Friday, May 30, 2008

गर्मी के बेदम होंगे?..

पता नहीं कहां तो पहुंचे हुए एक कवि ने ठीक ही कहा है कि दुनिया में कम न होंगे, झमेले जमके होंगे! जहां तक मुझे याद पड़ता है लाल किशन की पंक्तियां नहीं हैं, न किशन लाल की हैं. काकेश को फ़ोन करके जानना चाहा तो वह सीधे मुकर गए, चंद्रभूषण ने तो, ख़ैर, नौकरी ही बदल ली, और जहां तक मेरी बात है मुझे याद नहीं पड़ता मैंने कोई कविता लिखी हो, और लिखी भी हो तो उसमें- बहुवचन, एकवचन किसी भी शक़्ल में- झमेला का ज़ि‍क्र किया हो? जबकि इससे इंकार नहीं कर सकता कि अलबत्‍ता दुनिया के बारे में ज़रूर बोलता रहता हूं. जबकि सच्‍चायी यह भी है कि मेरी दुनिया आमतौर पर तीन, और नाटकीय परिस्थितियों के दबाव में ज़्यादा से ज़्यादा बीस किलोमीटर के एक चक्‍कर से ज़्यादा दूर नहीं जाती, जाती भी है तो बहुत जल्‍द फिर वापस अपने डाल (या डेरे?) पर आ भी जाती है. लेकिन झमेले में उलझा कहां मैं दुनिया में उलझने लगा? हालांकि बाबू राजेश रोशन भी कोशिश कुछ ऐसी ही कर रहे हैं. उलझाने वाली. मगर मैं इन सब फिजूल हवालों से नहीं हिलनेवाला.

अमीरी-गरीबी में बढ़ती खाई.. अरे, मतलब क्‍या है इसका? मैं तो गरीबी-गरीबी में बढ़ती खाई, आनेवाले दिनों की न खाई जानेवाले.. अखाये दिनों की.. सोच-सोचकर गला जा रहा हूं! और गरीबी से ज़्यादा तो फ़ि‍लहाल घमौरी समस्‍या है. अभी कल ही सपने में देखा बेकरी में पाव सेंक रहा हूं, और पाव की ही तरह सिंक भी रहा हूं. आज टपरे के नीचे ईस्‍त्रीवाले के भेस में के सपने की बारी है. पता नहीं कहां-कहां के बारे में कवि लोग लिख रहे हैं, गर्मियों के बारे में कोई नहीं लिख रहा? किसी कवि ने ही कहा था जहां न पहुंचे रवि तहां पहुंचे कवि. सही कहा था, लेकिन अधूरा कहा था. मेरे कहने को होता तो मैंने कहा होता, जंह-जंह रवि जायें, तंह-तंह कविवर डेरायें, एसी में मुंह चुरायें!

ओह, पता नहीं मैं क्‍यों कहने को आकुल हो रहा हूं कि दुनिया में ग़म न होंगे, जब गर्मी के बम न होंगे.. लेकिन कहते-कहते खुद को रोक ले रहा हूं कि दस लोग फटे में पैर फंसाने चले आयेंगे कि किसने कहने का हक़ दिया, तुम कवि कब से हो गए, बे? गर्मी का बम नहीं होगा लेकिन बम की गर्मी तो रहेगी? फिर ग़म कैसे न रहेंगे?

मैं इस तरह की बहसबाजी से उकता रहा हूं, उसी तरह जैसे रवीश गम्‍भीरता से उकताकर पता नहीं किस सुरम्‍य व्‍यंग्‍य मार्ग पर चलने को आतुर हो रहे हैं. बेजी भली हैं, कहने से बाज नहीं आयीं, ज़रा मुस्‍करा दो? एसी वाले लैपटॉप पर लिखते हुए सोची नहीं थीं मैं लोडशेडिंग वाले डेस्‍कटॉप से जवाब दूंगा, और मुस्‍कराने नहीं, गरमाने की कहानी लिखूंगा!

ओह, दुनिया में झम के होंगे, पता नहीं कब होंगे, अभी तो गर्मी के बेदम होंगे!

Thursday, May 29, 2008

ब्‍लूबेरी नाइट्स..

किसी ब्रुश से उछलकर फैल गया रंग हो जैसे, रात के कालेपन में सबर्बन रेल की नीली-बैंगनी लकीरें चमकती फुफकारती गुज़रती है. ट्रेन की धड़धड़ाती आवाज़ मानो उफ़नते मन की बचैनी का आईना हो, उम्‍मीदों के टूटने सी चिटककर एकदम-से पसर जाती है; आंखें तड़पकर एक चेहरा ढूंढ लेना चाहती हैं.. बार के काउंटर पर एक अनक्‍लेम्‍ड चाभी पड़ी मिलती है, रोज़-रोज़ बार में पहुंचनेवाला चाहा वह चेहरा नहीं मिलता.. दिल को सुकून. नहीं मिलता.. काली रातों में छिटके रंगों-सा कितने सारे अरमानों का मन नशीली बहको में ज़ाया होता है. कोने खुरचन इकट्ठा होती चलती है.. चोट खाये उम्रों की.. तक़लीफ़ों की.. मुंह फेरकर अंदर सब जज़्ब कर लेने, छुपा लेने की.

लिज़ी हंसती हुई कहती है जिस आदमी से अलग ज़िंदगी का ख़्याल करना मुश्किल, उसे अलविदा कैसे कहती? नहीं कहा. कहे बिना निकल आयी. फिर कोये-सी खाली आंखों के सूनेपन में रोती है. वह क्‍या उम्‍मीद है लिज़ी जिसे खुद में बांधकर रखना चाहती है.. आंखों की नींद के उड़ जाने की तरह एक बेमुरव्‍वत मोहब्‍बत को खुद से बाहर करके उड़ा क्‍यों नहीं देती?..

जेरेमी ने सब उड़ा दिया है इसलिए हंसता है.. हंस सकता है? लेकिन फिर उसकी नज़रों में इतना नेह और आवाज़ में ऐसी मिठास क्‍यों है? एक टूटे दिल की संगत उसे अच्‍छा आदमी बनाये रखती है? या इसका सबब बनती है कि वह अपने आसपास के समूचे टूटन को सहेजता, लोकता मनुष्‍य बने? जेरेमी चुप रहकर सब कहना चाहता है, लेकिन लिज़ी उसकी चुप्‍पी को कहां सुनती है? जेरेमी से बातें कर सके इसके लिए वह कितने शहरों के खाक़ छानती है, कि नौकरियों के कामकाजी घंटों में खुद को भुलायी रहे.. पास रहकर कहना कहां हो पाता है, दूर चिट्ठि‍यों में मन की लकीरें ज़ाहिर करे.. जेरेमी चिट्ठि‍यां पढ़ता है, और चुप रहता है.

जबकि अर्नी चुप रहकर शराब पीता है और तब तक पीता है जब तक कि बेसुध न हो जाये. क्‍योंकि जिससे कहना चाहता है वह बीवी श्‍यू तो उसका चेहरा तक देखना नहीं चाहती. वह औरत उस हर चीज़ से नफ़रत करती है जो उस आदमी से जुड़ी है जो उसकी जवानी चुरा ले गया.. और जब वही अर्नी नहीं रहता तो खुद से नफ़रत करने लगती है, क्‍यों? इसलिए कि अब कोई दुबारा उसे खोजता मेज़ पर बेसुध नहीं होगा?.. आदमी प्‍यार क्‍यों करता है? अर्नी की तरह किसी चाहना में तड़प-तड़पकर पीने और फिर गुज़र जाने की खातिर? औरत क्‍यों करती है.. कि वह खुद पर लुट जानेवाले के पागलपने पर हंस सके? और जब हंसी आवारापने की हदें छूने लगे तो उसके नश्‍तर को खुद में डुबो के फिर रो सके?..

लेस्‍ली होशियार होने, सबको पहचानने का ढिंढोरा पीटती है.. खुद को रत्‍ती भर जानती है? ज़िंदगी ऐसे जीती है जैसे ताश की बाजी हो.. और बेचारी एक दिन ताश का ढेर होकर रोने लगती है.. ज़िंदगी में लेस्‍ली ने इतने झूठ सजा रखे हैं कि सच्‍चायी कहीं भी जुए में हारती रहती है.. उसके भरोसे मेज़ पर उछाले सिक्‍के की तरह अटके रहते हैं, जाने किस करवट बैठें..

मगर जाने क्‍या अंतरंग है प्‍यार में मार खायी लिज़ी अपना भरोसा बनाये रखना चाहती है- अंधेरों के अपने झुटपुटे की रोशनी में, अपनी चिट्ठि‍यों, अपने कोये-सी आंखों की मासूम ईमानदारी में.. कौन जानता है- कैफ़े में सबका अप्रीतिकर, सबसे अनछुआ रह जानेवाले ब्‍लूबेरी पाइ को खानेवाली लड़की के आगे सचमुच कभी अच्‍छे दिन आयें? राइ कूडर के सुरीले संगीत के संगत सा? दारियस खोंदजी की नशीली सिनेमाटॉग्राफ़ी सा?

(वॉंग कार वाई की माई ब्‍लूबेरी नाइट्स देखकर)

Wednesday, May 28, 2008

अंधारे-उजियारे की भावुकता..


जा रहा हूं. जाऊंगा
इस जगर-मगर से निकलकर
उस जगर-मगर देश जाऊंगा
सुगनी से कहूंगा गीत सुना
मनोहर से कहूंगा हरमपंथी कहां
छूटती है, बुचना, ला, बीड़ी पिला
टूटही ईंटा के चूल्‍हे पर टूटही
देकची चढ़ाऊंगा, बसाइन भात पकाऊंगा
पड़ोस की मड़ई से भिनसारे चुरायी लौकी
की बतिया और माहुर चटनी में मीस के
खाऊंगा. शीतला मौसी मुंह बनायेंगी तो
तुनक के कह दूंगा, ज़ादा शहरातिन
मत बनो. हमरी औकात यही है, अपनी
औकात से क्‍या लजाना? जबरिया हमसे
न ठनो. पप्‍पू से कहेंगे का पप्‍पू
सइकिलिया फिर पंचर पड़ी है, मरदे?
पप्‍पू चिमरख पाइंट पर हाथ पोंछता
टूटही कठवत के पानी में ट्यूब बुड़ायेगा
हमरी सिफ़ारिश पर फटही आवाज़ में
ओ, नील गगन के तले का बेसुर सुनायेगा
हम पइडल घुमाकर उतरल चेन सजायेंगे
सुगनी से पूछेंगे खंडाला नहीं शिवाला
चलती है का? अपनी खड़र-खड़र खड़खड़ि‍या
संझा के झुरमुट में उतारकर पता नहीं कवने
दुनिया की भुक् भुक् अंधारे उजियारे में उतरायेंगे?

Tuesday, May 27, 2008

मॉडरेशन संभाल! (चुनरी संभाल, गोरी की तर्ज़ पर)..

एक प्रगतिशील गुज़ारिश..

साढ़े सत्‍ताईस की संख्‍या वाले हमारे छुटंकी हिंदी ब्‍लॉगजगत (ओह, कैसा तो विकराल! गुस्‍से में लाल?.. चिट्ठाजगत भले रोज़ हमारे, तुम्‍हारे और कितने सारे बंधु-बानरों के मेल बॉक्‍स में छै और नये ब्‍लॉगों की रजिस्‍ट्री की डाक भेजती रहे, उन धूप के भटकौओं को स्‍नेह की छतरी कौन पहुंचाने जाता है? पहनाने? कुल साढ़े सत्‍ताईसे हैं जो धूम मचा ले, धूम वाली रसबहार, दे दनादन्‍न वाला तरवाली संहार घुमा रहे हैं!) में इन दिनों फिर ज़रा बहस का बाज़ार गर्म है. हालांकि सुन रहे हैं बंबई से बाहर दूसरे शहरों में बरसात हुई है, लेकिन उससे चढ़ी गरमी पर असर नहीं पड़ा है.. कप-प्‍लेट टूट रहे हैं, लोगों के होश सम्‍हलें इसके पहले फिर छूट रहे हैं. कुछों को एकदम मौका मिल गया है, अदबदा के छुटे हुए हैं. हमेशा के थे! दुष्‍यंत कुमार की दुनिया वाले शेरों को ज़रा इधर-उधर रिसाय‍कलिंग करके, मैत्रेयीदेवी मंजुनाथ महाविद्यालय के, तीन वर्षों से स्‍थगित किंतु इस मर्तबा बहाल, सालाना चुनाव के जुझारू प्रत्‍याशियों की तर्ज़ पर- आस्‍तीन चढ़ाये, मुंह में पानवाला ख़ून सजाये- टहल रहे हैं. टहल से ज़्यादा भटक रहे हैं. क्‍योंकि बीच-बीच में कोई नौसीखिया मज़ा खराब करने भी चला आता है कि गुरु, वाइस प्रिंसिपल के लच्‍छन ठीक नहीं लग रहे, इलेश्‍शन मुल्‍तवी हो सकते हैं? मुल्‍तवी होगा जब घंटा होगा, अभी तो गरम है न? अभी तो कहीं भी (ज़्यादातर लड़कियों के हॉस्‍टल में) लड़कियों तक पहुंचने का, उनसे चार बातें कहने का, मुस्‍करा के उन्‍हें देखने का, और सबसे ज़्यादा यह देखने का कि वे मुस्‍कराकर हमारी ओर कब देखती हैं, और जब देखती हैं तो उनका हमारी ओर देखना हमें, हाय, कितना तो अच्‍छा लगता है?

ओह, चुनरी के फेर में मैं फिर बहक गया. प्रगतिशील बिगनिंग के इन्‍नोसेंटी शुरुआत के बाद स्‍वयं खुद को ग़लत करने लगा? ख़ैर, मसला यह है कि बड़ा धुआं उड़ रहा है. बमचक के बम और चक्‍कू दोनों चल रहे हैं. कभी बड़ी ज़रूरी बातों पर तो कभी ऐसे ही- दुष्‍यंत कुमार वाली तैयारी करके आये थे तो कहीं तो इसे ठेलेंगे न, गुरु?- वाले अंदाज़ में चल रहे हैं. इसी चलाचली में एगो जॉन लेनन के अवतारो अवतरित हो गए हैं. उल्‍टे-सीधे सब नाके तक इनके हॉट डिस्‍क, फ़रमाइश-बेफ़रमाइश, मानसी दोहा बनकर धुले-गंदे सब दीवारों पर छा गए हैं. कहीं कहीं तो ऐसा-इतना छाये कि झरोखे की रोशनी, अंदर की हवा-पानी सबके लाले पड़ गए, नतीजतन इनकी छवाहट को छांटना पड़ा! मगर इन जॉन द फिल्‍थ की थोड़ा हटकर सक्‍सेस स्‍टोरी है. जॉनवा (या लेननवा?) योको ओनो के साथे नंगई वाली फ़ोटो उतरवाये थे, ये ससुर, अकेले ही सब उतार ले रहे हैं. और कभी-कभी तो अलबत अइसा उतार रहे हैं कि बेचारा फोटू खिंचवैया तक फ्लैश भले खींच दे रहा होए, नंगई से घबराके आंख मूंद लेय रहा है! हद है. मगर क्‍या हद है. क्‍यों है. जय जॉन पेलन?

ठीक है, ठीक है, ढिठाई है, पर उसकी कौनो सीमाई है कि नहीं है? हमारी भी है. पोस्‍ट का उद्देश्‍य बहसाकांक्षी भाइयों व बहिनियों, व विविध प्रकार के नंदन कानन के लल्‍लनों व ललनाओं से इतना भर कातर परार्थना है, और इसको ज़रा कान देयकर सुन लें, कि भले आप तहे दिल जॉन लेपन के रॉक एंड रॉल ठेलन की वर्जनाओं के टूटे बंध अपने यहां खोलकर परम सत्‍यमेव हो जाना चाहते हों, भगवान के लिए इस सत्‍य साक्षात्‍कार को मॉडरेशन की तंग सिक्‍युरिटी से गुजरने दीजिए! हाई बीपी के मुझसे बुजूर्ग मरीज़ों को अवांछित सत्‍यों का साक्षात कराके बेबात मौत की तरफ़ मत ठेलिये! जानता हूं क्रांतिकारी दौरों में कीट-फतिंगे मारे जाते हैं, और उनके मरने की स्‍टोरी कोई बड़ी मेंशनेबल न्‍यूज़ स्‍टोरी नहीं होती.. लेकिन.. यहां-वहां-जाने कहां-कहां जॉन पेलन के नवोवतार की तर वाणी की टिपाणी न पढ़कर ये कीट-फतिंगे इस रसभरे जीवनभार को थोड़ा और ही ढो लें तो क्‍या क्रांति का बड़ नुकसान हो जायेगा? कि अवांछित टिपाणी का सेंट फैलाये, हाई बीपी वाले को बिना डरवाये साढ़े सत्‍ताइसी संसार की क्रांति न हो पावेगी?

Monday, May 26, 2008

पता नहीं कैसी तो पुरानी..


पिछले दिनों एक लिखाई कर रहा था, लिखाई फुर्र हुई, बन चिड़ि‍या जाने दूर कौन पेड़े लुकाय गयी. पिछले दिनों तय किया था नेट पर कुछ भारतीय कृषि की गोड़ाई करेंगे, इंडस्‍ट्री की हौंड़ाई करेंगे, मगर तय करने और मन की बहकने के बड़े छत्‍तीस के आंकड़े हैं, मन बहका और हम धुआं उड़ाते, आग नहाते किसी और रेल पर निकल लिये. सुनते हैं अट्ठारहवीं सदी में मुग़लों की मटियामेटी के बाद मुल्‍क ऐसी ही आग में बजबजाया हुआ था. टुकड़ि‍यां थीं, लूट औ’ क़त्‍लोगारत के गिरोह थे, अफग़ानी थे सिख थे कभी मरहट्ठे थे. भागते घोड़ों की धूल की गर्द छंटती तो उठती आग के बगूले दीखते, काठ का दरकना और फूस का चिटचिटाना सुनता, आहों की सिसकियां और तबाहियों की बेमतलब तौल दीखती. रेल की खिड़की अलसायी उनींदे में उठंगा मैं मां को बाहर की झांकी दिखाना चाहता था, थोड़ा अपने लिए थोड़ा अपने से बाहर इतिहास सजाना चाहता था. मां ने मुंह फेरकर अपनी चुप्‍पी में इत्‍ति‍ला की कुछ नया नहीं कर रहा, बाहर का जो दिखाना चाहता हूं, अंदर वह उम्रभर जीती रही है, इतिहास भले नहीं जानती मगर सारा जीवन और क्‍या किया, इन्‍हीं चिंदी-चिंदी चिथड़ों को सीती रही है. मैं इस तरह सन्‍न होना नहीं, निर्लिप्‍त की आश्‍वस्ति चाहता था, ज़रा सी बहकन में रेल चढ़ा था, रेल को अपने जीवन पर चढ़ाना नहीं चाहता था! मां सिर हिलाती रही, नम आंखें नीची किये चुप्‍पे मुस्‍कराती रही, समय-समाज रेल से बाहर कहां था, रेल मुझी में गुजर रहा था.

Saturday, May 24, 2008

मुंह सिये न चुप रह पाने की अव्‍यहार-कुशलता के बारे में..

ब्‍लॉग में कहीं किसी पर कीचड़ उछल-उछाला जा रहा हो, ब्‍लॉगजगत में एकदम-से ऊर्जा का संचार हो जाता है. ऊंघते लोग चौंकन्‍ना होकर जाग जाते हैं. किस पर क्‍या पोस्‍ट लिखें का पसीना रीसा रहे लोगों के पैरों के नीचे सक्रियता की सीढ़ी खुल जाती है. बहुत सारे लोग तो पोस्‍ट लिखते ही इसलिए हैं कि सामान्‍य रूप से सामान्‍य कीचड़ उछाल रहे हैं की सक्रियता में देखे जायें.. जिसको पता नहीं फिर किस-किस से जोड़कर देखते हुए मेरे जैसा- महाद्वीप के दुख में दुखी- व्‍यक्ति असामान्‍य आचरण करने लगे तो ठंडी आह भरकर मुझे नंगई के सरदार के पद से विभूषित करने की लस्‍सी भी पी सकें.

ख़ैर, पता चला महाद्वीप के दुख में दुखी होना दुर्गुण है, पर दुख कातर होना बुढ़ौती के लक्षण हैं. सामान्‍य रूप से सामान्‍य कीचड़ उछालते रहना सहज हास्‍यप्रियता है. ब्‍लॉगीय सामाजिकता है. अभय ने जानकारी बढ़ायी व्‍यवहार-कुशलता है. मित्रता के बारे में भी अभय से कुछ ज्ञान प्राप्‍त हुआ. कि बलार्ड पियर से चार किलो का किताब ढोकर उनके घर पहुंचाना मित्रता की, उनके स्‍नेह के अधिकारी होने का विशिष्‍ट लक्षण समझा जाना चाहिये. जबकि हम समझते थे मित्रता में आप किसी के लिए क्‍या छोड़ते हैं, क्‍या दावं पर लगाते हैं ज़्यादा महत्‍वपूर्ण है, तो दीख रहा है, गलत थे, मित्र से आप क्‍या पाते हैं की व्‍यवहार-कुशलता मित्रता को ज़्यादा ऊंचा प्रमाणपत्र दिलवाती है!

आपकी सामान्‍य, असामान्‍य, प्रत्‍यक्ष, अप्रत्‍यक्ष किसी बात से किसी को तक़लीफ़ पहुंचे, इसमें लड़ि‍याने की बात नहीं. अकारण पहुंच रही हो तब तो एकदम ही नहीं. अर्थ का अनर्थ करके, किसी के लिए भी रोने लगना, धीरज खो देने की अव्‍यवहार-कुशलता करने लगना प्रगतिशील-पतनशील किसी भी नज़र से टुच्‍ची बात ही है, लेकिन, जैसाकि अभय ने अपने मित्र के संदर्भ में कहा, मैं अपने रेफरेंस में भी रिपीट कर ले रहा हूं- कि अपने राम भी मर्यादा पुरुषोत्‍तम हैं ऐसा हमने कब कह दिया?

मगर क़ायदे से कहूं तो इस समूचे टिल्‍ली प्रसंग में मुझे सबसे ज़्यादा गुस्‍सा प्रत्‍यक्षा पर आ रहा है. इसलिए नहीं कि मेरे घर की स्‍त्री नहीं तो मुझे मुंह खोलने की क्‍या फालतू की गरज पड़ी थी. इसलिए कि पिछले दिनों भारतीय प्रदेशों पर अर्मत्‍य सेन और जां ड्रेज़ का विकास सम्‍बन्‍धी एक सर्वे पढ़ रहा था- और सर्वे के एक निबंध में उत्‍तर प्रदेश, और सामान्‍य तौर पर समूचे हिंदी प्रदेशों की भयावह दुर्दशा के पीछे स्त्रियों की अशिक्षा और घर से बाहर के सामाजिक सवालों में उनका हस्‍तक्षेप न करना उसकी मुख्‍य वजह बताया गया था. प्रत्‍यक्षा शिक्षित हैं, मगर पर दुख कातर हस्‍तक्षेप में मुंह काला करने आगे हम गए. क्‍यों गए? इसलिए नहीं गुस्‍सा हो रहे कि प्रत्‍यक्षा ने हमसे अपना झंडा उठाने का आग्रह किया, इसलिए कि सुबह-सुबह एक बेमतलब के पोस्‍ट पर ध्‍यान खिंचवाकर उसकी गंदगी दिखाने लगीं, और मैं पर गंदगी कातर, असामान्‍य आचरण करने लगा! गंद और गंदगी की जगह कहीं चार पैसा और चार दिल जोड़ने की व्‍यवहार-कुशलता में गया होता?

यह बात मुझे सचमुच लगती है कि औरतों का हित इसी में है कि वही बोलें. वह जितना अच्‍छा और आर्टिकुलेट बोल सकेंगी, उतना उनके समाज में आत्‍मसम्‍मान व तरक़्क़ी की गुंजाइश बनेगी. जितना कातर व इंट्रोवर्ट बनी रहेंगी, उतना ही वे हेंहें, ठेंठे वाली मूढ़ लंठई के उपहास व तिरस्‍कार का विषय बनी रहेंगी.

एक दूसरे जिस सत्‍य का यूं ही चलते-चलते साक्षात हो गया वह यह कि आप भारतीय समाज में किसी गुट के स्‍नेह से समृद्ध नहीं हैं, आगे-पीछे सत्रह लोगों को सेटियाये नहीं चल रहे हैं, तो वह ब्‍लॉगिंग हो, या ब्‍लॉग के बाहर का समाज, आपका उस समाज में होना, बने रहना, बात करना, मुंह खोलने की हिमाक़त करना सब अक्षम्‍य अपराध है. क्‍योंकि व्‍यवहार-कुशलता के पाठों में दीक्षित, यहां लोग आपकी आवाज़ में आवाज़ मिलाने आगे नहीं आते. वह व्‍यवहार-कुशल बने रहकर, गोदी में हाथ धरे, चुप्‍पे-चुप्‍पे मुस्‍कराते रहते हैं, कि गुरु, अब देखें, बुढ़वा कैसे लंगी खाता है! वह सारा हाथ-पैर पटकना व्‍यक्ति को अपने अकेले अंधेरे में करना पड़ता है. व्‍यक्ति वह चुप रहकर ख़ामोशी से जीता है, या नंगई का सरदार होकर फैलने लगता है, चुनाव भले उसका हो, है वह हास्‍यास्‍पद ही.

Friday, May 23, 2008

लीद और मस्तियों के बारे में..

बोधिसत्‍व सीधे नाम लेकर थूकने की जगह मुझेप्रत्‍यक्षा को साधु-साध्‍वी बुलाकर मीठी गाली देकर निकल लिये. पता नहीं मस्‍ती की लीद किये हैं, या गंभीर चिंतन से पैदा लीद है! साथ ही खोये हुए बच्‍चे की एक्टिंग भी कर रहे हैं. कहां जाऊं, कहां पहुंचूं, रास्‍ता दिखा दो टाइप. मुझमें सधुआहट होती तो मैं सचमुच ठोढ़ी पर हाथ रखकर विचारने लगता कि बेचारे बच्‍चे का कैसे कल्‍याण किया जाये, कैसा उचित पथ-प्रदर्शन किया जाये एटसेट्रा! प्रत्‍यक्षा को फ़ोन किया तो पता चला उनके मन में भी कोई कोमल साध्‍वीभाव नहीं थे. तंज और तल्‍खी थी. लब-लब हो रहा गुस्‍सा था. मैंने बोधिसत्‍व का फ़ोन नंबर देकर कहा इस तरह सुबह खराब करने की जगह एक फ़ोन करके मन की बात कह लो? कोई वजह रही होगी, प्रत्‍यक्षा हमारे इस साधु राय से आश्‍वस्‍त नहीं हुईं, कि ऐसे व्‍यक्ति से बात करके कोई फ़ायदा होगा. प्रत्‍यक्षा की चार बातें सुनकर और अपने तीन निजी अनुभवों की याद करके मैंने भी अंतत: यही राय बनायी कि फ़ायदा नहीं है. मेरे जाने की बहुत जगहें (साहित्यिक, असाहित्यिक दोनों ही) नहीं हैं, बोधि की हैं, और बहुत सारी हैं, और जैसाकि प्रत्‍यक्षा समझ व समझा रही थीं, इसकी संभावना ज़्यादा है कि इन सभी जगहों पर बोधि जायेंगे, उच्‍च विचारों के सौम्‍य कीर्तिमान नहीं स्‍थापित करेंगे, लीद ही करेंगे. और मस्‍त रहेंगे. मस्‍त रहने की मेरी बहुत फितरत नहीं, मगर उसके साथ यह छोटा सा फ़ायदा है कि मैं साहित्‍यकार नहीं, न बन लेने के ऐंड़े बेंड़े अरमान हैं; प्रत्‍यक्षा ने इस ढलती उम्र में रोते-गाते एक किताब निकलवायी है (प्रकाशक और उसके किसी बूढ़े मालिकान को साध कर निकलवायी है, इसका लगता है, बोधि के पास ज़्यादा आत्‍मविश्‍वासी प्रमाण है. इस पूरी प्रकाशकीय दुनिया में पान-सौंफ वाली मोहब्‍बत जो है बोधि की है, तो इस दुनिया के बारे में बोधि जो भी कहें, उसे अकाट्य व विश्‍वसनीय समझा जाना चाहिए), बहुत मस्‍त तो नहीं ही हो पा रही, मगर चिरकुटइयों में लिसड़ाकर दु:खी भी नहीं होना चाहती. मैंने समझाने की कोशिश की हिंदी का साहित्यिक क्षितिज लीद और मस्‍ती की इन्‍हीं खूराक़ों से ही रंगीन बना हुआ है, बाकी आज के समय को समझने की जहां तक साहित्यिक खूराक़ का प्रश्‍न है, हिंदी के पास उसे बताने-दशार्ने का बकरी की लेंड़ी की मात्रा का मसाला भी नहीं. मगर प्रत्‍यक्षा मेरे इन उन्‍नत उद्गारों को समझने से रह गयीं. न उनमें मस्‍ती चढ़ी, न मेरी बातों ने उनकी तक़लीफ़ कम करने का कोई काम किया.

उम्र ने शायद प्रत्‍यक्षा को कोई समझ दे दी है. नंदिनी को नहीं दी है. वह बोधि के आगे अपने बचपने और नासमझी का डिफेंस रखकर कुछ नेक विचार की समझाइश रख रही थीं. बेचारी भूल रही थी बोधि बचपने और नासमझी से बहुत आगे निकले हुए जीव हैं. किधर जाऊं, कहां पहुंचूं की बोधि भोली गुहार लगाते भले दीखें, हिंदी के बहुत सारे पहुंचे हुए जहां पहुंचने में ज़ि‍न्‍दगी भर कांखते रहते हैं, और पहुंच नहीं पाते, वहां गांव से आया हूं मगर शहर सेट करना जानता हूं वाले बोधि हंसते-दौड़ते पहुंच जायें ऐसी बात नहीं, वह वहां पहले ही विराजे होते हैं! और लीद तो कर ही रहे होते हैं, मस्‍त भी रहते हैं (जैसे इन दिनों एकता कपूर के यहां कर रहे हैं, और शास्‍त्रीयता न सिरज पाने के दुख में नहीं, लोकप्रियता के दंभ में दिपदिपाये ही कर रहे होंगें)!

मेरे सामने एक दिन कहेंगे श्रीलाल शुक्‍ल ने एक किताब से ज़्यादा अच्‍छा कुछ लिखा नहीं, उसके ठीक दूसरे दिन श्रीलाल शुक्‍ल को दांत दिखाते हुए महान भी बता जायेंगे. भौं पर बल तक नहीं आयेगा. वैचारिक कंसिसटेंसी? गयी तेल लेने! साहित्‍यकारों के बीच ब्‍लॉगरों को गरियायेंगे, ब्‍लॉगरों के बीच साहित्‍यकारों को. एक दिन हिंदी की दुदर्शा का रोना रोयेंगे, यह कहकर कि देखो, उसने हम जैसे उजबक को कवि बना दिया है, हमारे जैसा विश्‍वविद्यालय के कोर्स में चढ़ा हुआ है, तो दूसरे दिन विनम्रता को दरी के नीचे दाब, चप्‍पल मारने को उद्यत भी होने लगेंगे! भगवान के लिए, इसमें किसी तरह का विरोधाभास न देखें. क्‍योंकि हिंदी संसार ऐसे ही लीदों और मस्तियों से अपनी वर्तमान उन्‍नतावस्‍था को पहुंचा हुआ है! उसका समस्‍त बोध और सत्‍व इसी महत्‍तम स्‍तर का है! हेंहें, ठेंठें कहते हुए कहीं भी किसी को भी कुछ भी कह दो, दूसरी जगह पहुंचकर देखो स्‍वार्थ साधने के लिए ठीक उत्‍तर से दक्षिणायन होना है, तो पलटकर वह भी हो लो, बस इसका ध्‍यान रहे कि लोग हंसते रहें, और अपनी झोली में उचित मात्रा में प्रसाद चढ़ता रहे- सामाजिकता का, अर्थ का- कहीं कसर न रहने पाये!

प्रत्‍यक्षा को तक़लीफ़ हुई इसका मुझे दुख है. अपने लिए नहीं है. क्‍योंकि बोधि को, और उनके उस समूचे साहित्‍य को मैंने कभी गंभीरता से नहीं लिया, और हमेशा इसे पीठ पीछे नहीं, बोधि के मुंह पर बताते हुए किया, और दूसरों के आगे मुझे मालूम नहीं बोधि क्‍या लीद करते रहे होंगे, मेरे आगे कभी मेरे सवालों का समुचित जवाब दिये हों, ऐसा आज तक नहीं हुआ है; हां, दांत चियारते और मस्‍ती ठेलते ज़रूर दिखे हैं- उसका अलबत्‍ता मुझे हमेशा दुख रहा है. मगर वह बोधि के प्रति निजी नहीं, हिंदी की दुर्दशा के प्रति रहा है.

नहीं, मैं दुखी नहीं हूं. मगर बोधि को लग रहा है मस्‍त हूं तो वह भी गलत लग रहा है.

Thursday, May 22, 2008

फिर बैतलवा बाल पर.. अहा, ओहो?

ओह, लड़ि‍यायी बकरी चरती उत्‍फुल्लित हरी हरी
संभावनाओं में नहायी रात कैसी, अहा, भरी भरी!


ओह. फिर अहा! कि पहले अहा, बाद में ओह? पद्य में पैर धरते ही, पता नहीं क्‍यों, हमेशा ही असमंजस आकर हमें धर लेता है. और फिर दबोचे रहता है. कितना अच्‍छा होता हम ठीक-ठीक जानते होते कि अदाओं की छटाओं की कैसी बहार फैलायें कि कविताजंलि कहलायें (कहलायेंगे न? कि जांत में जंतायें-भुरकुसायेंगे?). ओह (कि अहा?). कैसे-कैसे तो भाव मन को बींधते रहते हैं, लेकिन, आह, कैसा तो यह निष्‍ठुर समय है कि इन पर, उन पर किसी पर इन दिनों कहां लिखना हो पा रहा है. चिरकुट टिनहा-सी झोले में एक कामकाजी लिखाई गिरी है कि उसी को सम्‍हालते-सम्‍हलने में तबाह हूं. नतीजे में, मन की जो बिंधाहटें हैं, वह वहीं (मन में, और कहां?) उमड़-घुमड़ करती ढेर होती रहती हैं.. मन को चीर कर, की-बोर्ड फाड़कर, ब्‍लॉग की छाती पर हरहराने लगें इसकी नौबत ही नहीं आ रही है. नौबत आती जब टाइम निकलता, यहां तो हाल है, ससुर, टाइमे नहीं निकल पा रहा.

ज़रा सा वक़्त निकले तो ये कर लें वो कर लें के मोहक अरमानों का मुरझाना हो जा रहा है, टाइम का निकलना नहीं हो पा रहा. वह लोग धन्‍य हैं जो नौकरियां कर रहे हैं. ऊपर से हंसने का टाइम भी निकाल ले रहे हैं. फिर वह लोग तो और ज़्यादा धन्‍य हैं जो न केवल हंसते हुए नौकरियां कर रहे हैं, बल्कि हंसते-हंसते पोस्‍ट भी ठेल देने का निकाल ले रहे हैं. टाइम. उसके बावजूद भी हंस ले रहे हैं? बहुत बार तो हास्‍यास्‍पद पोस्‍ट ठेलकर भी बेहूदगी के हौज में पानी उलीचते हें-हें कर ले जा रहे हैं. और टिप्‍पणियों पर टिप्‍पणी करने का भी टाइम निकाल ले रहे हैं!

आजू-बाजू बारह लोगों का श्रृद्धालु सुगंधित चिरकुट समाज श्रद्धापुष्‍प अर्पित करने का भी निकाल ले रहा है. टाइम! और यह सारा व्‍यापार हंसते-हंसते की निष्‍काम, निस्‍वार्थ भावना में ही संपन्‍न हो रहा है! ओहो! तदंतर अहा! सचमुच, यह धन्‍यावस्‍था से ऊपर की अवस्‍था है. सोचकर श्रद्धा से मेरा सिर झुक और आंखें मुंद जाती हैं. फिर इसका स्‍मरण होते ही कि हाथ में कुछ काम है, और अभी खत्‍म नहीं हुआ है, और फ़ि‍लहाल साहित्यिक व ब्‍लॉगिय श्रेष्‍ठता के विमर्श से इस गरीब के जीवन में ज़्यादा ज़रूरी है, मैं धन्‍य-धान्‍य भरे इस संभावनामयी- ओह, कैसी अनोखी तो रच ली है हमने यह धरा- से सरककर अपनी बिंधाहटों में दुबक जाता हूं. सुबुक-सुबुक तो जाता ही हूं..

बहुत सारे मौके हैं जब चुप रहना अच्‍छा नहीं लगता (न रहना अच्‍छी बात होती है), मगर यह भी अपनी दुलारी- दो कौड़ी के श्रृंगार में अपने को धन्‍य मान रही हिंदी बेचारी की चिर-परिचित विशिष्‍ट लाक्षणिकता ही है जहां दो कौड़ी के सुख से सुखी होने व दूसरों को दुखी करने से अलग, इस गाल-बजावन ज़बान में, किसी महत्‍तम मार्मिक अनुभव की व्‍यंजना की उसके व्‍यवहारकर्ताओं को न चिंता होती है, न उसे अपने संस्‍कार में ढालने की कोई वयस्‍क समझ बनती है; बंता सिंह और संता सिंह बड़ी आसानी से समझ आते हैं. उस पर हंसी भी आती है. और काम करते हुए की बेकामी में भी समझ आती है. जैसे दो कौड़ी के बाज़ारी व्‍यवसाय आईपीएल के हुलुलु को सिर पर मुकुट की तरह धारकर मन धन्‍य हो उठने के बाद धन्‍य ही बना रहता है; उसकी हिंसा, उसका बाज़ार और अपनी हार नहीं दिखती. चार बेचारे ब्‍लॉगरों की एक छोटी दुनिया और उस दुनिया में अपनी अभिव्‍यक्तियों की अकुलाहट के प्रति ज़रा विनम्रता दीख जाये वह तो नहीं ही होता, अपना दंभी चिरकुट दुर्व्‍यवहार भी नहीं दिखता?

करने को बहुत सारी बातें हैं, मगर पता नहीं सुननेवाले आपके कान कैसे हैं. हो सकता है बंता सिंह की हास्‍यास्‍पद बेहूदगी पर हंस लेने की रसिकता वाले हों, बंबई में बिलासपुर के विलुप्‍त होने की तक़लीफ़ को समझ सकने की धीरजवाले न हों? फिर करने को मुझे मेरी लिखाई भी तो है, ससुर?

Tuesday, May 20, 2008

मेमरीज़ ऑव अंडरडेवलपमेंट..

सत्‍यनारायण की कथा का मौका हो या मझली बेटी की मंगनी का, गली में झंडियां लहराने लगतीं हैं व तोरणद्वार सज जाता है वह महत्‍वपूर्ण नहीं, एक के ऊपर एक अलग-अलग आकारों वाले स्‍पीकरों का कानफाड़ू (और पता नहीं क्‍या-क्‍या फाड़ू) तथाकथित वह संगीत बजने लगना महत्‍वपूर्ण है. धाकी-धाकी, तारारा-तारारा का दिमागहीन लयबद्ध रेपीटेटीव शोर शहर के निचले तबके की गलियों को सांस्‍कृतिक ऊर्जा मुहैय्या करवाता है. क्‍या चरित्र है इस सांस्‍कृतिक ऊर्जा का? गरीब घर की लड़की, जो कभी शहर के खाये-पिये-अघायों के डिस्‍कोथेक नहीं जायेगी- न टीवी के परदों पर फ़ि‍ल्‍मी छवियों से अलग कभी उस दुनिया की थाह और अंदाज़ का उसे पता चलेगा- घर, समय व समाज की पाबंदियों के बीच दलेर के इस कुबेर संगीत से, घर के भीतर कपड़ा पछारते, भींडी काटते अपना करीना कपूरत्‍व पाती है? क्‍या पाती है? क्‍या संस्‍कार, कौन-सा समूचापन पाती है? तत्‍वहीन लयबद्ध यह धाकी-धाकी लड़की को कहां से निकालकर कहां पहुंचाता है?..

एक दूसरी तस्‍वीर है: कलश, घड़ा टांगे कुछ औरतों की बीच घोड़ी पर सवार एक घोड़े-सा ही मंगेतर. घोड़े की मंगनी का मौका है, या इसी तरह का अन्‍य कोई रिचुअलिस्टिक संस्‍कार. गली से गुज़रती इन दस औरतों के जत्‍थे की चार कुछ बुदबुदाती-सी गा रही हैं, उसी तरह अन्‍य चार हैं जो हवा में हाथ-पैर फेंकती कुछ फुदकने के अंदाज़ में नाच रही हैं. तो ठीक न यह गाने जैसा गाना है न नाचने जैसा नाचना. बंधे हुए देह व दिमाग़ का यह दूसरी तरह का सांस्‍कृतिक प्रोजेक्‍शन है, एक बार फिर, जिसका करीना कपूरत्‍व ठीक-ठीक बाहर नहीं आ पा रहा है! कहां फंसान हो जा रही है? क्‍यों नहीं अंदर की मचलनें अपने को ठीक-ठीक एक्‍सप्रेस कर पाती हैं? या इस तबके की उद्वि‍ग्‍न विचलनें मन के किसी प्रेतात्‍मा के कब्‍जे में आने पर ही स्‍वयं को ज़ाहिर करती होंगी..रहेंगी?

एक अन्‍य और तस्‍वीर है. निचले तबकों की नहीं, हमसे निम्‍न-मध्‍यवर्गीय तथाकथित शिक्षित समुदाय के बच्‍चे की. वह आपमें, हममें से कोई भी हो सकता है; क्‍या दिक़्क़त होती है इस नमूने, इस टाइप की? संवेदनाओं, फिलिंग्‍स की कंसिस्‍टेंसी का अभाव? लम्‍बी अवधि तक किसी भी भाव को यह टाइप पर्सिस्‍ट नहीं कर पाता. फुदक-फुदक कर एक भाव से दूसरे में शिफ्ट करता रहता है; इसकी हंसी जेनुइन होती है न इसका गुस्‍सा. कमर से लगी (या वहीं कहीं) एक अदृश्‍य पूंछ होती है जो इसकी जोकरई को क्रियाशील किये रहती है. बीच-बीच में यह निहायत रेचेड कैरेक्‍टर आपको आश्‍चर्यजनक रूप से प्रसन्‍न व परम तृप्‍त भी दीखता रह सकता है! इस अधपके रोटी-से आदमी की बाबत नायपॉल ने कहीं काफ़ी कड़वाहट से कहा है- ‘द वर्ल्‍ड इज़ व्‍हाट इट इज़; मेन हू आर नथिंग, हू अलाउ देमसेल्‍व्‍स टू बिकम नथिंग, हैव नो प्‍लेस इन इट.

नायपॉल ने स्‍वयं को इस बड़े संसार में खुद ढाला-ढलाई की थी, अत: वह इस तरह की समाज-निरपेक्ष, व्‍यक्ति-केंद्रित वक्‍तव्‍य आत्‍मविश्‍वासी झोंक में दे सकते थे. ठीक एक पीढ़ी पहले उनके पिता, सीपरसाद नायपॉल, ने कोशिश की थी, और पागल हो गये थे. पता नहीं नायपॉल के कहे में अपने हारे हुए पिता के प्रति भी जजमेंट अंतर्निहित है या नहीं. जो हो, हाफ़ अ लाइफ़- ऑर मैन, कच्‍चा, कटा हुआ. हास्‍यास्‍पद. पेट से भले न हो, दिमाग़ से मालनरिश्‍ड. अंडरडेवलप्‍ड. यह आदमी दलेर के कुबेर से अलग क्‍या खड़ा करेगा? क्‍या करने के लायक होगा? विल ही रियली हैव नो प्‍लेस इन द बिग वर्ल्‍ड?

क्‍यूबन फ़ि‍ल्‍ममेकर तोमास आलिया की पुरानी फ़ि‍ल्‍म है- मेमरीज़ ऑव अंडरडेवलपमेंट, छोटा था जब देखी थी, कल दुबारा देखकर चकित हो रहा था. वह देखना ही मन में इन उल्‍टे-सीधे विचारों, तस्‍वीरें के खिंचते चले जाने की वजह बना.

Thursday, May 15, 2008

पहली बार पचास साल का आदमी..


पचास साल का आदमी पहाड़ के नीचे खड़ा था
पचास साल के आदमी ने ज़िन्‍दगी जी ली थी
गया था कई सारे शहर चढ़ी थी ढेरों रेलगाड़ि‍यां
कहां किधर क्‍या ज़मीन सस्‍ती है का हिसाब
जानता था. कितने सारे ‘अनकोडिफाईड’ क़ि‍स्‍से थे
डेटा शीट कंपाइल होना बाकी था अब बाकी ही रहेगा
जैसे जेल जाते-जाते रह जाने का वह प्रसंग, या फिर
कुत्‍ते के काट खाये से बच जाने का. तीन शर्म
की कहानियां, आधी विजय की, सवा चार हंसियों की
एक वह इमारत याद आती है जाने किस बात की इमारत
हुआ करती थी. एक वह अच्‍छा स्‍कूल हुआ करता था
मगर अब नहीं रहा, जैसे वह बड़ा लाजवाब मित्र
हुआ करता था- हूनरमंद, होशियार. मगर बहुत पहले
की बात है अब कुछ कहां बचा. बीसेक दवाइयों
के नाम जानता था. पचास साल का आदमी
एक बार खुलकर हंसना चाहता था मगर हंसते हुए
हास्‍यास्‍पद दीखने की घबराहट में चुपके-चुपके
बिन-आवाज़ रो रहा था पचास साल का आदमी
पता नहीं गहरी नींद से कैसे तो अचानक आंख खुली थी
इतने तो काम पड़े थे. रस्सियों का बंटना, झोले में कामों
का अंटना, इतने तो नाम पड़े थे. और समय जो है इतना-इतना
सारा हाथ रहता लेकिन हाथ कहां आता. बारह वर्ष के उद्दंड, उश्रृंखल,
शरारती बच्‍चे की तरह भागा जाता. सोचकर थकाहट होती कि आख़ि‍र
ये माजरे थे क्‍या. होशियारी की ऐंठ में ग़लत गांव निकल आये थे?
जाने कहां पहुंचना था जाने कहां पहुंच गए थे? सिरे से सब ग़लत
होता रहा था ग़लत हो गया था. करेक्टिव मेज़र्स नहीं बचे थे
न बचा था ठांव? पचास साल का आदमी एकदम से मुड़कर
एकदम से कहीं और निकलना चाहता था. पचास साल का आदमी
पांच वर्ष के बच्‍चे की तरह पहली मर्तबा पानी में उतरने के ख़्याल
से एकदम से घबरा रहा, अपनी उद्वि‍ग्‍न चंचलता में लड़खड़ा रहा था.

Monday, May 12, 2008

खड़े हुए, बड़े हुए हैं?..



इसको गिरा उसको पटक रहे हैं, दालान के बेंच पर कूद रहे हैं, बाहर चीख रहे अंतर में कूक रहे हैं. शराफ़त से मुस्‍करा रहे हैं, हाथ हिला रहे हैं, हथेली दबाकर लिख रहे हैं, हिल रहे हैं हंस रहे हैं; बच्‍चे बड़े हो रहे हैं. मैं, जाने क्‍या था, अपने में अड़ा हुआ, अभी तक वहीं, बीच सीढ़ि‍यों खड़ा हुआ हूं. दीखे हैं अचक्‍के तब ओह, अचानक कैसे समझ आता है अरे, इतनी उमर निकली? - मगर, हाय, थे कहां हम पड़े हुए, अभी तक बड़े हुए. तसल्‍ली से बैठ सकें इतने कहां खड़े हुए? पता नहीं क्‍या था छत की धूप में गर्म हवाओं से हवाई हाथ आजमाने गया था, या छिटकी फुहारों में भटकने का, कसकभरी ठुमरियों में भींजने का मोह था, ओह? आयी होगी बरसात, नशीली छांह में ठुमरियों का तैरा होगा कोई नीला बाजरा, रहा होगा रंगीला, सपनीला- अगर रहा ही होगा माजरा; क्‍योंकि मुझसे पूछिये तो सच, मन में लम्‍बा ऐसा कुछ ठहरता नहीं, याद कुछ ऐसा पड़ता नहीं. आंख लग गयी होगी, या तैरते हुए हम किसी और के सपने में निकल गये होंगे, कहानी कहीं और घूम गयी होगी, समय किसी और की आंचल में खर्च हुआ होगा, क्‍योंकि हमने तो जैसा पहले ही बताया, अपनी शर्म में गड़े हुए अभी तक वहीं बीच सीढ़ि‍यों खड़े हुए हैं. हुआ इतना भर ही है कि आसपास बच्‍चे बड़े हुए हैं.

Saturday, May 10, 2008

कहां समझ आता है?..


हंसी-खेल में कहीं नस सरक जाये
या पैर की उंगलियों के बीच जाने
कहां से सरककर एक कंकड़
चला आये, छूटा-दबा रह जाये
और अचानक गड़े ऐसे कि मुंह
से कसकती एक कराह छूटे
चटककर कहीं कुछ भीतर टूटे
वैसे ही रहते-रहते जीवन
समझ लेने की हकबकायी
बेचैनियां समझ आती हैं
जीवन कहां आता है?

सूने दोपहर की सन सन
बजती ख़ामोशी. तकिये पर
ढीला गिरा इक चेहरा. प्‍यास
व हहास की कुछ यूं ही कह गयीं
दिल मरोड़ जानेवाली पंक्तियां
थर्मस में रखा ज़रा से सपनों का
ज़रा सा मीठा पानी. छोटी
छोटी चोट खायीं ढेरों कहानी
चाबुक चलाती सफ़र की फटकार
समझ आती है. सफ़र, ससुर,
कभी ठीक कहां समझ आता है?
(अभय के लिए)

Thursday, May 8, 2008

लाल-लाल, बेहाल

बहुत सारे ऐसे मौके हुए हैं कि किसी ने सवाल किया है पार्टी में कहां से फंस गए? और मैंने चलो, हटो, जाने दो कहकर हंसा और टाल दिया है. जबकि वही सवाल ‘लाल’ के विशेषण के साथ जब भी पीठ पर, या जहां कहीं भी, लगा है, मैं हमेशा बेदम होकर मां-बहन की गालियां बकने लगा हूं. बकने नहीं तो कम से कम सोचने तो लगा ही हूं! लाल का कुछ प्रताप ही ऐसा है. जहां न पहुंचे कवि वहां पहुंचे सुरमई रवि की तरह पहुंचकर वह तत्‍क्षण सब सुलगाने लगता है. वेरी अन्‍नोइंग एंड इरिटेटिंग इन फैक्‍ट! कुछ यही ऑव्वियस सबकॉनशस कनेक्‍ट रहा होगा कि कॉलेज के दिनों से ही मैं चौकन्‍ना रहता रहा हूं कि किसी ऐसी लड़की के हाथ लव-लेटर न थमाना पड़े जो लाल कपड़े पहनती हो. या उसकी छोटी बहन, मां, मौसी- कोई भी लाल कपड़े पहनती रही हो! भूल से अगर कभी किसी लड़की ने लाल कपड़ा पहना भी है, और भावुकता व उम्र की चिरकुटई में मेरा दिल खामख़्वाह उसमें फंसा और जाकर अटक गया भी है, और लव-लेटर देने की मजबूरी जैसी बन ही पड़ी है, तो मैंने हमेशा यह भी पाया है कि अदबदाकर मैं लड़की इन रेड की जगह लेटर उसकी सहेली के हाथ रख आया हूं. या उसकी कज़ि‍न या भाभी के हाथ! मगर ऐसा करके मैं बच गया हूं, ऐसा भी नहीं हुआ है, क्‍योंकि अंतत: ऐसे संयोग, व दुर्घटनायें सिचुएशन को रेड कर ही जाती रही हैं. और उसका खामियाजा किसी और को नहीं, मुझी को भरना पड़ा है. यूं भी कह सकते हैं कि मेरे जीवन में अगर अतिरिक्‍त प्रेम का अभाव रहा है तो उसकी वजह हमेशा रेड-इनफेक्‍शन ही रहा है!

जो कहते हैं सलाह मलो और काम पर चलो, वह गलत कहते हैं. ऐसा नहीं होता कि आपने सोच लिया कि अच्‍छा है, भई, चलो, रेड को तज दिया और काम पर निकल लिये. पता नहीं कितना वक़्त हुआ मैं लाल छोड़ा हुआ है मान के बैठा हूं, और बैठा ही हूं, क्‍योंकि काम पे जो है निकल नहीं पा रहा! लाल की जगह बाल, या बालू, की तरफ़ निकला हूं (देखिए, चाह रहा था अलीबाग के ज़ि‍क्र से बचूं, मगर अलीबाग, ससुर, घुस ही आया!) और यही हुआ है कि बेवक़ूफ़ बनकर लौटा हूं! माने ऐसा नहीं है कि किसी पाल वाली नाव पर हाथ उठाये, फैलाये, मैंने प्रेम-भावनायें व्‍यक्‍त की थीं, या छह साल के लौंडे की तरह बालू उलीचता हुआ- और चौंतीस के चिरकुट की तरह हे रक्तिल रेत!- कह-कहकर प्रणय निवेदन किया था? मगर वह रक्तिल रेत जो है पता नहीं किस तरह मेरी पैंट, लुंगी, किताब, बस्‍ते (किसी निर्मम, छलावे से भरे प्रेम की तरह?) सब जगह न केवल घुस गयी है, मेरे पीछे-पीछे मेरे घर तक चली आयी है. और चली ही नहीं आयी है, कल दु:खी होकर अपने लिए मैंने जो मीठी सूजी तैयार की, खाते समय पता चला वह सूजी से ज़्यादा सज़ा है, क्‍योंकि सूजी के साथ-साथ- मेरी आत्‍मा दलने को- उसमें रेत भी फ्राई होता रहा था!

पता नहीं कौन लोग हैं, कल घुघूती बासुती ही थीं, चेक हर टिप्‍पणी, कि ज़रा सा जल और रेत के कांबिनेशन की संगत में किलकने लगते हैं? लाल का ख़्याल उनमें भय संचार और उनके सुख का कैसे बलात्‍कार नहीं करता? जबकि मई और जून में तो लाल-लाल सोचकर मेरी घिग्घियां बंध जाती हैं. और बंधी रहती हैं. और माफ़ कीजिये, मैं गर्म मांड़-भात में तरबूज मिलाकर उसे ठंडा करके खाने की बात नहीं कर रहा! पता नहीं आपने, या घुघूती बासूती ने, देखी हैं या नहीं, मैं लाल चींटियों की बात कर रहा हूं. चींटियां तो ठीक है चींटियां हैं, मगर लाल? और वह भी मई के महीने में?

अब कल का ही क़ि‍स्‍सा लीजिये- पता नहीं कहां-कहां की चिरकुटइयों से तर कर, सिर से पैर तक जर कर मैं घर लौटा था, और कच्‍छे में ऐसे टहल रहा था मानो कमरे के ब्‍लास्‍ट फ़रनेसी ऑवन में नहीं, किसी मनोहारी, अरक्‍तधारी बीच पर सरसराता सैर फ़रमा रहा होऊं! सिंक से लगा अभी कॉफ़ी की तैयारी में जुटा ही था कि ख़बर हुई कुछ लाल चींटियां हैं, मेरे देह को सैरग़ाह समझती दायें-बायें, ऊपर-नीचे प्रदक्षिणा में जुटी हैं! एंड दे वॅर सीरियसली अबाउट देयर वर्क! आई ऑल्‍सो ट्राईड टू.. दो को पेट के प्रकट उभार पर पकड़ा. मसला. कापुत!

बट दैट वॉज़ नॉट द एंड ऑव स्‍टोरी! स्टोरी, देह के दूसरे हिस्‍से थे, और हमेशा प्रकट नहीं थे, वहां घट रहे थे! अब कोई चींटी कांख में विचरने पहुंच जाये, या भौं के पसीनों से भटकती आंख में, तो आदमी क्‍या कर सकता है? ढंग से कांख भी नहीं सकता! मैं बेढंग से भी नहीं पा रहा था. बस कराही समीरों के बीच जर्जरावस्‍था को इकॉनॉमाइज़ करता इतना भर सोच पा रहा था कि विल देयर एवर बी अ टाईम व्‍हेन आई विल बी कंप्‍लीटली, गौडेम्‍म रेड-फ्री?.

अंत में मेरी रक्‍तरंजित कुछ रेड कवि-पंक्तियां:
हे लाल, लाल, लाल!
गरज, बरस, आ बैठ
मेरे भाल. हमेशा ऐसा
क्‍या मुंह फुलाना? कभी
हंसकर भी बोल, आग
बरसाने की जगह, हमें
प्रेमआंचर में संभाल?
हे लाल, लाल, लाल?
ओहो, अहा? हां हां!

Tuesday, May 6, 2008

ज़रा सा न लिखने में.. या झूठ कहने में हर्ज है?..

कुछ दिनों से लिख नहीं रहा. कुछ दिनों से कुछ लोग हैं ‘आप कुछ लिख नहीं रहे?’ कहकर मुझे नायपॉल या हनीफ़ कुरैशी सा होने का अहसास देकर खुद को बरगलाने, व मुझे पगलवाने से बाज नहीं आ रहे हैं! चूंकि मैं नायपॉल थोड़ा समझता हूं, कुरैशी के रास्‍ते पर हूं, और खुद की पहचान-पहचानने की ही यह सब प्रक्रिया है- कुछ दिनों के इन फ़रेबी हितचिंतकों की चिंताओं में फंसने से रह गया हूं.. और इस तरह से लिखने से भी. रह. गया. हूं. ऐसा नहीं कि मेरा पीसी क्रैश कर गया हो, या माथे में डैश उभर आये हों- मतलब कोई क्रियेटिव, रिग्रेसिव राइटर्स ब्‍लॉक हो गया हो.. ऐसे जितने भी गिनाऊ ब्‍लॉक्‍स होंगे उनकी गिनती गिनते-गिनते- उनके बीच फुदकते हुए ही मैंने ब्‍लॉग लिखना शुरू किया था.. तो ब्‍लॉक्‍स की दृष्टि से मेरे ब्‍लॉग-लेखन में ऐसा कोई नाटकीय परिवर्तन नहीं आया है.. आया है तो इतना भर ही आया है कि बीच-बीच में कभी बेकल होकर आत्‍मा के भीतर झांक लेने को कुलबुलाने लगते हैं कि ससुर, हम कबार क्‍या रहे हैं? कहीं जा रहे हैं कि कहीं से आ रहे हैं? अबे, कर क्‍या रहे हैं? आत्‍मा के ऐसे निष्‍काम, निष्‍प्रयोजन प्रश्‍नों का मेरे पास प्रयोजनपूर्ण अनसर कभी नहीं रहा. छठवीं में पढ़ता था तब भी नहीं रहता था. तब ऐसे सवालों की घबराहट से बचने के लिए बगल के बेंच के बच्‍चे के झोले से पेंसिल चुरा कर रिलीव हो लिया करता था. अब इतना ही फर्क आया है कि मेरे बगल कोई बेंच, बच्‍चा या झोले नहीं बचे. नतीजतन, कुछ चुराने की जगह नाक खुजाने लगता हूं.. और लिखने की जगह, न लिखते हुए, अपनी टुच्‍चई को सार्थक कर ले जाता हूं!

कुछ दिनों से कुछ लोग हैं जो मेरे बारे में बेवजह एक डिस्‍टर्बिंग फ़ीलिंग कैरी कर रहे हैं.. जबकि मैं बिना डिस्‍टर्बेंस के, महज़ नाक ही खुजलाता रहा हूं.. अलबत्‍ता मन में मेरे भी यह ख़्याल उलटे-सीधे तरीके से आता रहा कि शायद किसी जेनुइन एक्‍साइटमेंट का अभाव है.. या तक़लीफ़ का? उसका साक्षात होते ही संभवत: खुजलाने की जगह की-बोर्ड पर उंगलियां बजाने लगूं?. मगर वह ग़लतफ़हमी ही रही होगी, क्‍योंकि गये सप्‍ताहांत बंबई (पानी के रास्‍ते पैंतीस, सड़क से लगभग सवा सौ किलोमीटर) से अलीबाग के लिए निकलते ही किसी और से क्‍या होता, सच्‍चायी से साक्षात हो ही गया! मतलब यही कि नाक खुजाने, या जीवन के अन्‍य चिरकुटइयों का कहीं अंत नहीं है की बाहर निकलते ही प्रतीति हो गयी. पता चल गया वह जितनी सुगमता से बंबई में उपलब्‍ध रहती है उतनी ही सुगमता से कली, नली, अली के बाग में भी मिलती है! थोड़ा खुलकर कहता हूं.. बंबई के जितने सोशेबाज, समर्थवान (रवि शास्‍त्री से लेकर रतन टाटा तक) हैं सबने अलीबाग में अपने सप्‍ताहांतों की दुनिया सेट कर रखी है तो अलीबाग में ऐसा लहलहाया हरापन दीखता है कि आत्‍मा प्रसन्‍न हो जाये, मगर समुंदर का जो तटीय हिस्‍सा है वह कीचड़-कादो की दो कौड़ी की चिरकुट घिनाइन दुनिया है. ऐसा इसलिए है वहां इस अमीरी की देख व रेख नहीं है. उन तटों पर पानी उलीचने का मौज करने अमीर व ताक़तवर नहीं, बंबई से बस और नाव में लदकर चिरकुट मिडिल क्‍लास पर्यटक पहुंचते हैं! या उनसे ज़रा ऊपर ताज़ा-ताज़ा पहले जेनरेशन के स्‍लीवलेस टी-शर्ट, रे-बैन और सैंट्रो, इंडिका में टहलते, हर बीसवें कदम -‘ओह, मेरा लघु, कितना सुखी परिवार!’ की अपने ताज़ा-ताज़ा डिजि‍टल कैमरा से फ़ोटू उतारते ऐसे बंधुबानर हैं जिन्‍हें वैसे भी इन दिनों किसी चीज़ से कोई फर्क नहीं पड़ता. इसलिए नहीं पड़ता कि उन्‍हें कोई बाहरी संसार की जगह सब जगह अपनी ताज़ा-ताज़ा पायी खुशहाली ही दिखती रहती है!

मैं अलीबाग में गुजारे दो दिनों पर कुछ लिखना चाहता था मगर पता नहीं क्‍या है कि अभी भी नाक खुजाने की इच्‍छा ही ज़्यादा बलवती है.. की-बोर्ड पर उंगलियां चलाने की जब बनेगी तब फिर सोचूंगा. हां, तब तक कुछ लोग जो हैं उन्‍हें सिर्फ़ इतना चेताना चाहता हूं कि मुझे नायपॉल या कुरैशी बनाने की कोशिश न करें! मैं यूं ही इतना बना हुआ हूं कि अपने को अन-डू करते-करते में ही दम फूलता रहता है.. बाकी सब ठीक-ठाक है, अपना ख़्याल रखिये, और ससुर, चिरकुटइयों में धन्‍य रहिये!