Thursday, April 10, 2008

छोटे-छोटे काम..

अख़बार पर यूं ही आंख घुमाना, या इस ओर खड़े सड़क के उस पार जाना. दीवार पर का कैलेण्‍डर हटा लें या अभी रहने दें का असमंजस, आज अचार आम का खायें या कटहल का- या अरे, कब से नहीं है अचार? फिर जुगड़ि‍याना होगा? कहां से लायें की पीर अपार. यह तौलिया उल्‍टा किसने डाल दिया, या गाड़ी तिरछी ठेल दी, या चप्‍पल दरवाज़े के पीछे फेंक दिया. इस पजामे का नाड़ा कहां गया? अच्‍छा, चलो, लाओ, आज घड़ी बनवा ही लायें, या टिंकु को डॉक्‍टर के हियां दिखलवा लायें? देखो, फिर तुम्‍हारे ब्‍लाऊज़ की सिलाई उघड़ी हुई है, या यह यहां कैसा कागज़ गिरा हुआ है? फ़ोन पर तिन्‍नी दी क्‍या बोल रही थीं? यह तार पर कौन चिड़ि‍या है? पेड़ पर किसका फूल? लो, ससुरी, पैर की नस फिर खिंच गयी. यह कुर्सी इतने दिनों से ठीक चल रहा था हमारे ज़रा से बोझ से, देखो, भसक गया?

बड़े कामों का वक़्त कब निकलता है. छोटे-छोटे इतने कितने तो काम होते हैं. छोटा जीवन इतना तो बझा-बझा होता है. बड़ा जीवन हाथ कब आता है?

6 comments:

  1. अच्छा है - "टू डू लिस्ट" ब्लॉग पर छापना एक भारी काम है। आपने सम्पन्न कर लिया!

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  2. sir ji aajkal time hi to nahi baki to zindgi ka kya hai chalti rahti hai.

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  3. achcha jindgii sab kii hi itni ubaau ho challee haen kam sae kam yaan to gender bais nahin ho rahaa haen !!!!!!!!!!! kuch tamgae auro kae liyae bhi raheny daetey pe nahin gol duniya mae sab kae apne hii GOAL haen

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  4. मुक्त गद्य के गल्प अल्प होने पर भी बहुत बड़ी बात कह जाते हैं. हम भी इस भारी काम को करने की कोशिश करेंगे...

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  5. आ हा हा .. - बड़ा जीवन होता भी है अब कहीं?, धुत्त ..... बाबा के जमाने में होता होगा,... नहीं बड़ दादा के जमाने में?, अभी तो सब जीवन छोटा पैकेट में , सैशे में सुतली पर झूलता है , आपको मांगता है ? [ :-)]

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