Friday, April 11, 2008

खुशी क्‍या ग़म क्‍या..



महंगे जूतों की दुकान में कल दिखा सुख.. हाथ में नाओमी क्‍लाइन की नयी किताब लिये चहकता-चमकता.. कुछेक फर्लांग की दूरी पर ही वह भी रहा होगा.. अरे, वही, अपना पुराना पहचानी- दु:ख.. पटरी पर सस्‍ते हवाई चप्‍पलों को हारी हसरत से तकता.. पता नहीं कहां क्‍या-क्‍या खिचड़ी पकाते रहे हैं दोनों पुराने यार.. धमक, कसक के खिंचे, तने.. फंसे-फंसे तार.. आप भी एक नज़ारा लीजिए..

6 comments:

  1. पहली बार सुना। ये तो अद्बुत है।
    गीता दत्त नहीं गाती उसके लिए गीत... बच्चा भजन गाता है..
    सुंदर संगीत की पृष्ठभूमि में कविता ने पूरा दिलोदिमाग तर कर दिया।

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  2. कहाँ दुःख भगाए भगता है गुरु जी ? - आता है तो दिखता कहाँ? दिखता है तो देर ? फिर पैठ जाता है तो लंबा ? वैसे शुक्र है छोटे छोटे सुख के ट्रेलर दिखते रहते हैं - अन्दर एक उम्मीद भी मिली - मनीष

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  3. सुख दुख की कविता गहरे उतर रही है,पीछे संगीत में मधुर दर्द है...कब इससे पीछा छूटेगा हमारा ?

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  4. बहुत बढ़िया--एk तरफ़ शब्द खींचते हैं,दूसरी तरफ़ स्वर

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