Thursday, May 8, 2008

लाल-लाल, बेहाल

बहुत सारे ऐसे मौके हुए हैं कि किसी ने सवाल किया है पार्टी में कहां से फंस गए? और मैंने चलो, हटो, जाने दो कहकर हंसा और टाल दिया है. जबकि वही सवाल ‘लाल’ के विशेषण के साथ जब भी पीठ पर, या जहां कहीं भी, लगा है, मैं हमेशा बेदम होकर मां-बहन की गालियां बकने लगा हूं. बकने नहीं तो कम से कम सोचने तो लगा ही हूं! लाल का कुछ प्रताप ही ऐसा है. जहां न पहुंचे कवि वहां पहुंचे सुरमई रवि की तरह पहुंचकर वह तत्‍क्षण सब सुलगाने लगता है. वेरी अन्‍नोइंग एंड इरिटेटिंग इन फैक्‍ट! कुछ यही ऑव्वियस सबकॉनशस कनेक्‍ट रहा होगा कि कॉलेज के दिनों से ही मैं चौकन्‍ना रहता रहा हूं कि किसी ऐसी लड़की के हाथ लव-लेटर न थमाना पड़े जो लाल कपड़े पहनती हो. या उसकी छोटी बहन, मां, मौसी- कोई भी लाल कपड़े पहनती रही हो! भूल से अगर कभी किसी लड़की ने लाल कपड़ा पहना भी है, और भावुकता व उम्र की चिरकुटई में मेरा दिल खामख़्वाह उसमें फंसा और जाकर अटक गया भी है, और लव-लेटर देने की मजबूरी जैसी बन ही पड़ी है, तो मैंने हमेशा यह भी पाया है कि अदबदाकर मैं लड़की इन रेड की जगह लेटर उसकी सहेली के हाथ रख आया हूं. या उसकी कज़ि‍न या भाभी के हाथ! मगर ऐसा करके मैं बच गया हूं, ऐसा भी नहीं हुआ है, क्‍योंकि अंतत: ऐसे संयोग, व दुर्घटनायें सिचुएशन को रेड कर ही जाती रही हैं. और उसका खामियाजा किसी और को नहीं, मुझी को भरना पड़ा है. यूं भी कह सकते हैं कि मेरे जीवन में अगर अतिरिक्‍त प्रेम का अभाव रहा है तो उसकी वजह हमेशा रेड-इनफेक्‍शन ही रहा है!

जो कहते हैं सलाह मलो और काम पर चलो, वह गलत कहते हैं. ऐसा नहीं होता कि आपने सोच लिया कि अच्‍छा है, भई, चलो, रेड को तज दिया और काम पर निकल लिये. पता नहीं कितना वक़्त हुआ मैं लाल छोड़ा हुआ है मान के बैठा हूं, और बैठा ही हूं, क्‍योंकि काम पे जो है निकल नहीं पा रहा! लाल की जगह बाल, या बालू, की तरफ़ निकला हूं (देखिए, चाह रहा था अलीबाग के ज़ि‍क्र से बचूं, मगर अलीबाग, ससुर, घुस ही आया!) और यही हुआ है कि बेवक़ूफ़ बनकर लौटा हूं! माने ऐसा नहीं है कि किसी पाल वाली नाव पर हाथ उठाये, फैलाये, मैंने प्रेम-भावनायें व्‍यक्‍त की थीं, या छह साल के लौंडे की तरह बालू उलीचता हुआ- और चौंतीस के चिरकुट की तरह हे रक्तिल रेत!- कह-कहकर प्रणय निवेदन किया था? मगर वह रक्तिल रेत जो है पता नहीं किस तरह मेरी पैंट, लुंगी, किताब, बस्‍ते (किसी निर्मम, छलावे से भरे प्रेम की तरह?) सब जगह न केवल घुस गयी है, मेरे पीछे-पीछे मेरे घर तक चली आयी है. और चली ही नहीं आयी है, कल दु:खी होकर अपने लिए मैंने जो मीठी सूजी तैयार की, खाते समय पता चला वह सूजी से ज़्यादा सज़ा है, क्‍योंकि सूजी के साथ-साथ- मेरी आत्‍मा दलने को- उसमें रेत भी फ्राई होता रहा था!

पता नहीं कौन लोग हैं, कल घुघूती बासुती ही थीं, चेक हर टिप्‍पणी, कि ज़रा सा जल और रेत के कांबिनेशन की संगत में किलकने लगते हैं? लाल का ख़्याल उनमें भय संचार और उनके सुख का कैसे बलात्‍कार नहीं करता? जबकि मई और जून में तो लाल-लाल सोचकर मेरी घिग्घियां बंध जाती हैं. और बंधी रहती हैं. और माफ़ कीजिये, मैं गर्म मांड़-भात में तरबूज मिलाकर उसे ठंडा करके खाने की बात नहीं कर रहा! पता नहीं आपने, या घुघूती बासूती ने, देखी हैं या नहीं, मैं लाल चींटियों की बात कर रहा हूं. चींटियां तो ठीक है चींटियां हैं, मगर लाल? और वह भी मई के महीने में?

अब कल का ही क़ि‍स्‍सा लीजिये- पता नहीं कहां-कहां की चिरकुटइयों से तर कर, सिर से पैर तक जर कर मैं घर लौटा था, और कच्‍छे में ऐसे टहल रहा था मानो कमरे के ब्‍लास्‍ट फ़रनेसी ऑवन में नहीं, किसी मनोहारी, अरक्‍तधारी बीच पर सरसराता सैर फ़रमा रहा होऊं! सिंक से लगा अभी कॉफ़ी की तैयारी में जुटा ही था कि ख़बर हुई कुछ लाल चींटियां हैं, मेरे देह को सैरग़ाह समझती दायें-बायें, ऊपर-नीचे प्रदक्षिणा में जुटी हैं! एंड दे वॅर सीरियसली अबाउट देयर वर्क! आई ऑल्‍सो ट्राईड टू.. दो को पेट के प्रकट उभार पर पकड़ा. मसला. कापुत!

बट दैट वॉज़ नॉट द एंड ऑव स्‍टोरी! स्टोरी, देह के दूसरे हिस्‍से थे, और हमेशा प्रकट नहीं थे, वहां घट रहे थे! अब कोई चींटी कांख में विचरने पहुंच जाये, या भौं के पसीनों से भटकती आंख में, तो आदमी क्‍या कर सकता है? ढंग से कांख भी नहीं सकता! मैं बेढंग से भी नहीं पा रहा था. बस कराही समीरों के बीच जर्जरावस्‍था को इकॉनॉमाइज़ करता इतना भर सोच पा रहा था कि विल देयर एवर बी अ टाईम व्‍हेन आई विल बी कंप्‍लीटली, गौडेम्‍म रेड-फ्री?.

अंत में मेरी रक्‍तरंजित कुछ रेड कवि-पंक्तियां:
हे लाल, लाल, लाल!
गरज, बरस, आ बैठ
मेरे भाल. हमेशा ऐसा
क्‍या मुंह फुलाना? कभी
हंसकर भी बोल, आग
बरसाने की जगह, हमें
प्रेमआंचर में संभाल?
हे लाल, लाल, लाल?
ओहो, अहा? हां हां!

6 comments:

  1. लाल लाल लट्टू नचाने वाला कौन?
    धरती माता सो गई जगाने वाला कौन?

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  2. चीटियाँ परेशान कर रही थीं. वो भी 'लाल'. हम तो समझते थे कि परेशान करने की औकात केवल 'लाल चींटों' में होती है..... आप चींटियों को न मसलिये. थोड़ा सा विचरण का हक़ उनका भी है. माना कि अरण्य में विचरण, खतरे से खाली नहीं... लेकिन खतरा तो शहर में भी है.... इसलिए अगली बार चींटियाँ दिखाई दें तो उनके ऊपर दया करें.

    और सूजी का हेलुआ में रेत का मिलावट कैसे हो गया...पूरा हेलुआ ही रेतमय हो गया होगा...रेत को हेलुआमय बनाईये...दोनों को तकलीफ नहीं होगी...न रेत को और न हेलुआ को...आई थिंक, इट्स रीयली डिफिकल्ट टू बी रेड फ्री...कभी नहीं...इट्स फ्रस्ट्रेटिन्ग.. नो? ..स्पेशली इफ वन बिलीव्स दैट रेड वाज देयर टू फ्री वन...

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  3. आपको हमारा लाल सलाम ओर एक मशवरा .....कच्छे मे न टहला करे.......

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  4. कैसी सलाह दे रहे हैं, डाक साब? कच्‍छे में नहीं मतलब नंगे टहला करें?

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  5. लाली देखत लाल की, मैं भी हो गई लाल-समीर लाल.

    अलीबाग तो सुने थे सबहिं रिलेक्स होने जाते हैं? बेहाली में आपको देख ताज्जुब ही हो रहा है.

    डॉ सा: का मशवरा तो आप समझ ही गये है. कित्ते ज्ञानी है आप!!! :)

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    आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.

    एक नया हिन्दी चिट्ठा किसी नये व्यक्ति से भी शुरु करवायें और हिन्दी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें.

    शुभकामनाऐं.

    -समीर लाल
    (उड़न तश्तरी)

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  6. जब तक धमनियों में धमा धम जारी - लाल से मुक्ति कहाँ गुरुवर ? - वैसे "लाल" कवितायेँ गरम मौसम में हैं - "लाल हे लाल / छींट छींट कर लाल / इसके पहले सूख कर काला / निकल कर खूं का / और क्या होने वाला "- सादर -मनीष
    [ पुनश्च : [ (१) ये ई-मेल से पढ़ना समयानुसार है लेकिन पके का स्वाद ब्लॉग ही में आया - दो हफ्ते का टोनिक गड़प लिए- ऐनीमिया मुक्ति लालै रंग से हुई - कहे ई-मेल एक्सपेरिमेंट फेल - बस सिग्नल जस यूज़ होगा (२) हम फिर बोल रहा हूँ - मुक्त गद्य और मन की गाँठ में किताब का असबाब है - बनाएं तुरत ]

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