पहली बार पचास साल का आदमी..

पचास साल का आदमी पहाड़ के नीचे खड़ा था
पचास साल के आदमी ने ज़िन्दगी जी ली थी
गया था कई सारे शहर चढ़ी थी ढेरों रेलगाड़ियां
कहां किधर क्या ज़मीन सस्ती है का हिसाब
जानता था. कितने सारे ‘अनकोडिफाईड’ क़िस्से थे
डेटा शीट कंपाइल होना बाकी था अब बाकी ही रहेगा
जैसे जेल जाते-जाते रह जाने का वह प्रसंग, या फिर
कुत्ते के काट खाये से बच जाने का. तीन शर्म
की कहानियां, आधी विजय की, सवा चार हंसियों की
एक वह इमारत याद आती है जाने किस बात की इमारत
हुआ करती थी. एक वह अच्छा स्कूल हुआ करता था
मगर अब नहीं रहा, जैसे वह बड़ा लाजवाब मित्र
हुआ करता था- हूनरमंद, होशियार. मगर बहुत पहले
की बात है अब कुछ कहां बचा. बीसेक दवाइयों
के नाम जानता था. पचास साल का आदमी
एक बार खुलकर हंसना चाहता था मगर हंसते हुए
हास्यास्पद दीखने की घबराहट में चुपके-चुपके
बिन-आवाज़ रो रहा था पचास साल का आदमी
पता नहीं गहरी नींद से कैसे तो अचानक आंख खुली थी
इतने तो काम पड़े थे. रस्सियों का बंटना, झोले में कामों
का अंटना, इतने तो नाम पड़े थे. और समय जो है इतना-इतना
सारा हाथ रहता लेकिन हाथ कहां आता. बारह वर्ष के उद्दंड, उश्रृंखल,
शरारती बच्चे की तरह भागा जाता. सोचकर थकाहट होती कि आख़िर
ये माजरे थे क्या. होशियारी की ऐंठ में ग़लत गांव निकल आये थे?
जाने कहां पहुंचना था जाने कहां पहुंच गए थे? सिरे से सब ग़लत
होता रहा था ग़लत हो गया था. करेक्टिव मेज़र्स नहीं बचे थे
न बचा था ठांव? पचास साल का आदमी एकदम से मुड़कर
एकदम से कहीं और निकलना चाहता था. पचास साल का आदमी
पांच वर्ष के बच्चे की तरह पहली मर्तबा पानी में उतरने के ख़्याल
से एकदम से घबरा रहा, अपनी उद्विग्न चंचलता में लड़खड़ा रहा था.