Thursday, May 22, 2008

फिर बैतलवा बाल पर.. अहा, ओहो?

ओह, लड़ि‍यायी बकरी चरती उत्‍फुल्लित हरी हरी
संभावनाओं में नहायी रात कैसी, अहा, भरी भरी!


ओह. फिर अहा! कि पहले अहा, बाद में ओह? पद्य में पैर धरते ही, पता नहीं क्‍यों, हमेशा ही असमंजस आकर हमें धर लेता है. और फिर दबोचे रहता है. कितना अच्‍छा होता हम ठीक-ठीक जानते होते कि अदाओं की छटाओं की कैसी बहार फैलायें कि कविताजंलि कहलायें (कहलायेंगे न? कि जांत में जंतायें-भुरकुसायेंगे?). ओह (कि अहा?). कैसे-कैसे तो भाव मन को बींधते रहते हैं, लेकिन, आह, कैसा तो यह निष्‍ठुर समय है कि इन पर, उन पर किसी पर इन दिनों कहां लिखना हो पा रहा है. चिरकुट टिनहा-सी झोले में एक कामकाजी लिखाई गिरी है कि उसी को सम्‍हालते-सम्‍हलने में तबाह हूं. नतीजे में, मन की जो बिंधाहटें हैं, वह वहीं (मन में, और कहां?) उमड़-घुमड़ करती ढेर होती रहती हैं.. मन को चीर कर, की-बोर्ड फाड़कर, ब्‍लॉग की छाती पर हरहराने लगें इसकी नौबत ही नहीं आ रही है. नौबत आती जब टाइम निकलता, यहां तो हाल है, ससुर, टाइमे नहीं निकल पा रहा.

ज़रा सा वक़्त निकले तो ये कर लें वो कर लें के मोहक अरमानों का मुरझाना हो जा रहा है, टाइम का निकलना नहीं हो पा रहा. वह लोग धन्‍य हैं जो नौकरियां कर रहे हैं. ऊपर से हंसने का टाइम भी निकाल ले रहे हैं. फिर वह लोग तो और ज़्यादा धन्‍य हैं जो न केवल हंसते हुए नौकरियां कर रहे हैं, बल्कि हंसते-हंसते पोस्‍ट भी ठेल देने का निकाल ले रहे हैं. टाइम. उसके बावजूद भी हंस ले रहे हैं? बहुत बार तो हास्‍यास्‍पद पोस्‍ट ठेलकर भी बेहूदगी के हौज में पानी उलीचते हें-हें कर ले जा रहे हैं. और टिप्‍पणियों पर टिप्‍पणी करने का भी टाइम निकाल ले रहे हैं!

आजू-बाजू बारह लोगों का श्रृद्धालु सुगंधित चिरकुट समाज श्रद्धापुष्‍प अर्पित करने का भी निकाल ले रहा है. टाइम! और यह सारा व्‍यापार हंसते-हंसते की निष्‍काम, निस्‍वार्थ भावना में ही संपन्‍न हो रहा है! ओहो! तदंतर अहा! सचमुच, यह धन्‍यावस्‍था से ऊपर की अवस्‍था है. सोचकर श्रद्धा से मेरा सिर झुक और आंखें मुंद जाती हैं. फिर इसका स्‍मरण होते ही कि हाथ में कुछ काम है, और अभी खत्‍म नहीं हुआ है, और फ़ि‍लहाल साहित्यिक व ब्‍लॉगिय श्रेष्‍ठता के विमर्श से इस गरीब के जीवन में ज़्यादा ज़रूरी है, मैं धन्‍य-धान्‍य भरे इस संभावनामयी- ओह, कैसी अनोखी तो रच ली है हमने यह धरा- से सरककर अपनी बिंधाहटों में दुबक जाता हूं. सुबुक-सुबुक तो जाता ही हूं..

बहुत सारे मौके हैं जब चुप रहना अच्‍छा नहीं लगता (न रहना अच्‍छी बात होती है), मगर यह भी अपनी दुलारी- दो कौड़ी के श्रृंगार में अपने को धन्‍य मान रही हिंदी बेचारी की चिर-परिचित विशिष्‍ट लाक्षणिकता ही है जहां दो कौड़ी के सुख से सुखी होने व दूसरों को दुखी करने से अलग, इस गाल-बजावन ज़बान में, किसी महत्‍तम मार्मिक अनुभव की व्‍यंजना की उसके व्‍यवहारकर्ताओं को न चिंता होती है, न उसे अपने संस्‍कार में ढालने की कोई वयस्‍क समझ बनती है; बंता सिंह और संता सिंह बड़ी आसानी से समझ आते हैं. उस पर हंसी भी आती है. और काम करते हुए की बेकामी में भी समझ आती है. जैसे दो कौड़ी के बाज़ारी व्‍यवसाय आईपीएल के हुलुलु को सिर पर मुकुट की तरह धारकर मन धन्‍य हो उठने के बाद धन्‍य ही बना रहता है; उसकी हिंसा, उसका बाज़ार और अपनी हार नहीं दिखती. चार बेचारे ब्‍लॉगरों की एक छोटी दुनिया और उस दुनिया में अपनी अभिव्‍यक्तियों की अकुलाहट के प्रति ज़रा विनम्रता दीख जाये वह तो नहीं ही होता, अपना दंभी चिरकुट दुर्व्‍यवहार भी नहीं दिखता?

करने को बहुत सारी बातें हैं, मगर पता नहीं सुननेवाले आपके कान कैसे हैं. हो सकता है बंता सिंह की हास्‍यास्‍पद बेहूदगी पर हंस लेने की रसिकता वाले हों, बंबई में बिलासपुर के विलुप्‍त होने की तक़लीफ़ को समझ सकने की धीरजवाले न हों? फिर करने को मुझे मेरी लिखाई भी तो है, ससुर?

14 comments:

  1. ओह, लड़ि‍यायी बकरी चरती उत्‍फुल्लित हरी हरी
    संभावनाओं में नहायी रात कैसी, अहा, भरी भरी!

    एतना नीमन पद्य टांके हैं ओके बाद भी असमंजस का बात करते हैं...घोर अचरज है...:-)

    ReplyDelete
  2. बिलकुल सुनते रहेंगे । 'अबोध तत्व'से अलग ।

    ReplyDelete
  3. मन का भी अगर काम कह कर करने लगो तो यही होता है.... अगर आप को किसी ने पतनशील लिखने का काम दे दिया तो फिर यहाँ भी फुल स्टौप... वैसे कुछ जलने की बू आ रही है...अहा ओहो.....

    ReplyDelete
  4. कररररररकलललववसकररलरलरररररपरहपपरपरहवरपरपवपवमपमवपल लनलल वपप पपप भूरकुसाएगें हाँ हाँ. हाँहाँ....ये लीजिए भानी की टीप

    ReplyDelete
  5. बंता संतासिंह हमें समझ में आते हैं
    क्योंकि हम उनपर मुँह बिचकाते हैं
    पर यह चिरकुटवाली भाषा ऐसी है
    समझ न हम कुछ पाते हैं !
    फिर भी देखो हम अच्छे कितने
    पढ़ते ही हम जाते हैं ।

    बार बार मित्रों से चिरकुट की परिभाषा पूछें
    फिर भी समझ हम ना पाएँ हैं
    क्या यही संकेत नहीं है चिरकुट होने का
    कोई हमें बताए तो ।

    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  6. कान में ठेपी नही डाले हैं और संता बंता को सुनने और हँसने के बावजूद गंभीर बतिया को भी सुन सकते हैं

    ReplyDelete
  7. @घुघूती जी, ऐसे न हमें लजवायें तो?

    ReplyDelete
  8. आपके पोस्ट को पढ़ कर इच्छा बलवती हो रही है कि कुछ चिरकुटई हम भी कर दें ।

    ReplyDelete
  9. लड़ि‍यायी बकरी और लड़ियाये बकरे साहित्य के साथ ब्लॉग को भी चरते जा रहे हैं....आज कोई भी कवि और लेखक बन जाए सहज संभाव्य है...मेरे जैसा उजबक आज हिंदी का कवि है...इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा...

    ReplyDelete
  10. भानी की टीप मस्त है.. प्रमोद जी, आप भी मस्त रहिये.. ज्यादा कंफूजियाईये नहीं.. :)

    ReplyDelete
  11. टाईम निकाल कर आपको पढ़ भी रहे हैं, समझने की कोशिश भी कर ही ले रहे हैं, टिपिया भी रहे हैं. भानी की टिप्पणी पर मुस्करा भी रहे हैं और अब समय से दफ्तर पहुँचने के लिये भाग भी ले रहे हैं.

    ReplyDelete
  12. अह, हम सोचते बैठे रहे कि चिरकुटई पर तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है :)



    जनाब, फोटू मस्त और फोटू मा मूंछे और मस्त है।

    ReplyDelete
  13. अच्छी चिरकुटई थी । कुछ ज्ञान हमें भी दीजिए पिछले जन्म के पंडज्जी !!!

    ReplyDelete
  14. श्रद्धा से मेरा सिर झुक और आंखें मुंद जाती हैं।

    ReplyDelete