Tuesday, April 15, 2008

दु:ख के प्रकार..

मुंह पर हाथ ढांपे मैं हैरानी से डाक्‍टर को देखता हूं. जबकि डाक्‍टर बिनहैरानी मेरा हाथ सरकाता बेशर्मी से मेरे दांतों तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है. दिमाग़ में एक दु:स्‍साहसी ख़्याल आता है- कि ससुर के खींचकर कुर्सी पर पटक दूं, और अपने दांतों की जगह इनके को नुकीले औज़ारों से खोदना शुरू करूं?- लेकिन दांतों की जगह पता नहीं मैं और कहां-कहां क्‍या खोद और मरोद डालूं, और दांत के दर्द के साथ हाथ में जाने कैसा एफआईआर का नया मर्ज़ चढ़ जाये, तो दु:स्‍साहसी ख़्याल पर रहम खाता उसे निकल भी जाने देता हूं. बेशर्म डाक्‍टर मुस्‍कराकर सवाल करता है- यहां दर्द हो रहा है? ऐसे तक़लीफ़देह क्षणों में मुंह जितना अलाउ कर सकती है, उतने अलाउडनेस में लाऊड होकर बरसता हूं कहां नहीं हो रहा है? डाक्‍टर मुस्‍कराता रहता है. और चित्रा सिंह नहीं, प्रमोद सिंह रोता रहता है, दर्द बढ़कर फुग़ां न हो जाये?..

घुटना मोड़ो तो मुड़े हुए घुटने को तक़लीफ़ होती है. न मोड़ो, किसी सहारे से हवा में ऊपर टांगे रखो तो कुछेक देर में एक अजीब सी सनसनाहट होती है (कानों में होती है, वह अलग है), टांगे हुए को ज़मीन पर उतार दो तो तलुओं में एक आग-सी फैल जाती है! अरे, क्‍यों हैं जीवन में इतने दर्द? टोटल कितने हैं? बुद्ध ने शॉर्टहैंड में एक लेंड़ी लाइन कह दिया था- जीवन में दु:ख है- और चुप्‍पे से ससुर बिहार और यूपी टुअर पर निकल गए थे! जबकि मुझे लगता है आज निकलने की नहीं, ठहरकर प्रॉपरली दु:खों के लिस्टिंग की ज़रूरत है! बारातियों को पकवान के कितने प्रकार पेश किये जायेंगे पता रहता है, टुच्‍ची हिंदी फ़ि‍ल्‍मों का जानर पता रहता है, फिर चुनाव हुए तो इस तरह या उस तरह किस-किस तरह हम नये लात खानेवाले हैं इसकी स्‍पष्‍ट प्रतीति होती है, फिर दु:ख के प्रकारों की क्‍यों न हो? मैं चुन्‍नू की मम्‍मी नताशा त्‍यागी की साड़ी पकड़ता हूं- भाभी, जीवन में कितने दु:ख हैं, ज़रा उसकी लिस्टिंग समझाइए?..

नताशा त्‍यागी मुझे ऐसी चोटखायी नज़रों से देखती हैं मानो उनकी साड़ी पकड़ने का मेरा तरीका उन्‍हें दु:खी कर गया हो. चुप रहती हैं. मैं चिढ़कर कहता हूं- अरे, आप पकवान बनाती हैं, उसके प्रकार होते हैं कि नहीं? फिर दु:ख के क्‍या होते हैं, बताइए मुझे?

मिसेज़ त्‍यागी अच्‍छी भाभी की तरह मुझ बुरे देवर का हाथ अपने हाथ में लेकर दुलार से कहती हैं- पकवान सिर्फ़ दो तरह का होता है. प्‍यार में पकाया हुआ, या बेगार से बनाया हुआ.. दु:ख का मैं नहीं जानती.

गुस्‍से में हाथ छुड़ाता मैं तुनककर कहता हूं- कैसे नहीं जानतीं? और दो ही तरह का कैसे होता है पकवान? शिष्‍टाचार के व्‍यभिचार में नहीं बनता पकवान? वह नयी किस्‍म नहीं हुई? और वह जो इतवार को बनता है? चुन्‍नू के फादर जो लास्‍ट टाइम बीमार पड़े थे, और आपने ख़ास बीमार का पकवान बनाया था, उसका क्‍या?..

उसका कुछ नहीं. भाभी निर्मोही होकर मेरा हाथ और साथ छोड़ देती हैं, मैं सिर घुनने को अकेला छूट जाता हूं.. मगर इतना अकेला भी नहीं छुटता हूं. कॉरीडोर में फुसफुस कर रही उस उम्र की चार-पांच देसी लड़कियां हैं जो एक-दूसरे को कोंच-कोंचकर फुसफुसाहटों में पूछ रही हैं- रेनु, तेरे को वो वाला गाना याद है, बोल ना? अच्‍छा, वो वाला? मैं मौक़ा-ऐ-नाज़ुकी का ख़याल करके संजीदा बने रहने की जगह डपटकर बरसता हूं, अबे, ये गाना-टाना छोड़ो, बताओ मुझे जीवन में कितने दु:ख होते हैं? पूरी लिस्‍ट दो, अभी!..

इस अप्रत्‍याशित आक्रमण से लड़कियां एकदम सन्‍न. फुसफुसी बेचारियां एकदम ढेर हो जाती हैं. एक के मुंहासाभरे उदास चेहरे पर किसी तरह एक पोस्‍ट-बीमारी रंगत लौटती है, और वही है जो सिर झुकाये मेरे सवाल का फुसफुसाकर जवाब देती है- जीवन में दु:ख तो एकीच है, अंकल.. कि अभिषेक ने मेरे को अपना नईं बनाया!..

जीवन में बेवक़ूफियों का अंत है? या दु:खों का? फिर भी मैं हूं कि भावुकता के आशावाद में उनकी लिस्टिंग के सपने संजो रहा हूं. क्‍या मालूम, शायद सचमुच कोई दिन हो जब तकिये के नीचे पूरी लिस्‍ट रखकर आश्‍वस्‍त हो सकूं, घोड़े या जो भी पास में हो, बेचकर चैन से सो सकूं.. कि मालूम रहे कि सपने में दु:ख आकर ऊटपटांग छलांग नहीं मारने लगेगा.. और मारेगा भी तो मैं डांटकर उसे बरज सकूंगा कि ससुर, तुम लिस्‍ट में एक्‍ज़ि‍स्‍ट नहीं करते तो खामखा फुदको मत? और दु:ख बेहया मुंह गिराये ज़मीन पर चला आयेगा और मैं गर्व से मुंह उठाये मज़े में सो सकूंगा?..

ओह, कितना आह्लादकारी दिन होगा, मगर पता नहीं कब होगा? अभी तो लिस्‍ट वाली बात लटकी ही हुई है.. ग़लती से कहीं आपके पास तो नहीं? दु:ख के प्रकारों की ऑथेंटिक लिस्टिंग?..

13 comments:

  1. फिफ्टी परसेंट समझ में आ गया. बाकी नहीं आया. फिलहाल तो यही बड़ा दुःख है.

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  2. दुखों की लिस्ट तो हमारे पास भी नहीं है. याद आता है जब हमारे दाँत में दुख उतरा था. जब जब हम आफ्टर शेव स्प्रे करते तब तब वह दुम दबा कर भाग खड़ा होता.

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  3. mujhe to laga ki sab dusre ke sukh se hi dukhi hain... par yahan to maazra hi alag hai :-)
    http://ojha-uwaach.blogspot.com/2008/03/blog-post_17.html

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  4. जब अपने पर पडती है तो इसी तरह फ़िलासफ़ी याद आती है.

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  5. लिस्‍ट? आथेंटिक लिस्टिंग किधर है? उसके बारे में कोई बात नहीं कर रहा? सब घलुआ-ठेलुआ टहल रहे हैं?

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  6. दुख दो प्रकार के होते हैं-
    परसीव्ड और अनपरसीव्ड

    उजालों के दुख...उनमें खिलते ...बनते बिगड़ते रंगों के दुख....अँधेरों के दुख....जो कितना भी आँख फाड़कर देखे पर छिप जाये वैसा दुख....

    आवाज़ का दुख...जो शब्द,बात और रूदन में बँधता है....मौन का दुख जिस तक हर तरंग छू कर नि:शब्द लौट जाती है....

    स्पर्श का दुख....जब साथ में नकारात्मक ऊर्जा लेकर चलती है....ऐसे स्पर्श के ना छूने का दुख जो कभी हाथ नहीं आती है....

    गँध का दुख...जो हर बुराई से आती है...सुगँध का दुख...जो कहीँ दिमाग पर बनती है पर सूँघी नही जाती...

    स्वाद का दुख जो आँसू में घुलता है...और उस स्वाद का जिसके लिये जीभ ललचाई रह जाती है....

    होने और ना होने के बीच...नींद और जगने के बीच ...किसी सपने का दुख...किसी सच का दुख.....

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  7. @बेजी, आप ये बताइये, आप आश्रम कहां खोल रही हैं? मैं इंटरेस्‍टेड हूं?मुझे जेनुइनली लगता है ऑथेंटिक लिस्टिंग आपही के पास है?

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  8. खाली दुःख के प्रकार बता दिए. हर प्रकार का आकार भी बताईये. या फिर ई दुःख निराकार है?....वैसे दर्द बढ़कर फुगां न हो तो अऊर रोना है..केतने लोग रो रहे हैं...शिकायत एक ही है; ई दर्द फुगां नहीं हो रहा...दर्द उनके रोने से दुखी है..

    दांत का इतना चिंता काहे करते हैं...ई मंहगाई के जमाने में आंत ने ज्यादा परेशान कर रखा है...पहले कुछ मिले तब न जाकर दांत अपना साइड हीरोगीरी शुरू करेगा..कुछ मिलबे नहीं करेगा त दांत का कौन रोल है..लिस्टिंग का चलते ही त सब हुआ है...गेंहूं-चावल से लेकर आलू-पियाज तक का लिस्टिंग एक्सचेंज पर हो गया है...अऊर लिस्टिंग के बाद ई सब खुश है...ऊपर से दुःख फैला रहा है...

    लेकिन ई दुःख का लिस्टिंग कौनौ एक्सचेंज पर नहीं है...सही है...ऊ का लिस्टिंग त हम सबे के करना पड़ेगा...

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  9. महाराज, बेजी के आश्रम में दो बुकिंग कराना...आप रहोगे यानि कोई पहचान का रहेगा तो थोड़ा दुख तो यूँ भी कम हो जायेगा फिर बेजी का मंतर तो चलबे करेगा. बड़ी लम्बी लिस्ट है भाई....छटते छटते ही छटेगी. आसान नहीं है राह पनघट की.


    बुद्ध ने शॉर्टहैंड में एक लेंड़ी लाइन कह दिया था- जीवन में दु:ख है- और चुप्‍पे से ससुर बिहार और यूपी टुअर पर निकल गए थे!--ये तो सही आबजर्वेशन रहा.. :)

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  10. दुखवा मैं कासे कहूं !
    बेजी का दुखों का वर्गीकरण पसंद आया...
    पिछले दिनों बहुत व्यस्त थे महाराज इसलिए इस धाम नहीं आ सके। अभ दो महिना और रहेंगे। बीच बीच में हाजिरी न लगा पाएं तो दुखी न होइएगा...

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  11. दुख सबको मांजता है ...................
    {अज्ञेय }
    आपको भी मांजेगा ,बल्कि धो भी डालेगा और फिर निचोड़ेगा भी ।
    बेजीआश्रम में आप लोग केतना उतपात करेंगे हमे दिख रहा है । इसलिए बेजी जी डंडा उंडा चलाने को हमें रखेंगी ही ।
    बाकी एक दुख होता है - किसी को दुखी नही कर पा रहा ....इस बात का दुख ...!

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  12. वोटिंग के द्वारा 'ऑथेन्टिक लिस्टिंग' और फिर उसका 'जेनुइन कम्पाइलेशन' हो जाए तो बताइएगा . मिलकर कोई नया 'अष्टांग' या 'दशमांग' या फिर 'वामांग' मार्ग खोजेंगे .

    बेजी का दुखों का काव्यात्मक वर्गीकरण सर्वथा मौलिक है . आपका तो नोबेलीकरण हो ही चुका है लगे हाथों उनका नाम भी प्रस्तावित कर दीजिए .

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  13. गुरुदेव - हमारे पास कोई लिस्ट उस्ट नहीं बची है - दुःख तो दुःख है - कहाँ उसका जीव विज्ञान छाँट रहे हैं ? - इन्द्रियां दुःखदायी हैं तो रहें, सम्बन्ध दुःखदायी हैं तो रहें, सपने भी (?) - हरे, नीले, लाल, नारंगी, खाकी, सुपैद जैसे भी हों - दुःख तो जो ज़्यादा होता है और होता रहता है वही हैगा - बाकी तो समय बिताने के लिए करना है कुछ का काम हैं - सादर - मनीष

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