Saturday, April 5, 2008

सबक लेने में हर्ज है?..

रह-रहकर मन में उठती ऐसी-वैसी जाने कैसी-कैसी की तर्ज़ वाली यह भी एक वह अबूझ तरंग ही उठती है कि जीवन में हम सबक लेते हैं? कब लेते हैं.. किससे? स्‍वयं से भी लेते हैं? शायद आप ज़्यादा समझदार हों, समझते होवें.. हम तो यही समझने में हारते रहे हैं कि जीवन बाजू से निकलती रही, हम धुआं छोड़ फुर-फुर फुदकते रहे.. मालूम नहीं खुद से भी सबक कितने लिये!.. लेकिन नहीं लिये तो यह कोई अच्‍छी, इतरानेवाली बात नहीं.. और नहीं तो कम से कम मन की मासूमियत तो बनी रहे.. कि देर-सबेर शायद कभी लें. सबक. और जब यह सीख लें तो शायद कुन्‍नूर, केरल के कलेन पोक्‍कुदन से भी कुछ सीख लें.. कंक्रीट में बदलते इस देश के सूखे उजाड़ का भला ही होगा.. दक्षिण की बनिस्‍बत शायद उत्‍तर का पूर्वी संसार ऐसा सदाशयी और समझ बनाने, बुननेवाले जीवनदृष्टि का पक्षधर नहीं.. फिर भी.. पोक्‍कुदन से सबक लेकर उम्‍मीद बुनने में क्‍या हर्ज़ है? प्‍लीज़, ज़रा सा आप भी लीजिए..

(तहलका से साभार)

4 comments:

  1. जी, जैसा आपका अदेश.

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  2. पढ़ लिया, पहुंच गए, जान गए, आपका आभार

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  3. पोक्कुदन साहब को प्रणाम! सलाम! . जितनी और जिस भी तरह से पहुंच सकता हो . ये दुनिया बची है तो इन्हीं दशरथ मांझियों और पोक्कुदनों की वजह से .

    कृपया इसे भी पढें :

    http://anahadnaad.wordpress.com/2006/08/17/bhagawat-rawat-poem1-ve-isee-prithvee-par-hain/

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  4. सही on a tangent अरबी में mangrove को कु़र्म कहते हैं - और यहाँ भी बहुत हैं - घर के पास

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