Wednesday, April 16, 2008

आमतौर पर छेरते रहनेवाले बचपने के विरुद्ध..

आमतौर पर बच्‍चे अच्‍छा होना चाहते हैं. मगर बहुत बार नहीं हो पाते. बहुत बार यह इसलिए भी होता है कि वे अपने बचपने की जगह यहां-वहां लटके आमों के पीछे भागते हैं.. भागते ही नहीं, मुंह भी मार आते हैं, और उस फोड़ा-फुंसी वाले मुंह से इधर-उधर फोड़ा-फुंसी फेंकते हुए उसीको अपनी पहचान बना लेते हैं.. और इस तरह अच्‍छा बच्‍चा होने से रह जाते हैं.. ऐसे बच्‍चे की दिक़्क़त होती है कि बहुत टेरता है, जहां ज़रूरत न हो वहां पहुंचकर छेर आता है.. घर में घुसते ही कहेगा पेचिश है, जबकि बाहर निकलते ही ठेलना शुरू कर देगा कि हमको ‘जाना’ है? कक्षा में इसे अदबदाकर जाना पड़ता रहता है. मिस और माट्साब ही नहीं, बकिया के बच्‍चे तक आज़ि‍ज़ आ जाते हैं कि देखो, अब टुन्‍नुआ जाने की बात करेगा? देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती, टुन्‍नुआ चट् से अपनी बेंच पर खड़ा हो ही जाता है कि सरजी, हमको जाना है! या चाचाजी, मौसाजी, भैयाजी.. सामनेवाला विशेषण कुच्‍छो बदल जाये, जाने की बात अपनी जगह अटल बनी रहती है!..

ऐसा नहीं कि बच्‍चे छेरते नहीं. छेरना बच्‍चा-स्‍वभाव है. मगर टुन्‍नू बच्‍चा-स्‍वभाव की विशिष्टिता है वह निहायत नाटकीय परिस्थितियों में भी प्रेडिक्‍टेबल बना रहता है. ऐसा नहीं कि कक्षा में कोई नयी मिस लाल या मिस मोइत्रा आ गयीं और उनकी खूबसूरती के असर में टुन्‍नू लाल का हाजमा किसी नयी चाल पर निकल ले. ना, वह असंभव होगा. वह टुन्‍नू प्रकृति के विपरीत होगा, टुन्‍नूपने के विरुद्ध होगा. वह जो होगा फिर टुन्‍नू नहीं होगा. टुन्‍नू तो यही होगा कि मिस लाल या मिस मोइत्रा उसे कक्षा के अंदर गंदगी करने के लिए बरजें तो टुन्‍नू बाबू दरवाज़े पर छेर आयें. या नींबू के झाड़ के गिर्द घेरेवाले ईंटों के पास, और भले मिस लाल या मिस मोइत्रा समस्‍त छेराई प्रसंग भूल गयी हों तब्‍बो टुन्‍नू मियां क्‍या मजाल की उन्‍हें भूलने दे जायें? नज़दीक आकर उनकी उंगली थाम लें कि मिसिस, नहीं आप समझ नहीं न रही हैं, अरे, नहीं, कच्‍छा में नहीं, नींबुआ का झारी का पास झारा छेरे हैं?..

बच्‍चा और बचपन बड़ी सुहानी चीज़ें हैं. आमतौर पर उसकी ओर मुंह करके जीवन के आशामय होने की सहज प्रतीति होती है, मन जुड़ाता है. लेकिन यह मत भूलिये कि आमतौर पर कह रहा हूं, हरतौर पर नहीं. हरतौर में बहुत सारे ऐसे टुन्‍नू और मुन्‍नुओं की भी शुमारी होती है कि वह कैसी भी महफ़ि‍ल को अपनी छेर से सजाने चले आयेंगे. और सजायेंगे ही नहीं, लेंस नचा-नचाकर बार-बारके सबको दिखाते भी रहेंगे कि देखो, कैसा अच्‍छा छेरे हैं न, जयदीप भइया? बहुत चिनुर-चिनुर कै रहे थे, हमने कहा देखिये, बोलते हैं, चुप रहिये नहीं त् अभिये चुपवा देंगे तब बुझा जायेगा? लेकिन काहे ला, नहीं चुपा रहा था, भइया, तब हम आव देखे न ताव, नारा खोले और वहिंये छर्र-छर्र छेर दिये, सब महफ़ि‍लये डेगमेगा गया, हं!

इस दुनिया के टुन्‍नू.. और मुन्‍नू.. सचमुच धन्‍य हैं. कभी-कभी सोचता हूं क्‍या करना है मुंह लगके, अपने वैसे ही इतने टंटे हैं, और क्‍या पता हमने मुंह खोला, हमरे मुंहें पर ससुर छेर जायें.. तो अच्‍छा-बुरा सोचकर चुप रह जाते हैं.. मगर कभी-कभी फिर ससुर नहीं भी रह पाते.. छेरने के विरुद्ध बोलते-बोलते हम भी अंतत: छेरते ही होते हैं.. इस महकाइन के लिए माफ़ कीजिएगा..

9 comments:

  1. बहुए गजब महकाईन फैलाये हो भाई..का माफ करीं???

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  2. ये क्या टुन्नात्मक विश्लेषण करने बैठ गए आप? बनी रहने दीजिये थोडी सी टुन्नूनेस. का बिगाड़ती है?
    बाकी समझ में आया: साढे चौबीस परसेंट.

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  3. और, इसीलिए तो हम आपके इसी, अजदकी, छेरने वाले अजब अंदाज के दीवाने हैं!

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  4. क्या गुरूजी - "परिचय" सलीमा देख कर उठे क्या ? [ :-)] p.s. - हम ई-मेल सब्स्क्राईब किए हैं पर पोस्ट लेट आता है (एक पुराना) - ऐसा क्यों ?

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  5. @जोशिम प्‍यारे, इस ई-मेल सब्‍सक्रीप्‍शन की लेट-लतीफी का तो हमारे पास भी जवाब नहीं.. (हमने किसी दुबईवाले भाई के खिलाफ़ कभी कुछ लिखा भी नहीं?).. शायद किसी तकनीकी ऊंट के पास इस सरसों सवाल का समाधान हो? कुछ ख़बर लगती है तो आपको इत्तिला करता हूं..

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  6. "...इस ई-मेल सब्‍सक्रीप्‍शन की लेट-लतीफी का तो हमारे पास भी जवाब नहीं...."

    इसका जवाब किसी के पास नहीं क्योंकि फ़ीडबर्नर से रीडायरेक्ट होने में कोई घंटाभर लग ही जाता है.

    फ़ीडबर्नर सेवा की दिक्कत है.

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  7. बहुत ज्यादा छेरिएगा न, तो स्थानीय संपादक बना देंगे। फिर तो ठेंपिए नहीं लगेगा, छेरते ही रह जाइएगा चौबीसो घंटे। बुझाया कुछ कि नहीं बुझाया, ऐं?

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  8. राजस्थानी में एक कहावत है :

    'टांडै क्यूं? सांड हूं , छेरै क्यूं? गऊ को जायो हूं'

    बाकी आप खुदै समझदार हैं सो विश्लेषण क्या करना . छेरन क्रिया की त्वरा और उसके फ़ोर्स के सामने कोई ठेंपी काम नहीं करती . एक और राजस्थानी कहावत यही बात इस तरह कहती है कि 'पून भींच्यां पूंकाड़ो कोन्या डटै'.

    किछु बूझलेन ?

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  9. आप किसी टुन्नू मुन्नू से कम हैं क्या ?

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