Tuesday, April 29, 2008

क्‍या राष्‍ट्रीय हित.. कैसा राष्‍ट्रीय इतिहास?..

क्‍या ऐसा महज़ भोलेपन की अज्ञानता में होता है कि जिन आत्‍महत्‍या कर रहे किसानों का बोझ कम करने के लिए सरकार कर्ज़ माफ़ी का ऐलान करती है, उन किसानों को उस कर्ज़ माफ़ी का सबसे कम फ़ायदा मिलनेवाला होता है? जिन्‍हें मिलनेवाला होता है वह सरकार की नीतियों को प्रभावित करनेवाले, व पहले से ही फ़ायदे में रह रहे किसान होते हैं? या यह भी अज्ञानता की बेवक़ूफ़ी में ही होता है या सुचिंतित, सुनियोजित नीतियों की राह होती है कि टैक्‍स का ज़्यादा पैसा उन्‍हीं की सुरक्षा व सहूलियतों पर खर्च होता है जो यूं भी पहले से सुरक्षित हैं? या तब जब सरकार उच्‍च विशिष्‍ट तकनीकी शिक्षण केंद्रों के लिए तो कहीं न कहीं से पैसे मुहय्या करवा लेती है, मगर प्राथमिक शिक्षण की बदहाली दूर न कर पाने में हमेशा उसके पास पैसों के रोना की कहानी तैयार रहती है? ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जिन्‍हें हम ठहरकर, ज़रा गौर करके देखना चाहेंगे तो उसके पीछे की परतदार सच्‍चायी दिखेगी. दिखेगा कि "राष्‍ट्रीय हित", "राष्‍ट्रीय हित'" का जब डमरू पीटा जाता है तब ऐसा कोई प्रॉपरली डिफाइंड सबके हितवाला कोई राष्‍ट्रीय हित नहीं होता, किन्‍हीं वर्ग विशेषों के ही वे हित होते हैं. सबके हितों की बात झूठ और फ़रेब होता है. तब फिर राष्‍ट्रीय इतिहास क्‍या हुआ? इतिहासकार व नाटककार हावर्ड ज़ि‍न इस मसले पर कुछ दिलचस्‍प बातें करते हैं..

इधर-उधर कुछ नाम बदल देने पर यह किसी भी दूसरे देश की कहानी हो जायेगी. फ़ि‍लहाल ज़ि‍न अमरीका की कह रहे हैं.. राजा का बाजा बजानेवाले ऐतिहासिक नज़रिये से अलग अपना नज़रिया क्‍यों और कैसे तय किया, हावर्ड ज़ि‍न उसका अपनी मशहूर किताब के ठीक शुरू में ही खुलासा कर रहे हैं.. इस खोल को ज़रा आप भी अपने देश पर चढ़ाकर देखिए, बहुत अस्‍वाभाविक नहीं लगेगा.. और सीधी अंग्रेज़ी है, और मैं घटिया अनुवादक हूं.. इसलिए प्‍लीज़, अनुवाद क्‍यों नहीं किया का रोना न रोइये..
It is as if they—the Founding Fathers, Jackson, Lincoln, Wilson, Roosevelt, Kennedy, the leading members of Congress, the famous Justices of the Supreme Court—represent the nation as a whole. The pretense is that there really is such a thing as “the United States,” subject to occasional conflicts and quarrels, but fundamentally a community of people with common interests. It is as if there really is a “national interest” represented in the Constitution, in territorial expansion, in the laws passed by Congress, the decision of the courts, the development of capitalism, the culture of education and the mass media.

“History is the memory of states,” wrote Henry Kissinger in his first book, A World Restored, in which he proceeded to tell the history of the nineteenth-century Europe from the viewpoint of the leaders of Austria England, ignoring the millions who suffered from those statesmen’s policies. From his standpoint, the “peace” that Europe had before the French Revolution was “restored” by the diplomacy of a few national leaders. But for factory workers in England, farmers in France, colored people in Asia and Africa, women and children everywhere except in the upper classes, it was a world of conquest, violence, hunger, exploitation—a world not restored but disintegrated.

My viewpoint, in telling the history of the United States, is different: that we must not accept the memory of states as our own. Nations are not communities and never have been. The history of any country, presented as the history of a family, conceals fierce conflicts of interest (sometimes exploding, sometimes repressed) between conquerors and conquered, masters and slaves, capitalists and workers, dominators and dominated in race and sex. And in such a world of conflict, a world of victims and executioners, it is job of the thinking people, as Albert Camus suggested, not to be on the side of the executioners.
(हावर्ड ज़ि‍न की किताब 'ए पीपल्‍स हिस्‍टरी ऑव द यूनाइटेड स्‍टेट्स' के पहले अध्‍याय से. ऊपर का चित्र 'न्‍यूऑर्क टाइम्‍स' से लिया है)

खेम सिंह दसाना के लिए

4 comments:

  1. क्या सरकार वास्तव में कर्ज़ माफ़ी का ऐलान किसानों का बोझ कम करने के लिए करती है? मुझे तो इस में दिखावट ज्यादा और वास्तविकता कम नजर आती है. मैं ऐसा भी मानता हूँ कि ऐसी सहायता उन्हीं को मिलती है जिन किसानों पर वोझ नहीं है. वोझ तले दबे किसान तो केवल आत्महत्या ही कर पाते हैं. न जाने कब से किसान आत्महत्या कर रहे हैं पर यह स्कीम चुनाव के आने का इंतज़ार करती है. चिदम्बरम जिस नाटकीयता से बजट भाषण में इस की घोषणा करते है उससे सरकार की बदनियती का पता चलता है. बेईमान हे सरकार. उसकी हर बात में बेईमानी है.

    ReplyDelete
  2. ये लेख "अपने लिए ज्यादा दूसरो के लिए कम जैसा कुछ है." लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है की दूसरो को कम ही सही लेकिन कुछ तो मिलता ही है. नेहरू ने अपनी पूरी जिन्दगी का १० साल जेल में बिता दिया, इसके फलस्वरूप नेहरू को भले ही कुछ ज्यादा मिला हो लेकिन हमे भी कुछ तो मिला ही है क्योंकि कई लोग जेल भी नही गए

    ReplyDelete
  3. बहुत सही..और आखिरी बात तो बेहद मार्मिक!

    ReplyDelete
  4. कभी कभी आप दुसरो को भी गंभीर कर ही देते है,देखिये ना लोग कितने गंभीर हो गये है आपकी पोस्ट पर लगी रहने वाली टिप्पणी की झडी भी इस गंभीरत के चक्कर मे गायब सी हो गई है..
    यही है हमारी राष्ट्रीय सोच :)

    ReplyDelete