Thursday, April 10, 2008

सोचने के एडवेंचर्स..

कल के पोस्‍ट में बीबीसी की हिंदी सेवा के कुछ ऑडियो फ़ाइलों का लिंक दिया था. भारत के आंतरिक क्षेत्रों में सरकारी स्‍कूलों की दशा-दुर्दशा पर वह सहज व ‘रेस्‍ट्रेंड’ तरीके से काफी मार्मिक टिप्‍पणियां करती है. बीबीसी के पास ढांचा है, लोग हैं, पैसा है, ज़रूरत समझेगी तो ऐसे उद्यमों से चार कदम आगे जाकर वह और रोचक कामों को अंजाम दे सकती है. लेकिन वह बीबीसी की, विकराल कॉरपोरेट उद्यम के संभाव्‍य कसरतों की बात हुई. सोचने को मैं सोच रहा था एक माइक और कोई सरल रेकॉर्डिंग डिवाइस की सहायता से ऐसी जाने कितनी, और किन-किन स्‍तरोंवाली कसरत हम भी तो अंजाम दे सकते हैं? अगर हमें देश के भविष्‍य की चिंता हो, उन चिंताओं में अपनी उपस्थिति व भूमिका में हमारा किसी तरह भरोसा बनता हो? जैसे फ्रंटलाइन के ताज़ा अंक में महंगाई की कवर स्‍टोरी की अलग-अलग टिप्‍पणियों को पढ़ता पेंचदार मसले की परतों को थोड़ा समझता लेकिन ज़्यादा में अटकते मैं सोच रहा था यही मसले अगर इंटरेक्टिव, बातचीत की शैली में चंद विशेष जानकारी रखनेवालों की संगत में होता तो हमारी तरह की ले और लोढ़ा समझवाले अब तक ज़रा जेनुइन समझ बना चुकते कि महंगाई, किसानी, इंटरनेशनल ट्रेड और बड़े कॉरपोरेट्स का रिटेल मार्केट में आना आपस में किस-किस तरह से गुंफित हैं. अभी जो है कि कुछ जेनरलाइज़्ड सूत्र बुनते हैं, समझ नहीं बनती..वह समझ कहां, किन रास्‍तों से बनेगी?

मसलन यही लीजिए कि खाद्यान्‍न की हमारी बेसिक ज़रूरतें क्‍या हैं, आज़ादी के बाद से अब तक सप्‍लाई का सीन क्‍या रहा है. जन वितरण प्रणाली काम कैसे करती थी, और धीमे-धीमे उसमें से सरकार के हाथ खींच लेने के बाद किन-किन स्‍तरों पर खाद्य वितरण व उपभोग में फर्क आए हैं? खाद्यान्‍न का मार्केट ठीक-ठीक काम कैसे करता है? जेनरल ग्राफ़ क्‍या बन रहा है- हम कुछ बेहतरी की तरह बढ़ रहे हैं, या डिसास्‍टर की तरफ़ दौड़ रहे हैं?

इसी तरह से शिक्षा, सड़कों का इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर, शहरों की बुनावट, उनकी कार्यप्रणाली- समाज व देश के ऐसे कितने प्रसंग हैं जिसमें इस तरह के छोटे-छोटे उद्यमों की सहायता से हम आपस में दिमाग़ की कितनी खिड़कियां, व दरवाज़े खोल सकते हैं! क्‍योंकि उनके खोलने का काम अब हमारे ये राष्‍ट्रीय अख़बार और ख़बरिया चैनल्‍स तो करने से रहे. वे हमारी समझ बनाने व शिक्षा के दायित्‍वबोध से बाज़ार में नहीं आये हैं, धंधा करने आये हैं. और उसमें कुछ अस्‍वाभाविक भी नहीं. लेकिन हम मोटी चमड़ीवालों को रोशनी कौन दिखायेगा? वह तो, अगर ऐसी चाहनायें होंगी, तो हम ही दिखायेंगे न, हुज़ूर? सम्‍यक, सूचनात्‍मक और जितना संभव हो भावुकता से परे ऐसे उन सभी विषयों पर जो हमें चिंतित व उद्वि‍ग्‍न करते हों- हम छोटी-छोटी सधी तैयारियों के बाद उसका एक जगह ऑडियो-वीडियो संकलन करते चलें. फ़ि‍लहाल उसका सीधा मतलब स्‍वशिक्षा ही होगा, आगे धीरे-धीरे तय करते रहें कि उसका वृहदाकार किन-किन शक्‍लों में इस्‍तेमाल हो. हिंदी में कुछ तो हो, भइया? या बहिनी? कम से कम ज़रा जेनुइन, विहंगम हुड़दंग ही हो?..

बोलिये, बोलिये, इस तरह चुप मत रहिये.. फ़ील्‍ड में भागादौड़ी व सांगठनिक कसरत के लिए कौन-कौन हाथ उठा रहा है?..

5 comments:

  1. होना चाहिये.जरूर होना चाहिये. लेकिन कौन करेगा आपको,हमको ही करना पड़ेगा. आप रास्ता तो सुझायें जितना बन पड़ेगा करेंगे.

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  2. दैट्स द स्पिरिट, काकेश स्‍वीटी, रास्‍ता खोजते हैं, मिलेगा ससुर कैसे नहीं.. भाड़ में झुंके सिर को ज़रा ढंग से झोंकते हैं.. वैसे ''जो घर जारे आपना'' के बिना भी साथी साथ रहने का मन बनावें..

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  3. प्रमोदजी, मैं आपकी और काकेशजी की बात से पूरी तरह सहमत हूं, सरकारें जो चाहती हैं वो करती हैं, बिन ये सोचे कि इससे लोगों पर क्या पड़ता है।
    आंकड़ों की ऐसी बिसात बिछाई जाती है जो आम आदमी समझ ही नहीं सके।
    पर किसी को तो आवाज उठानी ही होगी तो फिर आप और हम क्यों नहीं।

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  4. जो घर जारे आपना'' के बिना भी साथी साथ रहने का मन बनावें..
    इतना मन तो है....बना रहे हैं...

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  5. अपने देश की राजनीति हमारी समझ के बाहर है लेकिन समझने की कोशिश हमेशा रही है.

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