Thursday, April 17, 2008

ज़ि‍न का जिन्‍न..

जैसा नेट सर्फिंग में आमतौर पर होता है कि आप एक जगह से भटकते हुए दूसरी जगह जाकर अटकते हैं, मैं पिछले तीन-चार दिनों से कुछ लेखक हैं, किताबें हैं, सरक-सरककर उनके बीच पहुंच रहा हूं. हार्ड कॉपी नहीं, सॉफ्ट कॉपी, वह भी ई-बुक्‍स से ज़्यादा ऑडियो बुक्‍स की शक्ल में. ई-किताबें ज़्यादातर चॉम्‍स्‍की साहब की हैं (जिसे चाहिए ई-मेल लिखकर मुझसे प्राप्‍त कर ले. क्‍योंकि मैंने भी प्राप्‍त ही किया है, कंप्‍यूटर के स्‍क्रीन पर कोई राइट-अप पढ़ने में ही कांखने लगता हूं, तो किताब, और वह भी चॉम्‍स्‍की साहब की, कब पढ़ूंगा, मेरे लिए शुद्ध रहस्‍यवाद है).. ऑडियो किताबों की शुरुआत हुई थी अपने मोतिहारी की पैदाइश बाबू जॉर्ज ऑरवेल के ‘1984’ की एक सन्‍न कर देनेवाली रिकॉर्डिंग से. लगा, गुरु, यह तो बड़ा मज़ेदार मामला है? उसके बाद से अपन तफ़रीह में जुटे पड़े हैं. बहुत सारे चिंतकों और उनकी पिनकों का हमने कंपाइलेशन कर लिया है. नाम नहीं गिना रहा क्‍योंकि नहीं चाहता कि सुबह-सुबह आपका हाजमा बिगड़ जाये. मगर दूसरी दिल जुड़ानेवाली चीज़ों के साथ एक जो काम की चीज़ हाथ लगी है, वह हॉवर्ड ज़ि‍न की ‘ए पीपुल्‍स हिस्‍टरी ऑव द युनाइटेड स्‍टेट्स’ के आखिरी के हिस्‍से की मैट डेमन की आवाज़ में रिकॉर्डिंग है. उस हिस्‍से के एक टुकड़े की झलक आप यहां देख सकते हैं. पहले के हिस्‍सों में से, दूसरे चैप्‍टर की सैंपलिंग यहां है. पतली-दुबली क्षीणकाया ज़ि‍न साहब के जोश से अपने भीमकाय समीर भइया को निश्चित ही सबक लेना चाहिए. मैंने पहले ही ले लिया है, इतिहास की गुरु गंभीरता को एनिमेशन के अगंभीर चश्‍मे से देखने की कोशिश कर रहा हूं. आप भी अपनी औकात अनुरूप दृष्टि व कोण तय कीजिए..

3 comments:

  1. देखा जिन्न। अभी और देखना है। आप भी इस विधा में कूद पड़िये। आवाज अच्छी हैइयै। बस्स एनीमेशन सीखना है। सीख लीजिये। बकिया समीरलाल किसी से सबक न लेंगें।

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  2. हॉवर्ड जिन साहब का जोश तो वाकई काबिले सबक है. आप सबक लिये हैं जानकर बड़ी तसल्ली हुई. असर देख लें फिर विचारते हैं. ये अनूप जी भी न-बस, मन्नई फरमान जारी करते हैं!! :)

    उनकी वो एनीमेशन सीखने वाली बात पर जरा कान दिजिये जरा-वो काम की बात है.

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