कहां समझ आता है?..

5 कमेंट - लजाइये नहीं, टिपियाइये


हंसी-खेल में कहीं नस सरक जाये
या पैर की उंगलियों के बीच जाने
कहां से सरककर एक कंकड़
चला आये, छूटा-दबा रह जाये
और अचानक गड़े ऐसे कि मुंह
से कसकती एक कराह छूटे
चटककर कहीं कुछ भीतर टूटे
वैसे ही रहते-रहते जीवन
समझ लेने की हकबकायी
बेचैनियां समझ आती हैं
जीवन कहां आता है?

सूने दोपहर की सन सन
बजती ख़ामोशी. तकिये पर
ढीला गिरा इक चेहरा. प्‍यास
व हहास की कुछ यूं ही कह गयीं
दिल मरोड़ जानेवाली पंक्तियां
थर्मस में रखा ज़रा से सपनों का
ज़रा सा मीठा पानी. छोटी
छोटी चोट खायीं ढेरों कहानी
चाबुक चलाती सफ़र की फटकार
समझ आती है. सफ़र, ससुर,
कभी ठीक कहां समझ आता है?
(अभय के लिए)

 
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हर्षवर्धन - May 10, 2008 8:34 AM

सफर, कहां ठीक से समझ आता है। ई ससुरा तो बस अपने आप अपनी राह चला जाता है। सुनबै नहीं करता।

Parul - May 10, 2008 10:50 AM

ह्म्म्म्म

yunus - May 10, 2008 2:04 PM

जेई तो हम कब से सोच रहे हैं ।
आपको पता चले तो बता देना ।
फोन नंबर है आपके पास हमारा
ई ससुरा सफर कहां समझ आता है ।
ससुरा
ससुरा सफर

Udan Tashtari - May 10, 2008 10:22 PM

बेचैनियां समझ आती हैं
जीवन कहां आता है?
......
समझ आती है. सफ़र, ससुर,
कभी ठीक कहां समझ आता है?
........
इस उहापोह में आदमी फंसा है
फसन समझ आती है उसे,
बाकि तो समझने की फिराक में आदमी
समझते समझते ही
उपर चला जाता है मगर,
कभी किसे कहां समझ आता है?

--अजीब सफर है जिसकी कोई मंजिल नहीं-बहुत खूब!!!

मीनाक्षी - May 10, 2008 11:36 PM

सफ़र को समझना ही क्यों है? नन्हे बच्चे से चलते जाना है जो नया-नया चलना सीखता है. गिरता है, उठता है, फिर चल पड़ता है.

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