यह टूटी-फूटी व्यवस्था भी बचेगी कि नहीं सवाल यह है ?

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  7. तैनूं की , मैनूं की
    वाली सोच सब पर हावी है...

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