Monday, April 28, 2008

अनर्गल की लोरी..



|| एक ||
अचक्‍के में कई बार लगा है निकलती रेल की खिड़की पर दीखी थी शायद, या कोई खराब दांतोंवाली बुढ़ि‍या बकवास कर रही थी बाद में होश हुआ, मगर उस बाद में तब बुढ़ि‍या कहां थी. या फिर धूप में बच्‍चों के खिलौने बेचता फेरीवाला, या किराये की हुज्‍जत के दरमियान अनजाने कोई बड़ी गहरी बात कह जाये रिक्‍शे के आगे-पीछे ज़िंदगी नचाता एक सींकिया नौजवान. इन्‍हीं आड़े-तिरछे तरीकों से तमाचे पड़े हैं समझ के, मिली है दुनियादारी. बहुत दिनों के अंतराल पर किसी दोस्‍त की स्‍नेह-संगत में देह ऐंठते, या देर रात सीढ़ि‍यों पर धीमे-धीमे अकेले नीचे उतरते उदासी मिली है, आत्‍मा नोंच खानेवाला बंजर मिला है समझदारी के भरम मिले हैं, समझदारी नहीं मिली है. पता नहीं समझदारी किस पेड़ पर उगती है. जिस पेड़ के नीचे जाकर हम खड़े हुए हैं बहुत मर्तबा आदत मिली है, समझदारी की छांह नहीं मिली है.

|| दो ||
सब सही-सही चल रहे हैं की समझ ज़रूरी नहीं सब सही ही चलाती हो. हमें लगता है गा रहे हैं जबकि बाहर से देखने पर साफ़ दीखता है हवा में कंकड़ और मुंह में मिट्टी चबा रहे हैं. मुंह में राख़ और कलेजे में आग हो तो शायद यही अच्‍छा है कि गुस्‍से की सनसनी बजाने की जगह हम सन्‍नाया सयानापन तान लें, ज़रा वक़्त के लिए राग गुमसुम की महफ़ि‍ल बहाल लें..

5 comments:

  1. गुस्‍से की सनसनी बजाने की जगह हम सन्‍नाया सयानापन तान लें,

    ---बड़ा ही उम्दा गद्य गीत है..

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  2. आपको भी यही लगता है कि बोधिवृक्षनुमा कोई पेड़ होता है जिसके नीचे बैठने से समझदारी मिलती है?
    ग़लतफ़हमी में हैं। बोधि , पेड़ की छाँह से नही आई थी , सुजाता की खीर में थी।
    और समझदारी भरी छाँह से क्या आशय है आपका ? माहौल को कोस रहे हैं या बुजुर्गों को ?

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  3. @अजित भाई, देखिये, आप समझदारी ही ठेल रहे हैं. इससे तो यही होगा कि मैं पेड़ के नीचे खड़ा होने की जगह पेड़ की फुनगी तक पहुंचने के लिए हदसने लगूंगा.. फिर मुंह की ही खाऊंगा.. और तब वह अनर्गल की लोरी नहीं, शोकगीत होगा..

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  4. अजीत जी रहस्य न खोलिये , हमसे सब खीर मांगने लगे तो मुश्किल हो जायेगी !
    @समझदारी स्पार्क की तरह आती है .....बस शॉर्ट सर्किट से बचना ज़रूरी है ।

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  5. गुमसुम मत होवें।

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