Monday, April 21, 2008

मैं कूबा हूं.. अथ कुत्‍ता मनोभाव के कुछ चित्र..

मैं कहीं कवि न बन जाऊं तेरे प्‍यार में ऐ कविता.. या सविता? कि नमिता?.. वैसे मुझ से क्षुद्र व छिद्र-सज्जित, जाने किस तरह की मनई के लिए, शायद अच्‍छा यही हो कि मैं वंचिता के प्‍यार में ही जो बनना हो, बनूं.. प्रैगमैटिक और डॉगमैटिक दोनों ही रुपों में यह रास्‍ता संभवत: सबसे कम रिस्‍की रास्‍ता रहे?.. शायद?.. वैसे क्‍या यह सही नहीं कि- वंचिता और संचिता तो बाद की बात हैं- प्‍यार में तो कुत्‍ते के भी पड़ना कम रिस्‍की नहीं होता? मुझसे नहीं, विमल से पूछिये. कुत्‍तों से प्‍यार के विमल के विहंगम व ज़्यादा गहरे अनुभव हैं. मेरे अनुभव ज़्यादा कुत्‍ता-अनुभव ही हैं. माने बड़ी सीधी बात है कि नौकरी छूटते ही संवेदी समाज जैसे आपको फेसबुक की अपनी लिस्‍ट से (चुपके से) हटा देता है, तो कुछ उसी तरह से किसी कविता (या सविता) के जीवन में आते ही आप (पता नहीं किसको) कुत्‍ते की तरह काट खाने को विकलने लगते हैं! अब दिक्‍कत यही है कि वह लव-बाइट कम होती है, मोस्‍टली कुत्‍ता-बाइट होती है. मोस्‍टली हमें आज तक यही सुनना पड़ा है कि आदमी की तरह नहीं काट सकते थे? आदमी हो या कुत्‍ते?.. मैंने हमेशा पलटकर जवाब देना चाहा है, मगर हमेशा पलटकर जवाब देने से रह भी गया हूं.

कहने का मतलब नमिता, या वंचिता के प्‍यार में कवि, या कुत्‍ता, होना मज़ाक नहीं! कवि होना ज़्यादा ख़तरनाक है. क्‍योंकि कवि होते ही आप अपने को गंभीरता से लेते हुए कवितायें लिखना चाहने लगते हैं, जबकि बाकी लोग आपको गंभीरता से लेना बंद कर देने लगते हैं.. परिणामत: अदबदाकर आपका कटखनापन उभर आता है, और आप कवि होवें उसके पहले कुत्‍ता हो जाते हैं?..

कुछ इसका वे-आऊट होगा. मैं कवि होता तो आपको बताता भी, मगर हा: जीवन, कवित्‍व के रास्‍ते कहां, कुबा के रास्‍ते यह हतभागा भागा गया.. एक एंगल उसका यह भी है.. जो है, सुनिये.. कल रात एक मित्र ने साठ के दशक की एक मशहूर क्‍यूबन फ़ि‍ल्‍म 'सोय कुबा' की डीवीडी आंखों के आगे झुलाया.. और मैं चट् से जीभ बाहर निकालकर कुत्‍ता होने लगा! अनंतर बतिस्‍ता सरकार के दिनों क्‍यूबन लोगों के शोषण के मार्मिक किस्‍सों से भरी फ़ि‍ल्‍म को देखते हुए भी तन व मन में कुत्‍ताभाव बढ़ा ही, कम नहीं हुआ. देर रात घर लौटा तो ख़बर हुयी जो पॉडकास्‍ट की पोस्‍ट अपन चढ़ाकर घर से बाहर निकले थे उसमें तकनीकी लोचा है, और कोई माई का लाल (या लाली) उसे कान उल्‍टा करके भी नहीं सुन सका है. मेरे मेल में चार महीन किस्‍म की निजी शिकायतें थीं. महीन थीं या मोटी थीं, थीं शिकायतें ही. कहने का मतलब यही कि ऐंड़े-बेंड़े किसी शक्‍ल में मैं कवि होने के रास्‍ते पर गलती से पहुंच भी गया होता तो पलटकर एकदम से कुत्‍ता मन:स्थिति में लौट ही आता. लौट ही आता क्‍या लौट आया ही..

और अब सोच रहा हूं सविता, या वनिता के प्‍यार में कविता करने की जगह सबसे पहले उस पोस्‍ट को काट खाऊं जो अब तक बिना मुंह खोले मुझे चार जगह (दूसरों को पता नहीं कितनी जगह) घायल कर चुका है!

अच्‍छा नहीं लग रहा.. मतलब सुबह शुरू करने का यह भला कोई तरीका है? आदमी की तरह काटने की जगह कुत्‍ते सा काटना.. तरीका? या सलीका?..

5 comments:

  1. माफ़ी के साथ---आप किसी पर गुस्सा है ??

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  2. @पारुल, हां, उस पॉडकास्‍ट पर जो स्‍वयं को सुनवा नहीं पायी. फिर बहुत सारी लड़कियां भी हैं मगर वह अलग कहानी है..

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  3. अपनी पोस्ट पर ऐसा गुस्सा ? कभी नहीं !हरगिज नहीं!!पोस्ट तो पोस्ट है एक और तो लिख दिया आपने...और हमने पढ़ भी लिया..

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  4. jo unsuni rah gayi..usey dobaraa sunvaayiye

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  5. पढ़ लिया। थोड़ा मुस्कराये भी। कहां? ई हम न बतायेंगे। :)

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