Tuesday, April 22, 2008

ऊंट के मुंह में क्‍या..?

आनेवाले वक़्तों में शहरों व देहातों के बीच बढ़ती दूरी की खाई- और तद्जन्‍य उपजे व उबलते तनावों, टकरावों की कहानियां एक कंटिन्‍युअस डिस्‍टर्बिंग थीम बनी रहनेवाली हैं. विकास के जिस मॉडल का अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर भोंपा बज रहा है, और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर जाने कौन-से राष्‍ट्रीय चरित्र की सरकारें उसे समूचे देश पर ठेल रही हैं, उस विकास की एक ख़ास पहचान है कि वह देहातों का ‘मोलभाव’ करने से अलग- उसे अपने साथ लेकर नहीं चलना चाहती.. इच्‍छाशक्ति का अभाव है जैसी बात नहीं, उस ऑल-इंक्‍लूसिव विकास का वह विचार ही अनुपस्थित है.. जैसे यहां और वहां का पैसा ले-लेकर सरकार उच्‍च शिक्षण संस्‍थाओं में खूब-खूब पैसा झोंकेंगी, मगर आज़ादी की इतनी लम्‍बी अवधि के बावज़ूद, प्राथमिक शिक्षा की ज़ि‍म्‍मेदारियों से हर स्‍तर पर पल्‍ला झाड़ते रहने का हर संभव प्रयास भी करेगी.. और जुड़े दिखने की कोशिश करेगी भी तो उसका चरित्र शुद्ध लफ़्फ़ाजी से ज़्यादा कुछ न होगा.. क्‍योंकि कंगले देहात के कंगले बच्‍चों के चौतरफे आत्‍मनिर्भरता की बजाय खाते-पीते कॉरपोरेट व सर्विस सेक्‍टर- राष्‍ट्रीय व अंतर्राष्‍ट्रीय दोनों- की सेवा के लिए सिपाही तैयार करने में उसकी असल चिंता ज़्यादा होगी.. जो वह उत्‍कट उत्‍साह से कर ही रही है.. आनेवाले वक़्त में नये-नये आईआईएमआईआईटीज़ खुलें तो ऐसी ख़बरों से अपनी बांछें खिलाने के पहले आप एक बार राष्‍ट्रीय स्‍तर पर प्राथमिक शिक्षा की बदहाली व उसके दो कौड़ी के बने रहने पर भी एक मर्तबा पहले सोच लीजिएगा.. क्‍योंकि वह चित्र भी इसी राष्‍ट्रीय परिदृश्‍य का हिस्‍सा होगा!..

मगर फिर इतनी बड़ी संख्‍या में देहाती दुनिया व उस बड़ी आबादी का होगा क्‍या? क्‍योंकि सारा विकास अगर शहर केंद्रित हुआ और देहात उसके हिस्‍सेदार न हुए तो बेचारे वहां के लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे तो रहेंगे नहीं.. और न सब कर्नाटक, आंध्र, महाराष्‍ट्र के दिखाये जाजल्‍वयमान रास्‍ते पर उत्‍साह में आत्‍महत्‍या करने लगेंगे? फिर?.. रोज़ग़ार के मोह में जीवन की न्‍यूनतम व्‍यवस्‍था के लिए भाग-भागकर शहर आयेंगे कि शहर में राज ठाकरे के ठुल्‍ले लाठियों व गालियों से उनका स्‍वागत करें? या गांव में खैनी पीटते, ताश खेलते किसी महापुरुष, मदर टेरेसा.. या अपने बीच के किसी ‘बड़का’ हो गये की दयानतदारी के भरोसे बैठे रहेंगे जो विदेशों में कमाये पैसे से आकर उनका उद्धार करने कभी आयेगा?.. हमारे गांवों की बेहतरी अब महज़ ऐसे ही इंडिविज़ुअल एडवेंचर्स के ही आसरे चलेगी?..

शतुरमुर्ग की तरह हम विराट देहाती परिदृश्‍य से आंखें न मूंदे रहें.. और उसकी याद सिर्फ़ चुनावों के दौरान ही न करें.. विकास में कैसे उसकी भी हिस्‍सेदारी हो यह सब सोचनेवाली बातें है.. या फिर.. जैसाकि ढेरों लोगों ने, सामाजिक स्‍तर पर उम्‍मीद छोड़कर, उसे निजी सेवाभाव के आसरे छोड़ दिया है, जो आज के उदास वक़्त में खुद में स्‍वागतयोग्‍य बात ही है- जैसाकि साथ के इस लिंक में विश्‍व बैंक में कार्यरत उड़ीसा के दिलीप रथ की सदिच्‍छाओं की खुदबयानी की कहानी में आप देख सकेंगे.. मगर ऐसे उद्यमों का वृहत तस्‍वीर बदलने में ऊंट के मुंह में जीरा से ज़्यादा क्‍या असर होगा? होगा?..

9 comments:

  1. तिल..ऊँट के मुंह में तिल..जीरा तो पहले होता था.. जब मैं गाँव के स्कूल में पढ़ता था...१९७५ में..तब स्कूल की पाँच कमरे वाली इमारत थी...अब स्कूल की इमारत नहीं रही...कमरे की बात जाने दें.

    हमने इतने सालों से ये किया है.

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  2. मेरे ख्याल से भूमंडलीय उपभोक्तावाद के जिस टाइटनिक में पिछले कई वर्षों से हम सवार हैं वह इसी साल या अगले साल तक मंदी के आइसबर्ग से टकराकर डूबने लगेगा। इसे बचाने के एक उपाय के रूप में शायद कुछ राजनीतिक लोग खेती-किसानी, गांव-जंवार की बात करना भी शुरू करेंगे। यह कोशिश कितनी गंभीर होगी, यह मंदी की विराटता पर निर्भर करेगा।...और यह दौर अगर सन 30 की मंदी की तरह लंबा खिंच गया (जिसकी आशंका भरपूर है) तो सरकारों से ज्यादा बड़ी भूमिका सरकार विरोधी जमीनी ताकतों की बन सकती है (जिसे विश्व बैंक निकट भविष्य में कम से कम 47 देशों में खाने के लिए होने वाले दंगों की आशंका के रूप में चिह्नित कर रहा है।)

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  3. बिल्कुल सही कहा है आपने...पूरी सच्चाई है यही..

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  4. सोच रहा हूँ बहुत कुछ सोच रहा हूँ.कभी पढ़ा था 'आओ हथियार उठायें हम भी".लगता है देश की ऐसी ही कुछ परिस्थितियों में लोग हथियार उठा लेते होंगे.देश सही जा रहा है.

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  5. आपकी पोस्ट और उस पर भाई चंद्रभूषण की टीप पढकर हताशा और बढ गई . कोई रास्ता दिखता है अंधेरी सुरंग के पार ?

    ये कहां आ गए हम ............... और कहां जा रहे हैं ?

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  6. इस तरह की बातें एक टिस सी पैदा करती तो हैं उसके बाद हम फिर अपने में खो जाते हैं,अब कॉरपोरेट खेतों की तरफ़ बढ़ रहा है...देखते हैं और क्या क्या होता है? वैसे आपने भी बहुत अच्छा लिखा है और समझने के लिये बेहतर लिंक भी दिया है.....अच्छा लगा समझदारी ्बढ़ाने के लिये शुक्रिया मित्र

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  7. आपका आलेख और चंदू भाई की टीप-चिंतित कर रही है.

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  8. जनता के लिए आनेवाली राह्त सामग्री भी ऊंट के ही मुंह में ही जाती है.

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  9. आपकी चिंताये जायज हैं। इस तरह के लेख लिखते रहें।

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