Wednesday, April 23, 2008

समझदार, गंभीर व गहरे लोगों की खोज में लड़की की दिक्‍कतें..

मैं हमेशा कोई नया एंगल पकड़ने की कोशिश करता और पकड़ नहीं पाता, और एक हारे-हारे से अहसास में बेचारगी महसूस करता. जबकि लड़की थी वह सारा कुछ पकड़े हुए थी और उस पकड़े को लगातार पीटती चलती. जब न पीटती होती तो पिट रही होती, मगर तेवर और पिच में विशेष फर्क़ न आता. मुंह खोलते ही वह व्‍यास की तरह चालू हो जाती कि यह सही है वह ग़लत है, मैं ऐसी हूं और वैसी हूं और दुनिया कितनी गंदी है और इसमें सांस लेना दूभर है और इस पर बम फेंक देने का मन करता है आदि. और इत्‍यादि. और इसके बाद वह निश्चिंतभाव एकरस घाराप्रवाह बम फेंकने लगती. दु‍निया जस की तस अपनी जगह बनी रहती, बस मेरे चिथड़े होने लगते. कभी इस भयानक थकाऊ ऊब को तोड़ने के लिए मैं हंसने लगता. फिर सहमकर चुप भी हो जाता कि मैं किसी और पर नहीं, महज अपने अज्ञान पर हंस रहा हूं. क्‍योंकि मैं ठीक-ठीक समझ नहीं पाता था कि लड़की चाहती क्‍या है. जबकि लड़की तैयार घड़े की तरह सब समझी हुई थी. कुछ भी उसके ऊपर, या अंदर, गिरते ही उसका पीटना चालू हो जाता. या पिटना. सब एकदम मशीनी मामला था. और जीवन के जोड़-घटाव में मैं भले एकदम मशीनी हो गया होऊं, इस मशीनी मार-प्रतिकार के आगे मैं पूरी तरह अबस हो जाता. और किंकर्त्‍तव्‍यविमूढ..

लड़की के नोटबुक में तीन बटे चार गुना दो भागा सात दुनिया का गणित एकदम साफ़ था. ये अच्‍छे हैं वो बुरे हैं फलाने नीच हैं ढिकाने अधम हैं और यही दुनिया है और इसी दुनिया में उसे रहना है और ओह, कैसे वह रह नहीं पा रही है! कभी मेरी इच्‍छा होती कि उससे कहूं वह बांग्‍लादेश चली जाये? बुरकिना फासो.. या राबर्ट मुगाबे के जिम्‍बाव्‍वे? शायद उन देशों में उसे चैन पड़े? मगर यह सब कहने की नौबत न आती.. क्‍योंकि लड़की ने आलरेडी बम चलाना शुरू कर दिया होता.. मेरी दुनिया की शांति, मूढ़ता, मेरे चेहरे के बाल सब उस आग में जलकर खाक़ हो रहे होते!..

अजब गोरखधंधा था. माने नौकरीपेशा लड़की बिना नौकरी के जीवन जी नहीं सकती थी, और नौकरी की जगहों पर सब कहीं उसे चिरकुट ही चिरकुट नज़र आते जिनके बारे में उसे जानने की कोई ज़रूरत नहीं थी क्‍योंकि वह तो दरवाज़े से दाखिल होते ही जान गयी थी कि ये चिरकुट हैं और चिरकुटों को इंडल्‍ज करना उसका नेचर था नहीं. ऐसा लड़की साफ़-साफ़ शब्‍दों में जानती ही नहीं थी, साफ़-साफ़ शब्‍दों में ऐलान भी करती थी. ऐसी दुनिया का फ़ैसला धुआं में उड़ाकर करने के अनंतर वह अपने शहंशाही फ़रमान पर लौट आती- कि मैं केवल समझदार, गंभीर व गहरे लोगों से बात कर सकती हूं! मैं सहमकर सांस लेता कि चलो, अच्‍छा हुआ वह बांग्‍लादेश, बुरकिना फासो और जिम्‍बाव्‍वे वाली सलाह मेरे मन में ही रह गयी. क्‍योंकि मैं नहीं चाहता कि लड़की मेरे कहने पर किसी ऐसी जगह पहुंच जाती, फिर वहां जाकर पीटना शुरू करती कि ये चिरकुट समझदार, गंभीर व गहरे हैं?..

पता नहीं किस मोह में मैंने अब तक स्‍वयं को बचाया, छिपाया हुआ है.. लेकिन घबराहट में लगता है अब किसी दिन अपने बारे में भी सार्वजनिक घोषणा कर ही डालूं कि क्षमा करो, प्रिये, मगर सच्‍चायी है मैं समझदार, गंभीर व गहरा नहीं हूं?.. आख़ि‍र बमों को बर्दाश्‍त करने की एक सीमा होती है.. हर कोई इराक नहीं होता..

13 comments:

  1. यह समझदार, गंभीर और गहरे होने की भी अपनी अलग खुरपेंच है। अगर आप यह सब हों तो अकारण ही हमेशा लल्लू समझे जाने का खतरा बना रहता है। और अगर यह सब हुए बगैर ऐसे समझे जाएं तो कभी भी असलियत खुल जाने का डर जान लिए रहता है। लड़कियां भी कैसी अजीब-अजीब कसौटियां पुरुष जाति के सामने रख दिया करती हैं!

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  2. पहली बार आपके चिट्ठे पर टिपिया रहा हूं.. हिम्मत नहीं होती थी.. हमेशा बड़ी-बड़ी बातें लगती थी यहां कि या फिर ये भी कभी-कभी लगता था की छोटी बातों को भी समझने की क्षमता नहीं है मुझमें..
    आपका चिट्ठा अच्छा लगता है मुझे..

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  3. थर्टी एट पॉइंट सिक्स परसेंट.

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  4. समझ सकता हूँ,समझदार,गम्भीर,और गहरे होने की अपनी दिक्कतें हैं,सीधा सरल होने की भी अपनी दिक्कतें हैं.....सीधा और समझदार होने की अपनी दिक्कतें हैं.....

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  5. अब हम आपको क्या राय दे,आप तो वैसे भी हम से उम्र और तजुर्बे मे बडे है ,लेकिन अब बात आई है तो बता दे किसी भी स्ट्रकचर मे एंगल सबसे हलका ही मना जाता है ,आप आज की किसी भी इमारत को देखिये या स्ट्रकचर को आपको सी चैनल और क्रास बार लगी दीखाई देंगी, ये मजबूत होती है अब चूकी आप एंगल पकडे थे इसी लिये आपको हारा हुआ या बेचारगी महसूस हो रही थी. अगली बार सी चैनल से कम कुछ ना पकडे और आप अपने इस लेख मे कई बार लकडी के लिये लिखते हुये लडकी लिख गये है उसे सुधार ले ताकी पतनशील साहित्य की मर्यादा बरकरार रह सके शेष फ़िर :)

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  6. क्‍योंकि मैं ठीक-ठीक समझ नहीं पाता था कि लड़की चाहती क्‍या है

    aap apne ko bahut achchii tarah samjhtey haen yae ek achchii baat haen !!!!
    baakki kae liyae kya gajar kakdii muli kheeraa kuch bhi kaho sab chalega

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  7. @प्‍यारे अरुण, आपकी समझदारी असंदिग्‍ध है, जैसे घोस्‍ट बस्‍टर और पल्‍टन का परसेंटेज.. मगर उसी तरह लड़की (लकड़ी या ककड़ी नहीं) का लड़कीपना भी असंदिग्‍ध है.. हां, उसके आगे इमारत, स्‍ट्रक्‍चर और सी बार वाली आपकी बातें ज़रूर सही होंगी.. मगर इतना सब समझते होते तब ससुर हम आर्किटेक्‍ट न होते?

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  8. एक सीमा के बाद समझदार,गंभीर और गहरे आदमी का मतलब होता है,खयाली पुलाव पकाने वाला आत्ममुग्ध और नाकारा आदमी -- लगभग पायजामा (चौड़े पांयचे का सादा,अलीगढ काट या चूड़ीदार,पर शर्तिया पायजामा )

    ऐसे हौलट आदमी को कोई भी खुशदिल-समझदार लड़की कितनी देर बर्दाश्त करेगी . ऊ टीवी देखती है . ओहका लॉण्ड्री में धुला भक्क,अबहियां सैलून से लौटल कोई सेल्स-मार्केटिंग टाइप टाईमास्टर चाहिए जो बाज़ार को गाली न दे बल्कि बाज़ार की सैर कराए और चीज़ें डिस्काउंट पर दिलवाए.

    बाज़ार में घुसते ही एमआरपी और विज्ञापनों के महासागर में गरदन ऊंची कर सांस लेते-तैरते और टीआरपी देख-देख कर बिसूरने वाले ज्ञानी को लड़की का सामान्य ज्ञान और विशिष्ट ज्ञान घोट मारता है .

    ई बाबू घोस्ट बस्टर काहे का नाप बता रहे हैं ? बुद्धि का न कमर का ?

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  9. sir जी इतना मत सोचा कीजिये दिमाग बहुत छोटा होता है.......

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  10. च्च च्च्च्च च्च्च च्च्च ...... ! ......तीन पात ...! कि लड़की को दुनिया जहान का कुछ भी तो पता नहीं. इतनी हिमाकत ? अपने लिए विकल्प नदारद पाए ?आखिर लड़की इतनी समझदार है तो है क्यों ?चिंता का मसला......!!

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  11. बढिया है. अपने आस-पास कि इस लडकी को सहज होने का मौका दे. जाने-अनजाने इस तरह का माहोल न बनाये कि लडकी के लिये काम करना दूभर हो जाये.
    अभी बहुत से पुरुष सहकर्मी, महिलाओ के लिये दो तरह की शब्दावाली इस्तेमाल करते है
    -एक जो फिर से उन्हें कुशल ग्रिहणी के खांचे मे धकेलती है
    -दूसरी, जो पहली वाली मे फिट नही होती, और अच्छा काम करती है, वेश्यावाचक शब्दो से नवाजी जाती है.

    इन दोनो तरह के वार्तालाप से बाहर आये.

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  12. अपने अज्ञान पर हंस रहा हूं......

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