Tuesday, May 20, 2008

मेमरीज़ ऑव अंडरडेवलपमेंट..

सत्‍यनारायण की कथा का मौका हो या मझली बेटी की मंगनी का, गली में झंडियां लहराने लगतीं हैं व तोरणद्वार सज जाता है वह महत्‍वपूर्ण नहीं, एक के ऊपर एक अलग-अलग आकारों वाले स्‍पीकरों का कानफाड़ू (और पता नहीं क्‍या-क्‍या फाड़ू) तथाकथित वह संगीत बजने लगना महत्‍वपूर्ण है. धाकी-धाकी, तारारा-तारारा का दिमागहीन लयबद्ध रेपीटेटीव शोर शहर के निचले तबके की गलियों को सांस्‍कृतिक ऊर्जा मुहैय्या करवाता है. क्‍या चरित्र है इस सांस्‍कृतिक ऊर्जा का? गरीब घर की लड़की, जो कभी शहर के खाये-पिये-अघायों के डिस्‍कोथेक नहीं जायेगी- न टीवी के परदों पर फ़ि‍ल्‍मी छवियों से अलग कभी उस दुनिया की थाह और अंदाज़ का उसे पता चलेगा- घर, समय व समाज की पाबंदियों के बीच दलेर के इस कुबेर संगीत से, घर के भीतर कपड़ा पछारते, भींडी काटते अपना करीना कपूरत्‍व पाती है? क्‍या पाती है? क्‍या संस्‍कार, कौन-सा समूचापन पाती है? तत्‍वहीन लयबद्ध यह धाकी-धाकी लड़की को कहां से निकालकर कहां पहुंचाता है?..

एक दूसरी तस्‍वीर है: कलश, घड़ा टांगे कुछ औरतों की बीच घोड़ी पर सवार एक घोड़े-सा ही मंगेतर. घोड़े की मंगनी का मौका है, या इसी तरह का अन्‍य कोई रिचुअलिस्टिक संस्‍कार. गली से गुज़रती इन दस औरतों के जत्‍थे की चार कुछ बुदबुदाती-सी गा रही हैं, उसी तरह अन्‍य चार हैं जो हवा में हाथ-पैर फेंकती कुछ फुदकने के अंदाज़ में नाच रही हैं. तो ठीक न यह गाने जैसा गाना है न नाचने जैसा नाचना. बंधे हुए देह व दिमाग़ का यह दूसरी तरह का सांस्‍कृतिक प्रोजेक्‍शन है, एक बार फिर, जिसका करीना कपूरत्‍व ठीक-ठीक बाहर नहीं आ पा रहा है! कहां फंसान हो जा रही है? क्‍यों नहीं अंदर की मचलनें अपने को ठीक-ठीक एक्‍सप्रेस कर पाती हैं? या इस तबके की उद्वि‍ग्‍न विचलनें मन के किसी प्रेतात्‍मा के कब्‍जे में आने पर ही स्‍वयं को ज़ाहिर करती होंगी..रहेंगी?

एक अन्‍य और तस्‍वीर है. निचले तबकों की नहीं, हमसे निम्‍न-मध्‍यवर्गीय तथाकथित शिक्षित समुदाय के बच्‍चे की. वह आपमें, हममें से कोई भी हो सकता है; क्‍या दिक़्क़त होती है इस नमूने, इस टाइप की? संवेदनाओं, फिलिंग्‍स की कंसिस्‍टेंसी का अभाव? लम्‍बी अवधि तक किसी भी भाव को यह टाइप पर्सिस्‍ट नहीं कर पाता. फुदक-फुदक कर एक भाव से दूसरे में शिफ्ट करता रहता है; इसकी हंसी जेनुइन होती है न इसका गुस्‍सा. कमर से लगी (या वहीं कहीं) एक अदृश्‍य पूंछ होती है जो इसकी जोकरई को क्रियाशील किये रहती है. बीच-बीच में यह निहायत रेचेड कैरेक्‍टर आपको आश्‍चर्यजनक रूप से प्रसन्‍न व परम तृप्‍त भी दीखता रह सकता है! इस अधपके रोटी-से आदमी की बाबत नायपॉल ने कहीं काफ़ी कड़वाहट से कहा है- ‘द वर्ल्‍ड इज़ व्‍हाट इट इज़; मेन हू आर नथिंग, हू अलाउ देमसेल्‍व्‍स टू बिकम नथिंग, हैव नो प्‍लेस इन इट.

नायपॉल ने स्‍वयं को इस बड़े संसार में खुद ढाला-ढलाई की थी, अत: वह इस तरह की समाज-निरपेक्ष, व्‍यक्ति-केंद्रित वक्‍तव्‍य आत्‍मविश्‍वासी झोंक में दे सकते थे. ठीक एक पीढ़ी पहले उनके पिता, सीपरसाद नायपॉल, ने कोशिश की थी, और पागल हो गये थे. पता नहीं नायपॉल के कहे में अपने हारे हुए पिता के प्रति भी जजमेंट अंतर्निहित है या नहीं. जो हो, हाफ़ अ लाइफ़- ऑर मैन, कच्‍चा, कटा हुआ. हास्‍यास्‍पद. पेट से भले न हो, दिमाग़ से मालनरिश्‍ड. अंडरडेवलप्‍ड. यह आदमी दलेर के कुबेर से अलग क्‍या खड़ा करेगा? क्‍या करने के लायक होगा? विल ही रियली हैव नो प्‍लेस इन द बिग वर्ल्‍ड?

क्‍यूबन फ़ि‍ल्‍ममेकर तोमास आलिया की पुरानी फ़ि‍ल्‍म है- मेमरीज़ ऑव अंडरडेवलपमेंट, छोटा था जब देखी थी, कल दुबारा देखकर चकित हो रहा था. वह देखना ही मन में इन उल्‍टे-सीधे विचारों, तस्‍वीरें के खिंचते चले जाने की वजह बना.

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