Monday, May 12, 2008

खड़े हुए, बड़े हुए हैं?..



इसको गिरा उसको पटक रहे हैं, दालान के बेंच पर कूद रहे हैं, बाहर चीख रहे अंतर में कूक रहे हैं. शराफ़त से मुस्‍करा रहे हैं, हाथ हिला रहे हैं, हथेली दबाकर लिख रहे हैं, हिल रहे हैं हंस रहे हैं; बच्‍चे बड़े हो रहे हैं. मैं, जाने क्‍या था, अपने में अड़ा हुआ, अभी तक वहीं, बीच सीढ़ि‍यों खड़ा हुआ हूं. दीखे हैं अचक्‍के तब ओह, अचानक कैसे समझ आता है अरे, इतनी उमर निकली? - मगर, हाय, थे कहां हम पड़े हुए, अभी तक बड़े हुए. तसल्‍ली से बैठ सकें इतने कहां खड़े हुए? पता नहीं क्‍या था छत की धूप में गर्म हवाओं से हवाई हाथ आजमाने गया था, या छिटकी फुहारों में भटकने का, कसकभरी ठुमरियों में भींजने का मोह था, ओह? आयी होगी बरसात, नशीली छांह में ठुमरियों का तैरा होगा कोई नीला बाजरा, रहा होगा रंगीला, सपनीला- अगर रहा ही होगा माजरा; क्‍योंकि मुझसे पूछिये तो सच, मन में लम्‍बा ऐसा कुछ ठहरता नहीं, याद कुछ ऐसा पड़ता नहीं. आंख लग गयी होगी, या तैरते हुए हम किसी और के सपने में निकल गये होंगे, कहानी कहीं और घूम गयी होगी, समय किसी और की आंचल में खर्च हुआ होगा, क्‍योंकि हमने तो जैसा पहले ही बताया, अपनी शर्म में गड़े हुए अभी तक वहीं बीच सीढ़ि‍यों खड़े हुए हैं. हुआ इतना भर ही है कि आसपास बच्‍चे बड़े हुए हैं.

6 comments:

  1. इतनी खूबसूरत कविता को गद्य में लिख दिया ! अजदक नहीं तो !
    afloo-the-awful

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  2. पंक्तियाँ छोटी-बड़ी कर देने से कविता नहीं हो जाती. कविता में कथ्य के साथ-साथ एक आतंरिक लय और संवेदनशीलता होनी चाहिए, यह आपने अच्छी तरह कर दिखाया है.

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  3. और इस बच्चे का क्या हुआ जो अब पहाड़ के पास इमारतों सा बन गया है....tell me what happened to that kid? Did he grow up...down...old or into his own background??

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  4. छोटे छोटे बिम्बों से क्या खाका खींचा है आपने! अच्छा है...ऐसे ही छोटी छोटी ज़िनदगी की कतरने छांटकर हमारे लिये लिखते रहिये...खूब है मित्रवर..

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  5. बहुत ही उम्दा पीस-लोग कह रहे हैं गद्य है?? क्या सचमुच?

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  6. शर्मीले बच्चे को तो देखा लेकिन आपकी इन पंक्तियों ने मन मोह लिया.....
    "चुप रहें और सोचें.. सोच के सागर में उतर जायें.. और बाहर आयें तो कोई नाटकीयता न हो.. कुछ महीन चमक चमके.. तारोंभरी रोशन रात दमके.. और कदम आगे बढ़ें.. धीमे-धीमे.." जिन्हें पढ़कर हम सपनों के सागर में उतरते चले गए...

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