बोधिसत्व सीधे नाम लेकर थूकने की जगह मुझे व प्रत्यक्षा को साधु-साध्वी बुलाकर मीठी गाली देकर निकल लिये. पता नहीं मस्ती की लीद किये हैं, या गंभीर चिंतन से पैदा लीद है! साथ ही खोये हुए बच्चे की एक्टिंग भी कर रहे हैं. कहां जाऊं, कहां पहुंचूं, रास्ता दिखा दो टाइप. मुझमें सधुआहट होती तो मैं सचमुच ठोढ़ी पर हाथ रखकर विचारने लगता कि बेचारे बच्चे का कैसे कल्याण किया जाये, कैसा उचित पथ-प्रदर्शन किया जाये एटसेट्रा! प्रत्यक्षा को फ़ोन किया तो पता चला उनके मन में भी कोई कोमल साध्वीभाव नहीं थे. तंज और तल्खी थी. लब-लब हो रहा गुस्सा था. मैंने बोधिसत्व का फ़ोन नंबर देकर कहा इस तरह सुबह खराब करने की जगह एक फ़ोन करके मन की बात कह लो? कोई वजह रही होगी, प्रत्यक्षा हमारे इस साधु राय से आश्वस्त नहीं हुईं, कि ऐसे व्यक्ति से बात करके कोई फ़ायदा होगा. प्रत्यक्षा की चार बातें सुनकर और अपने तीन निजी अनुभवों की याद करके मैंने भी अंतत: यही राय बनायी कि फ़ायदा नहीं है. मेरे जाने की बहुत जगहें (साहित्यिक, असाहित्यिक दोनों ही) नहीं हैं, बोधि की हैं, और बहुत सारी हैं, और जैसाकि प्रत्यक्षा समझ व समझा रही थीं, इसकी संभावना ज़्यादा है कि इन सभी जगहों पर बोधि जायेंगे, उच्च विचारों के सौम्य कीर्तिमान नहीं स्थापित करेंगे, लीद ही करेंगे. और मस्त रहेंगे. मस्त रहने की मेरी बहुत फितरत नहीं, मगर उसके साथ यह छोटा सा फ़ायदा है कि मैं साहित्यकार नहीं, न बन लेने के ऐंड़े बेंड़े अरमान हैं; प्रत्यक्षा ने इस ढलती उम्र में रोते-गाते एक किताब निकलवायी है (प्रकाशक और उसके किसी बूढ़े मालिकान को साध कर निकलवायी है, इसका लगता है, बोधि के पास ज़्यादा आत्मविश्वासी प्रमाण है. इस पूरी प्रकाशकीय दुनिया में पान-सौंफ वाली मोहब्बत जो है बोधि की है, तो इस दुनिया के बारे में बोधि जो भी कहें, उसे अकाट्य व विश्वसनीय समझा जाना चाहिए), बहुत मस्त तो नहीं ही हो पा रही, मगर चिरकुटइयों में लिसड़ाकर दु:खी भी नहीं होना चाहती. मैंने समझाने की कोशिश की हिंदी का साहित्यिक क्षितिज लीद और मस्ती की इन्हीं खूराक़ों से ही रंगीन बना हुआ है, बाकी आज के समय को समझने की जहां तक साहित्यिक खूराक़ का प्रश्न है, हिंदी के पास उसे बताने-दशार्ने का बकरी की लेंड़ी की मात्रा का मसाला भी नहीं. मगर प्रत्यक्षा मेरे इन उन्नत उद्गारों को समझने से रह गयीं. न उनमें मस्ती चढ़ी, न मेरी बातों ने उनकी तक़लीफ़ कम करने का कोई काम किया.
उम्र ने शायद प्रत्यक्षा को कोई समझ दे दी है. नंदिनी को नहीं दी है. वह बोधि के आगे अपने बचपने और नासमझी का डिफेंस रखकर कुछ नेक विचार की समझाइश रख रही थीं. बेचारी भूल रही थी बोधि बचपने और नासमझी से बहुत आगे निकले हुए जीव हैं. किधर जाऊं, कहां पहुंचूं की बोधि भोली गुहार लगाते भले दीखें, हिंदी के बहुत सारे पहुंचे हुए जहां पहुंचने में ज़िन्दगी भर कांखते रहते हैं, और पहुंच नहीं पाते, वहां गांव से आया हूं मगर शहर सेट करना जानता हूं वाले बोधि हंसते-दौड़ते पहुंच जायें ऐसी बात नहीं, वह वहां पहले ही विराजे होते हैं! और लीद तो कर ही रहे होते हैं, मस्त भी रहते हैं (जैसे इन दिनों एकता कपूर के यहां कर रहे हैं, और शास्त्रीयता न सिरज पाने के दुख में नहीं, लोकप्रियता के दंभ में दिपदिपाये ही कर रहे होंगें)!
मेरे सामने एक दिन कहेंगे श्रीलाल शुक्ल ने एक किताब से ज़्यादा अच्छा कुछ लिखा नहीं, उसके ठीक दूसरे दिन श्रीलाल शुक्ल को दांत दिखाते हुए महान भी बता जायेंगे. भौं पर बल तक नहीं आयेगा. वैचारिक कंसिसटेंसी? गयी तेल लेने! साहित्यकारों के बीच ब्लॉगरों को गरियायेंगे, ब्लॉगरों के बीच साहित्यकारों को. एक दिन हिंदी की दुदर्शा का रोना रोयेंगे, यह कहकर कि देखो, उसने हम जैसे उजबक को कवि बना दिया है, हमारे जैसा विश्वविद्यालय के कोर्स में चढ़ा हुआ है, तो दूसरे दिन विनम्रता को दरी के नीचे दाब, चप्पल मारने को उद्यत भी होने लगेंगे! भगवान के लिए, इसमें किसी तरह का विरोधाभास न देखें. क्योंकि हिंदी संसार ऐसे ही लीदों और मस्तियों से अपनी वर्तमान उन्नतावस्था को पहुंचा हुआ है! उसका समस्त बोध और सत्व इसी महत्तम स्तर का है! हेंहें, ठेंठें कहते हुए कहीं भी किसी को भी कुछ भी कह दो, दूसरी जगह पहुंचकर देखो स्वार्थ साधने के लिए ठीक उत्तर से दक्षिणायन होना है, तो पलटकर वह भी हो लो, बस इसका ध्यान रहे कि लोग हंसते रहें, और अपनी झोली में उचित मात्रा में प्रसाद चढ़ता रहे- सामाजिकता का, अर्थ का- कहीं कसर न रहने पाये!
प्रत्यक्षा को तक़लीफ़ हुई इसका मुझे दुख है. अपने लिए नहीं है. क्योंकि बोधि को, और उनके उस समूचे साहित्य को मैंने कभी गंभीरता से नहीं लिया, और हमेशा इसे पीठ पीछे नहीं, बोधि के मुंह पर बताते हुए किया, और दूसरों के आगे मुझे मालूम नहीं बोधि क्या लीद करते रहे होंगे, मेरे आगे कभी मेरे सवालों का समुचित जवाब दिये हों, ऐसा आज तक नहीं हुआ है; हां, दांत चियारते और मस्ती ठेलते ज़रूर दिखे हैं- उसका अलबत्ता मुझे हमेशा दुख रहा है. मगर वह बोधि के प्रति निजी नहीं, हिंदी की दुर्दशा के प्रति रहा है.
नहीं, मैं दुखी नहीं हूं. मगर बोधि को लग रहा है मस्त हूं तो वह भी गलत लग रहा है.
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सही बात है... हमारी नादानी और नासमझी ही है... लेकिन अभी नया ज्ञानोदय में यह छप जाए... कि बोधि कवि नहीं सच में उजबक ही हैं.. तो ये सारी विनम्रता फा फूं फा फूं फैजाबाद... आं ऊं आं ऊं अलहाबाद हो जाएगी... चिंचियाने लगेंगे कि हमें कौन साहित्य से बाहर कर सकता है... हमको तो नामवर जी साटीफिकिट दिए हैं... बोधि अपने कविता संग्रहों को कौड़ा बनाकर ताप क्यों नहीं लेते... यही बात कहनी है... तब बाबा तुलसी बिसरा जाएंगे... अरे गीतकार समीर की तरह सनम सनम लिखिए... माल भकोसिए और सुत जाइए... काहें सूखी लीद को लोबान समझ धुआं फैला रहे हैं महाकवि...
ये कहा पतनशील साहित्य जैसी शानदार पगडंडी को छोडकर पडे लिखो की चिरकुटी बहस मे पड रहे है जहा टाग खिचाई महोत्सव चलते ही रहते है :)
हमने बोधिसत्व और प्रत्यक्षा दोनों के लिखे पर टीप दी थी .
पहली बात तो यह कि हम चिट्ठाकारों को सिर्फ़ चिट्ठाकार मानते हैं और उनमें विभाजन-वर्गीकरण नहीं करते . दूसरा यह कि कहीं न कहीं यह भी मानते रहे हैं कि साहित्य/साहित्यकार और आम पाठक के बीच एक दूरी आ गई है,जिस पर बात होनी चाहिए . पर इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि साहित्यकार लोकप्रिय होने के लिए छिछला लिखने लगे .
कुछ साहित्यकारों-पत्रकारों के इधर -- इस ब्लॉग के लोकतंत्र में -- आने के बावजूद यह अलग विधा है . इसके अलग लिक्खाड़ हैं, सरल लिक्खाड़ हैं,वर्तनी-लिंग का कोई नियम न मानने वाले लिक्खाड़ हैं और कठोर साहित्यिक मापदंड से किंचित औसत लिक्खाड़ भी हो सकते हैं,पर उनकी कैप्टिव रीडरशिप -- उनकी फ़ैन फ़ॉलोविंग -- है इससे इन्कार नहीं किया जा सकता . भले ही वह लिंकिंग-सौजन्य के तहत क्यों न हो (बकलम ज्ञानजी) .
रही बात प्रत्यक्षा से पूरी तरह सहमत होने की तो वहां असहमति की कोई गुंजाइश ही नहीं दिख रही थी,वरना अपन तो तैयार बैठे रहते हैं असहमत होने के लिए .
'अनेक नावों में अनेक बार' धर्मी अनूप सुकुल हमें अपने जैसा मुहंदेखी कहने वाला मानकर 'मौज' की अवस्था में हैं . पर हम वैसा हो सकूंगा इसमें बहुतै डाउट है .बाबू मोशाय! ओइ रकम 'जोग्गता' कोथाय पाबो ?
हम वहीं हूं जहां था . उत्तरायण से दक्षिणायन कतई नहीं होऊंगा . शांत हूजिए प्रभु!
काहे टेंशनियाते हैं . आप एकै पीस हैं . यहां भी और वहां भी . ब्लॉग में भी अउर ससुरे साहित्त-वाहित्त में भी . मिसिर जी से दुखी न हूजिए और सुकुल जी से थोड़ी मौज उधार लीजिए .
अजदक पिटों को गुस्सा क्यों आता है.
शांत कलमधारी भीम शांत.
कलाकंद वाली पोस्ट भूले नहीं है अभी तक आपकी.
जहां तक मुझे याद है उन्होंने किसी का नाम लेकर कुछ नहीं कहा था.. मगर फिर भी आप उबाल खा रहे हैं.. कहीं ऐसा तो नहीं की चोर की दाढ़ी में तिनका..
पेट साफ़ रखने के पक्ष में कुछ स्ट्रेट सुझाव..
ना पढ़ा हो तो पढ़ लें.
@सुदीप सुजान जी,
और जहाँ तक मुझे याद है कि बिना नाम लिये भी प्रत्यक्षा के पोस्ट की लाईनों को रेफर करके एक एक बात कही गई। कविवर न सिर्फ असंयत घटिया भाषा का प्रयोग कर रहे हैं बलिक जेनरल की आड़ में स्पेसिफिक अटैक करने का खेल भी रच रहे हैं। यहाँ बालकों की भीड़ नहीं जुटी है सुदीप साहब कि किसी को कुछ समझ न आये।
एक साहित्येतर स्त्री
Nandini's language is quite masculine one .
अहा, आहो.. वाह वाह, वाहो..
क्या बात है.. अनाम महिला.. कम से कम अपने को सामने लाने कि हिम्मत तो होनी ही चाहिये.. वैसे मैं ब्लौग कि दुनिया में नया हूं और लोगों को बस ब्लौगवाणी और चिट्ठाजगत के द्वारा जानता हूं.. सो अगर कोई पुरानी तकरार चल रही हो तो बता दें मैं क्षमा मांगकर यहां से भाग जाऊंगा..
हा हा हा(इसे अट्टहास या जो कुछ भी समझे)..
@ haulat
....and quite masculine attitude, too. isn't?
never expect musu-musu type of feminism from me.
ऐसे मौके पर आपने धैर्य का परिचय दिया है, भाषा भी संतुलित है, यहां बोधी जी ने अपना परिचय देने में जल्दी कर दी है क्यौकि शुरूआत बोधि ने की है,पर भाषा में आपके सामने बोधि मार खाते लग रहे हैं....लगता नहीं कि बोधि कवि भी है? अब साथी ने आलू चना बेचना शुरू कर दिया है...ऐसा लिख कर अपना बाज़ार तलाश रहे हैं और आप लोग जवाब पे जवाब लिखे जा रहे हैं देखिये ना कवि की कविता पर इतनी चर्चा हो रही होती तो तो हिन्दी के पठको को वाकई अच्छा लगता ......मेरा मन इन्ही सब बातों से थोड़ा खिन्न है सो मैने ऐसे अवसर पर अपनी ठुमरी पर कुछ विशेष विशेष चढ़्या है ज़रा सुन लीजियेगा भाई लोग ......