Friday, April 25, 2008

सब जगह, ससुरी, चढ़ रही है, बस हाथे को छोड़े हुए है!..

ताज़्ज़ुब की बात नहीं. ऐसी गरमी पड़ रही है तो चढ़ेगी ही. खुजली. सुबह से खौरियाये दिमाग़ को चैन नहीं है. रुक्‍खड़, पसिनियाये गाल, गरदन, कंधा सब खुजला चुका हूं, लेकिन हलक में गिलास पर गिलास पर गिलास पर गिलास पानी उतारते रहने के बावजूद जैसे आत्‍मा को चैन नहीं पड़ता, तमाम खजुलाहटोंपरांत मन भी है, ससुर, तृप्‍त नहीं हो पा रहा. जबकि हाथ में खुजली नहीं हो रही. हाथ में होती तो पता चलता पैसा आनेवाला है. शायद इसीलिए हमें पहले से ही पता चल गया था कि हाथ में नहीं आयेगी, तो इस तरह से कम से कम देह के एक हिस्‍से की खजुलाहट से हम निश्चिंत हैं. बकिया सब कहीं गुलज़ारीबाग़ है.. चिन-चिन-चिन ता धिन ता धिन घिन घिन घिन एक तरह की अजब घिन्‍नाहट है. कहने का मतलब चिनचिनाहट है. देह पर ईंटें का चूरा रगड़कर सूखे टंकी के बसाइल पानी से नहाने का जैसे एक रुमानी सपना मन में लहलहाये लेटा रहता हो, और रह-रहकर एक हुमस के साथ उमड़ने लगे, कुछ वैसे ही मैं लगभग-लगभग हौंड़ाये हुए रुमानी हो जाना चाह रहा हूं..

ख़्याली पंखे के ख़्याली डंडी से कंधे का कोई ख़्याली हिस्‍सा खुजलाते हुए मैं किसी सपने में डूबे रहना चाहता हूं.. मगर नहीं डूब पा रहा. पता नहीं क्‍या है. शायद ख़्यालीलोक में भी पानी की किल्‍लत मन हदसाये हुए है. फिर पैर की उंगलियों के बीच अचानक लगता है मानो लाल चींटियां मेला टहलने निकली हों! अबे, कुछ तो शरम करो? रहम?.. शायद हरमखोरों को मज़ा आ रहा हो.. मगर, माफ़ कीजिए, मैं मौज़ नहीं ले पा रहा. अनूप शुक्‍ल की तरह एसी ऑफिस में नहीं बैठा हूं. ऑफिस में बैठा होता तो कम से कम चपरासी को बुलाकर थप्‍पड़ मार देने की सहूलियत होती. या दिन तरंग में होता तो लीला चटर्जी हमें चप्‍पल मार देतीं? माने कुछ तो नाटकीय हुआ होता. लेकिन कहां हो रहा है. मैं बस खुजला रहा हूं. और गरमी जो है चभक के बैठी हुई है. अलबत्‍ता ठीक-ठीक कहां बैठी हुई है, हमारी पकड़ में नहीं आ रहा. आ रहा होता तो अपन चार कदम अलग हटकर बैठते. या खड़े ही हो जाते? या गरमी पर थूक आते. काफ़ी बार थूक आया हूं भी. मगर या तो गरमी अपने को बचा ले गयी है, या जैसाकि हमेशा मेरे साथ वैसे भी होता ही है- हम सही दिशा तय करने में गड़बड़ा गये हैं. गुलमोहर बानो की बजाय हमारी चिट्ठी गुड्डी मारुति की गोद में जाकर गिर गयी है!

ओह, कोई इस बदकार को परे नहीं हटा रहा. न खुद बेशरम हट रही है! ऐसा नहीं कि चंदामामा, इंद्रजाल कॉमिक्‍स लेकर किसी पीपल, बरगद, जामुन के नीचे जाकर अपना कोई नया ठौर करे, हमारी जान छोड़े? लेकिन कहां. बेहया हटने से रही.. मैं हटकर कहां जाऊं? आपके पास चला आऊं? या हड़बड़ाकर ज्ञानजी के बंगले पहुंच जाऊं?..

8 comments:

  1. आखिरी उपाय उत्तम है.. इलाहाबाद हो आईये!

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  2. हमारे पास आकर का करेंगे.काम के बोझ के मारे हैं.कभी ससुरा कोई आ जाता है कभी कोई.सुब्बौ से मिटिंगया रहे हैं.खाने की भी फुर्सत नही हैं. चाय गटक रहे हैं या कि चिप्स/बिस्कुट.पेट को कबाड़खाना और गैस का भंडार बनाये हैं.हम निकलना चाहते हैं तो लोग निकलने नहीं देते गैस निकलना चाहती है तो हम निकलने नहीं देते.

    अब अइसे में ना गर्मी लगती है ना सर्दी. कभी कभी तो यह भी नहीं बुझाता है कि दिन है कि रात.का बतायें भइया उ गर्मी में भी बहुतै सुख बा.

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  3. @काकेश बाबू, सही कहते हैं. मगर एत्‍ता संवेदी होवे का डेंजर ई है कि गैस को जबरिया रोकियेगा त् आपका देह से नहीं सामनेवाला का खोह से छूटे लगेगी. बकिया ठीक है मगर देह अऊर दिल ज़रा बचाके रखियेगा.

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  4. अरे, हम तो खुदे बम्बई जाने का प्लान बना रहे थे.... आप बता रहे हैं बहुत गर्मी है.... अब बम्बई की बात है तो थोड़ा शंका भी है...कि गर्मी का चीज का है...वैसे अगर इतना हालत ख़राब है त आप कलकत्ता चल आईये...लोग बता रहे हैं इहाँ गर्मी कम है...ओईसे पसीना नहीं सूखेगा, त ठंडा-ठंडा लगेगा..ई पसीना नहीं सूखने का व्यवस्था है कलकत्ता में..

    ओईसे इलाहबाद भी जगहा ठीके है..थोड़ा लू चलेगा..बाकी और कौनो परेशानी नहीं होना चाहिए...लेकिन बम्बई में त ससुरा 'लू' भी नहीं चलता..:-)

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  5. इलाहाबाद आया जाये भाया कानपुर। लगता है आपके आदमी हमारे दफ़्तर में भी मौजूद हैं वर्ना आपको कैसे पता चलता कि कल ही हमारे दफ़्तर में एसी लगा।

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  6. कभी चपरासी को सचमुच थप्पड़ मार कर तो देखिये, फिर पता करेंगे कि क्या याद रहता है !

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  7. यहाँ स्त्री पुरूष समानता की जद्दोजहद है, आप नारी-नारी में भेद कर रहे हैं. गुड्डी मारुति हों या वड्डी टोयोटा, एक नजर से देखिये, वरना!

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  8. @अजित बाबू,
    गरमी उतर नहीं जायेगी? वही तो कह रहा हूं?

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