Tuesday, May 6, 2008

ज़रा सा न लिखने में.. या झूठ कहने में हर्ज है?..

कुछ दिनों से लिख नहीं रहा. कुछ दिनों से कुछ लोग हैं ‘आप कुछ लिख नहीं रहे?’ कहकर मुझे नायपॉल या हनीफ़ कुरैशी सा होने का अहसास देकर खुद को बरगलाने, व मुझे पगलवाने से बाज नहीं आ रहे हैं! चूंकि मैं नायपॉल थोड़ा समझता हूं, कुरैशी के रास्‍ते पर हूं, और खुद की पहचान-पहचानने की ही यह सब प्रक्रिया है- कुछ दिनों के इन फ़रेबी हितचिंतकों की चिंताओं में फंसने से रह गया हूं.. और इस तरह से लिखने से भी. रह. गया. हूं. ऐसा नहीं कि मेरा पीसी क्रैश कर गया हो, या माथे में डैश उभर आये हों- मतलब कोई क्रियेटिव, रिग्रेसिव राइटर्स ब्‍लॉक हो गया हो.. ऐसे जितने भी गिनाऊ ब्‍लॉक्‍स होंगे उनकी गिनती गिनते-गिनते- उनके बीच फुदकते हुए ही मैंने ब्‍लॉग लिखना शुरू किया था.. तो ब्‍लॉक्‍स की दृष्टि से मेरे ब्‍लॉग-लेखन में ऐसा कोई नाटकीय परिवर्तन नहीं आया है.. आया है तो इतना भर ही आया है कि बीच-बीच में कभी बेकल होकर आत्‍मा के भीतर झांक लेने को कुलबुलाने लगते हैं कि ससुर, हम कबार क्‍या रहे हैं? कहीं जा रहे हैं कि कहीं से आ रहे हैं? अबे, कर क्‍या रहे हैं? आत्‍मा के ऐसे निष्‍काम, निष्‍प्रयोजन प्रश्‍नों का मेरे पास प्रयोजनपूर्ण अनसर कभी नहीं रहा. छठवीं में पढ़ता था तब भी नहीं रहता था. तब ऐसे सवालों की घबराहट से बचने के लिए बगल के बेंच के बच्‍चे के झोले से पेंसिल चुरा कर रिलीव हो लिया करता था. अब इतना ही फर्क आया है कि मेरे बगल कोई बेंच, बच्‍चा या झोले नहीं बचे. नतीजतन, कुछ चुराने की जगह नाक खुजाने लगता हूं.. और लिखने की जगह, न लिखते हुए, अपनी टुच्‍चई को सार्थक कर ले जाता हूं!

कुछ दिनों से कुछ लोग हैं जो मेरे बारे में बेवजह एक डिस्‍टर्बिंग फ़ीलिंग कैरी कर रहे हैं.. जबकि मैं बिना डिस्‍टर्बेंस के, महज़ नाक ही खुजलाता रहा हूं.. अलबत्‍ता मन में मेरे भी यह ख़्याल उलटे-सीधे तरीके से आता रहा कि शायद किसी जेनुइन एक्‍साइटमेंट का अभाव है.. या तक़लीफ़ का? उसका साक्षात होते ही संभवत: खुजलाने की जगह की-बोर्ड पर उंगलियां बजाने लगूं?. मगर वह ग़लतफ़हमी ही रही होगी, क्‍योंकि गये सप्‍ताहांत बंबई (पानी के रास्‍ते पैंतीस, सड़क से लगभग सवा सौ किलोमीटर) से अलीबाग के लिए निकलते ही किसी और से क्‍या होता, सच्‍चायी से साक्षात हो ही गया! मतलब यही कि नाक खुजाने, या जीवन के अन्‍य चिरकुटइयों का कहीं अंत नहीं है की बाहर निकलते ही प्रतीति हो गयी. पता चल गया वह जितनी सुगमता से बंबई में उपलब्‍ध रहती है उतनी ही सुगमता से कली, नली, अली के बाग में भी मिलती है! थोड़ा खुलकर कहता हूं.. बंबई के जितने सोशेबाज, समर्थवान (रवि शास्‍त्री से लेकर रतन टाटा तक) हैं सबने अलीबाग में अपने सप्‍ताहांतों की दुनिया सेट कर रखी है तो अलीबाग में ऐसा लहलहाया हरापन दीखता है कि आत्‍मा प्रसन्‍न हो जाये, मगर समुंदर का जो तटीय हिस्‍सा है वह कीचड़-कादो की दो कौड़ी की चिरकुट घिनाइन दुनिया है. ऐसा इसलिए है वहां इस अमीरी की देख व रेख नहीं है. उन तटों पर पानी उलीचने का मौज करने अमीर व ताक़तवर नहीं, बंबई से बस और नाव में लदकर चिरकुट मिडिल क्‍लास पर्यटक पहुंचते हैं! या उनसे ज़रा ऊपर ताज़ा-ताज़ा पहले जेनरेशन के स्‍लीवलेस टी-शर्ट, रे-बैन और सैंट्रो, इंडिका में टहलते, हर बीसवें कदम -‘ओह, मेरा लघु, कितना सुखी परिवार!’ की अपने ताज़ा-ताज़ा डिजि‍टल कैमरा से फ़ोटू उतारते ऐसे बंधुबानर हैं जिन्‍हें वैसे भी इन दिनों किसी चीज़ से कोई फर्क नहीं पड़ता. इसलिए नहीं पड़ता कि उन्‍हें कोई बाहरी संसार की जगह सब जगह अपनी ताज़ा-ताज़ा पायी खुशहाली ही दिखती रहती है!

मैं अलीबाग में गुजारे दो दिनों पर कुछ लिखना चाहता था मगर पता नहीं क्‍या है कि अभी भी नाक खुजाने की इच्‍छा ही ज़्यादा बलवती है.. की-बोर्ड पर उंगलियां चलाने की जब बनेगी तब फिर सोचूंगा. हां, तब तक कुछ लोग जो हैं उन्‍हें सिर्फ़ इतना चेताना चाहता हूं कि मुझे नायपॉल या कुरैशी बनाने की कोशिश न करें! मैं यूं ही इतना बना हुआ हूं कि अपने को अन-डू करते-करते में ही दम फूलता रहता है.. बाकी सब ठीक-ठाक है, अपना ख़्याल रखिये, और ससुर, चिरकुटइयों में धन्‍य रहिये!

10 comments:

  1. तो गरमी के कारण हाथ में भी खुजली आ ही गयी.हम अभी भी इंतजार में हैं..कुरैशी साहब.

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  2. तो, हमें चिरकुट न समझते हुए, नाक खुजाते खुजाते ही पोस्ट लिख लेने की कला के बारे में बताइए. ऐसी कला पाकर कौन भाग धन्य नहीं होगा?

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  3. ना लिखते हुए भी आपने तो ढेर सारा लिख डाला ....खिन्न मन से आपका लिखा भी कागजो पे असर दिखा रहा है.....

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  4. आख़िर आपने नाक खुजाने को विश्राम दिया और हमें सिर खुजाने को नयी पोस्ट मिली. अच्छा हुआ.

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  5. मई मास की शुरुआत, पहलौठी का सुर और ऐसा अनमनापन ? बंधु-बानर का कौनो अभयारण्य थोड़ी ना होता है . ऊ तो सबही जगा मिलबे करता है . काहे गुस्साते हैं ? जमकर लिखिए और ऐसे टोपाबसंतों की फ़ीत उतार दीजिए . फरसा कहां गया ? सान धरने भेजा है ?

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  6. अब नहीं लिखेंगे तो पूछबे करेंगे इसमें पगलवाने से बाज नहीं आ रहे हैं! वाली कौन बात है. मगर आप भी तो नहीं लिख कर बकिया पाठकों को पगलवाने से बाज नहीं आ रहे. :) हम तो खैर अलग से हैं सो नहीं पगला रहे हैं. जानते थे अलीबाग से लौट कर बिना कहे खुद ही लिखने लगेंगे आप.

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  7. तो, अप भी सप्ताहांत अलीबाग हो आए। रतन टाटा से रवि शास्त्री तक तो, पहुंची गए नाक खुजाते-खुजाते। जल्दी हो कि आप नायपॉल भी बन जाएं।

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  8. आपको लोग अलीबाग से आया समझ रहे हैं.:-)
    हम तो रामबाग भी नहीं जा सके कभी.चिरकुटई में लगे रहे. चिरकुटई से निकलें तो रामबाग और हजारीबाग तक पहुँचें......:-)

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  9. बेचारी एक नाक है, उसे कितना खुजाया जा सकता है ? कोई सीमा तो होगी ही !
    आप तो दो दिन अलीबाग रहकर भी प्रसन्न नहीं लग रहे और हम पिछले शनिवार के अपने दो घंटे के समुद्र तट भ्रमण से प्रसन्न हैं। ( जिसमें आना जाना भी, रेत में स्कॉर्पियो का फंसना भी और हमारी छोटी सी पिकनिक सब समा गई। )
    खैर हो सके तो लिखते रहिये। हमें भी सिर खुजाने को कोई कारण चाहिये ।
    घुघूती बासूती

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  10. कोई पाउडर हो तो मलें जिससे खुजली मिटे।

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