Saturday, April 12, 2008

धूप में दिन..

चमकती धूप में चिटकता है दिन. धीमे-धीमे चढ़ती है गरमी बालों में, चिनकती है त्‍वचा, ललकते हैं गाल. सां-बां शोर के सुलगते धुओं के बीच फैलती चली जाती हैं तपती मोरम पट्टि‍यां, एक लयहीन लय में बेआवाज़ मद्धम-मद्धम चिटक रही चट्टि‍यां. कहीं बैठकी लगी थी, बजा था लेकिन अब हटा लिया गया है बाजा की तर्ज़ पर हल्‍के बिम्‍ब बनते हैं गर्म हवाओं में घुलते हैं. अच्‍छे कामवाला एक टूटा मटका, झुलनी नेकर में खुद की लफंगई में हारा लड़का, खूले में झुलस रहे कुछ रद्दी के समाचार, प्‍यास में पस्‍त व लम्‍बे इंतज़ारों में ध्‍वस्‍त शनै-शनै एक बेमतलब होता प्‍यार. आहिस्‍ता तन रही एक घनघनाती ख़ामोशी का फैल रहा जंगल है, तमककर उद्वि‍ग्‍न मन खुदी में छिनकता, खुद को उठा-उठाकर पटकता है. कहने का मतलब एक बड़ा आमफहम, सामान्‍य लाचारी के सिलसिले हैं, तपते बुखार का कारोबार है. चमकती धूप में चिटकता है दिन.

4 comments:

  1. चिट्कता ही नहीं,पसरती तीखी धूप में खटकता है दिन...

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  2. त्रिलोचन के शब्दों मे ताप के ताए हुए दिन.

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  3. मैं तो आपका फ़ैन हो गया सर !

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  4. बुखार ही है इधर असली - खिच-खिचाता है गला, हाथ पैर खिंचाता है रबर बैंड कस, मुहँ सूख-सूख जाता है, पानी घूँटेँ तो गनगना जाता है [ आजकल ई-मेल सब्सक्राईब किए हैं ]

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