Saturday, May 24, 2008

मुंह सिये न चुप रह पाने की अव्‍यहार-कुशलता के बारे में..

ब्‍लॉग में कहीं किसी पर कीचड़ उछल-उछाला जा रहा हो, ब्‍लॉगजगत में एकदम-से ऊर्जा का संचार हो जाता है. ऊंघते लोग चौंकन्‍ना होकर जाग जाते हैं. किस पर क्‍या पोस्‍ट लिखें का पसीना रीसा रहे लोगों के पैरों के नीचे सक्रियता की सीढ़ी खुल जाती है. बहुत सारे लोग तो पोस्‍ट लिखते ही इसलिए हैं कि सामान्‍य रूप से सामान्‍य कीचड़ उछाल रहे हैं की सक्रियता में देखे जायें.. जिसको पता नहीं फिर किस-किस से जोड़कर देखते हुए मेरे जैसा- महाद्वीप के दुख में दुखी- व्‍यक्ति असामान्‍य आचरण करने लगे तो ठंडी आह भरकर मुझे नंगई के सरदार के पद से विभूषित करने की लस्‍सी भी पी सकें.

ख़ैर, पता चला महाद्वीप के दुख में दुखी होना दुर्गुण है, पर दुख कातर होना बुढ़ौती के लक्षण हैं. सामान्‍य रूप से सामान्‍य कीचड़ उछालते रहना सहज हास्‍यप्रियता है. ब्‍लॉगीय सामाजिकता है. अभय ने जानकारी बढ़ायी व्‍यवहार-कुशलता है. मित्रता के बारे में भी अभय से कुछ ज्ञान प्राप्‍त हुआ. कि बलार्ड पियर से चार किलो का किताब ढोकर उनके घर पहुंचाना मित्रता की, उनके स्‍नेह के अधिकारी होने का विशिष्‍ट लक्षण समझा जाना चाहिये. जबकि हम समझते थे मित्रता में आप किसी के लिए क्‍या छोड़ते हैं, क्‍या दावं पर लगाते हैं ज़्यादा महत्‍वपूर्ण है, तो दीख रहा है, गलत थे, मित्र से आप क्‍या पाते हैं की व्‍यवहार-कुशलता मित्रता को ज़्यादा ऊंचा प्रमाणपत्र दिलवाती है!

आपकी सामान्‍य, असामान्‍य, प्रत्‍यक्ष, अप्रत्‍यक्ष किसी बात से किसी को तक़लीफ़ पहुंचे, इसमें लड़ि‍याने की बात नहीं. अकारण पहुंच रही हो तब तो एकदम ही नहीं. अर्थ का अनर्थ करके, किसी के लिए भी रोने लगना, धीरज खो देने की अव्‍यवहार-कुशलता करने लगना प्रगतिशील-पतनशील किसी भी नज़र से टुच्‍ची बात ही है, लेकिन, जैसाकि अभय ने अपने मित्र के संदर्भ में कहा, मैं अपने रेफरेंस में भी रिपीट कर ले रहा हूं- कि अपने राम भी मर्यादा पुरुषोत्‍तम हैं ऐसा हमने कब कह दिया?

मगर क़ायदे से कहूं तो इस समूचे टिल्‍ली प्रसंग में मुझे सबसे ज़्यादा गुस्‍सा प्रत्‍यक्षा पर आ रहा है. इसलिए नहीं कि मेरे घर की स्‍त्री नहीं तो मुझे मुंह खोलने की क्‍या फालतू की गरज पड़ी थी. इसलिए कि पिछले दिनों भारतीय प्रदेशों पर अर्मत्‍य सेन और जां ड्रेज़ का विकास सम्‍बन्‍धी एक सर्वे पढ़ रहा था- और सर्वे के एक निबंध में उत्‍तर प्रदेश, और सामान्‍य तौर पर समूचे हिंदी प्रदेशों की भयावह दुर्दशा के पीछे स्त्रियों की अशिक्षा और घर से बाहर के सामाजिक सवालों में उनका हस्‍तक्षेप न करना उसकी मुख्‍य वजह बताया गया था. प्रत्‍यक्षा शिक्षित हैं, मगर पर दुख कातर हस्‍तक्षेप में मुंह काला करने आगे हम गए. क्‍यों गए? इसलिए नहीं गुस्‍सा हो रहे कि प्रत्‍यक्षा ने हमसे अपना झंडा उठाने का आग्रह किया, इसलिए कि सुबह-सुबह एक बेमतलब के पोस्‍ट पर ध्‍यान खिंचवाकर उसकी गंदगी दिखाने लगीं, और मैं पर गंदगी कातर, असामान्‍य आचरण करने लगा! गंद और गंदगी की जगह कहीं चार पैसा और चार दिल जोड़ने की व्‍यवहार-कुशलता में गया होता?

यह बात मुझे सचमुच लगती है कि औरतों का हित इसी में है कि वही बोलें. वह जितना अच्‍छा और आर्टिकुलेट बोल सकेंगी, उतना उनके समाज में आत्‍मसम्‍मान व तरक़्क़ी की गुंजाइश बनेगी. जितना कातर व इंट्रोवर्ट बनी रहेंगी, उतना ही वे हेंहें, ठेंठे वाली मूढ़ लंठई के उपहास व तिरस्‍कार का विषय बनी रहेंगी.

एक दूसरे जिस सत्‍य का यूं ही चलते-चलते साक्षात हो गया वह यह कि आप भारतीय समाज में किसी गुट के स्‍नेह से समृद्ध नहीं हैं, आगे-पीछे सत्रह लोगों को सेटियाये नहीं चल रहे हैं, तो वह ब्‍लॉगिंग हो, या ब्‍लॉग के बाहर का समाज, आपका उस समाज में होना, बने रहना, बात करना, मुंह खोलने की हिमाक़त करना सब अक्षम्‍य अपराध है. क्‍योंकि व्‍यवहार-कुशलता के पाठों में दीक्षित, यहां लोग आपकी आवाज़ में आवाज़ मिलाने आगे नहीं आते. वह व्‍यवहार-कुशल बने रहकर, गोदी में हाथ धरे, चुप्‍पे-चुप्‍पे मुस्‍कराते रहते हैं, कि गुरु, अब देखें, बुढ़वा कैसे लंगी खाता है! वह सारा हाथ-पैर पटकना व्‍यक्ति को अपने अकेले अंधेरे में करना पड़ता है. व्‍यक्ति वह चुप रहकर ख़ामोशी से जीता है, या नंगई का सरदार होकर फैलने लगता है, चुनाव भले उसका हो, है वह हास्‍यास्‍पद ही.

16 comments:

  1. मेरी ताज़ा पोस्ट पढ़ लें .... सब वहीं कह दिया है ... बाकी ऐसे ही अवव्यहारकुशल बने रहें ... इस माईनॉरिटी ज़मात को बढ़ाने हम भी आते हैं ...

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  3. @रचना,

    मैं अंसवेदनशील होने की माफ़ी चाहता हूं, मगर कम से कम ( अनिल ने कुछ तो लिखा है. वैसे आप गुस्‍सा ज़ाहिर कर रही हैं, उचित ही कर रही हैं.

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  4. ये बुढ्वा कौन है जरा इस बारे मे ज्ञान वर्धन करे, बाकी काहे इत्ता जोश खाते है,ये कीचड और टांग खिचाई हमारा राष्ट्र धर्म है , अगर आप नही निभा सकते तो जो निभा रहे है उन्हे काहे रोकते है जी,कुये मे पडे लोग निकलने के बजाये कोई दूसरा ना निकल जाये पर ही ध्यान लगाते है ,:)

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  6. आप लोग बुद्धिजीवी लेखक हैं, कीचड़ भी कुछ सोच कर उड़ा रहे होंगे। कुछ अलग कहना चाहता हूँ, फसादिया पृष्ठभूमि ने नावाकफियत लगे तो क्षमा कीजीयेगा।

    किसी कवियित्री की टिप्पणी इसी मामले में पढ़ी, अपन ने तो खैर उनका नाम भी पहले कभी न सुना था। बोलीं कि ब्लॉग को गंभीरता से लेना ही नादानी है। साहित्य एंड ब्लॉग्स आर डिफरेंट यू नो! उनकी टीप पढ़कर ब्लॉगरों और कलमनवीसों का भेद तो समझ आ गया। ब्लॉगरों में स्पेस की लड़ाई पहले तो कभी नहीं थी, उन्होने कारवां में बढ़ते गर्दो गुबार पर खुशी जाहिर की और ब्लॉगिंग के इतिहास में जोड़ कर देखा। पर कथित साहित्यकार और पत्रकार टाँग खिंचाईं के खेला खींच कर यहाँ लाये यह कहने में मुझे गुरेज नहीं। उन्हीं कवियित्री को एक बात ज़रूर कहना चाहुंगा जिन्होंने ब्लॉग धारा से अभी अंजुली भर पानी ही ले मुंह पर छपका है, कि ब्लॉग और जालघर ही अब चलेंगें, छापा युग के दिन गये मदाम, कुछ सालों में तो छपाई जिल्दकारी भी इतिहास की बातें हो जायेंगी, किन्डल और मोबाईल पर किताबें पढ़ेंगे, वायेस पोर्टल और कम्यूनिकेशन डिवाईसेज़ पर खबरें चलेंगी। आप हैं किस खामख्याली में? मैं आपका आग्रह समझ सकता हूं, जब रचना औसत या घटिया कहाई जायेगी तो आप कहेंगी, नहीं जी ये तो "हल्की फुल्की" रचना थी, रचना क्या ये तो ऐवें ही लिख दी थी, ब्लॉग के लिये थी और फिर केवल अपनी अल्मारी में पड़े काव्य संग्रह के पीले पन्नों का कचरा अपने ब्लॉग पर "मिडनाईट का तेल" जलाकर उतारेंगीं।

    ये मीडियम का रोना छोड़िये मेमसाब, प्रेमचंद का साहित्य छापे में हो, विकी पर, ब्लॉग पर, मोबइल या किन्डल पर, जब भी,जहाँ भी पढ़ा जायेगा, लोग तारीफ ही करेंगे। हिकारत की नजर अपने साहित्कार दोस्तों के लिये बचा छोड़िये और कोसिये, जलिये, भुनिये जैसे यहाँ लोग कर रहे हैं।

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  7. @रचना,

    आपका दुख और क्षोभ समझ आता है, लेकिन हमारी संवेदना इस और उस घर के अंतरंग में जीती हुई मर रही आरुशियों को कैसे-किस तरह बचायेगी, इसका आपके पास कोई ठोस कार्यक्रम हो तो बतायें, मैं देखूं- साहित्‍यकार बने या बिना बने- मैं उसमें किसी योगदान के काबिल हूं या नहीं? ख़बरिया चैनलों की तो छो‍ड़ि‍ये, वे मनोरंजन का चैनल हैं, पता नहीं लोगों के जीवन में घुस-घुसकर गंद दिखाने व गंद के नये मुहावरे बुनने में उनका कहां अंत होगा, लेकिन सुन रहा हूं नोयडा में लोग भाग-भागकर वह घर और उस छत की झांकी लेने के लिए पहुंच रहे हैं जहां यह हत्‍यायें हुईं, अपने शहर के लोगों की इस दुर्गंधयुक्‍त बीमारी का आप क्‍या इलाज सजेस्‍ट कराती हैं? आज जो बच्‍चे मॅकडॉनल्‍ड में चहकते, और अपने इम्मिडियेट परिवेश से बाहर किसी भी संसार से पूरी तरह असंवेदनशील बने रहने की शिक्षा पा रहे हैं, कल को इस शिक्षा के साथ समाज में बड़े होंगे- पता नहीं साहित्‍यकार बनेंगे या नहीं, इंसान किस तरह के बनेंगे.. और जिस भी तरह के बनेंगे, उनकी ऐसी शिक्षा में सुधार का कोई आपके पास कार्यक्रम हो तो बताइये, उसमें मैं भी कुछ ऊर्जा झोंकूं? या आप चाहती हैं अनिल से अलग मैं भी किसी थियरी की रचना में पड़ूं? मगर उससे अरुशि का जीवन वापस आ जायेगा? हो सकता है जिस बाप पर मीडिया थू-थू का ऐसा विकराल व्‍यूह रचे है, वह सचमुच निर्दोष साबित हुआ तो? उसकी गरिमा वापस आ जायेगी? अंदर उतरियेगा तो बीस उलझे सवालों से साबका पड़ेगा, संवेदना सबका जवाब दे पायेगी?

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  8. chuppi diplomacy na samajhi jaye isi liye bol rahi hun....

    aap behad samvedansheel, srujansheel aur sach me shabdon ke dhani hain....aur main samajhti hun ki aap ne baat mudhe mei rah kar bina keechad uchaale paripakv tareeke se rakhi thi....

    galath tareekei se jab baat rakhi jaati hai tho kharaab lage tho bhi usei aur tawajjo dena kabhi pasand nahi kiya....abhi bhi nahi....

    bahas mudhe par rah kar honi chaahiye....

    par jaisa pahle bhi kai baar kah chuki hun aap pasandeeda bloggers me se hain.....jinka andaaz na sirf juda hai...balki poori imaandaari se bina taras khaaye apna ek perspective banaata hai...

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  9. समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या कहूं। हमेशा की तरह इस विवाद की सभी कड़ियों से अनभिज्ञ हूं। कुछ तक पहुंचा हूं और कुछ तक नहीं।
    बाकी देबाशीष जी की बात में दम तो है.

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  10. देबाशीष जी
    बहुत दूर तक देख लेते हैं आप तो.... वाह,क्‍या बात कही है.... ओह, जावा का चस्‍मा लगाए हैं आप तो... बहुत विशाल हो चुका है इंटरनेट... पाचं साल पहले से तुलना करें तो... बताएं जरा, कितना प्रिंट खा गया महाराज... इस पर बहुत बहस हो चुकी है... ब्‍लॉग पर लिखी चीज इतनी ही महान हो तो अगला नोबेल आपको दिलवाएं... या कहिए तो बोधीसत्‍व की ब्‍लाग रचना को... के मोहल्‍ला वालों को ... के भडास वालों को... हम तो लाइन में नहीं है...
    पचीस पचास साल बाद क्‍या होगा उससे पहले आज की देख लीजिए... आलमारी में रखी कविता की एक किताब अभी भी ब्‍लॉग पर दस गुना भारी है... और एक चीज बता दें... प्रिंट का महत्‍व हमेशा है... रहेगा... ब्‍लॉग अभिव्‍यक्ति का अलग माध्‍यम है... जो अपना अलग सिन्‍टैक्‍स बना रहा है... उसको साहित्‍य से कंपेयर नहीं ही कीजिए... अगली दुनिया का कोई जेम्‍स ज्‍वायस ऑनलाइन उपन्‍यास नहीं लिखेगा... लिखेगा, तो किताब की जिल्‍द में ही छपवाएगा... लडाई मीडियम की नहीं... ये सारे मीडियम को- एक्स्जिस्‍टेंस में आ जाएंगे... और ब्‍लॉग का क्‍या है... सैटिंग्‍स में जाकर एक बार डिलीट दबाएंगे... तो पांच साल का लिखा छू हो जाएगा... कौनो लिंकौ काम नहीं आएगा... बूझ रहे हैं ना... जावा का चस्‍मा उतरेगा तभी समझ में आएगा...

    वैसे हमारे कहने का मतलब तो आप तब भी नहीं समझे थे... अलगै दिशा में ले गए... ई बात को भी नहीं समझ पाएंगे... कमजोर रचना चाहे ब्‍लॉग हो या किताब कहीं नहीं टिक पाएगी...

    और प्रमोद जी, कमेंट माडरेशन लगा रखे हैं आप... पर इस टिप्‍पणी को जरूर छापिएगा... गुल मत कीजिएगा... हमारे पास अभी कोई नाम है ही नहीं ... तो देबीशीष जी सुने कैसे होंगे... पर कम से कम अब याद तो रखेंगे...

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  11. @भैया नंदिनी और बाबू देबू दा,

    यह अच्‍छी बात है? कहां की बात हो रही है और आप कहां की लेके उड़ लिये? हॉकी के खेल में टेबल टेनिस का बॉल लाकर ठेल देते हैं?

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  12. prbhudev aapne bahut shado ke khel khel liye ,maine doosre gyani bandhu se bhi kaha hai ki ab kuch rachnaatmak kam ho jaye.
    aor RACHNA JI
    aisa lagta aap bhi media ki tarah bas koi na koi mudda sunghti rahti hai ki kahi se koi nari utpeedan ki khabar mil jaye aor aap ana jhnda lekar nikal jaye.aap ne kaun sa teer mar liya aarushi ko lekar?do char kavita likh dali?ya do char lekh chap diye?to rajishthan hinsa par aap kuch nahi likhegi?kyunki isme koi nari mamla nahi hai ?pramod ji is comment ko umeed karta hun aap moderate nahi karenge aor jyo ka tyu chapenge.
    bahut hua ab ub hone lagi hai.

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  13. @बंधुवर तीखी बात,

    अच्‍छा होता आपने पीछे अपना ई-मेल या ब्‍लॉग तक पहुंचने का सहज रास्‍ता छोड़ा होता. हमारी सलाहीयत ठीक है मगर रचना को आपका धोना हमें ज़रा नागवार गुजर रहा है. रचना के इस मुंहफटपने से मैं थोड़ा पहले से परिचित हूं, और मुझे उसमें रचना की तक़लीफ़ व झुंझलाहट दिखती है, अच्‍छा लगता है इस तरह किसी को व्‍यग्र देखना. फिर भई,
    आदमी रोज़-बरोज़ जिन चीज़ों से गुजरेगा आखिर उसी की तो बात करेगा?

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  15. अब क््या बोलें.....हरेक महीना एक नया विवाद....प्रत्यक्षा जी फिर से विवाद में....साहित््यकार जो हो गयी हैं...:D मूल््य तो चुकाना पड़ेगा...

    मुझे यह समझ नहीं अाता कि लोगों को दूसरे से वो भी एक अनजान नॉन-सेलिब््रिटी से इतनी खुजली क््यूँ होती है....कुछ लोग होते हैं जो सिर््फ मौज़ लेते हैं, सामझ अाता है.......पर कुछ लोगो को दूसरों की टी॰ वी॰ से लेकर बाथरूम के रंगरोगन से परेशानी होती है.....

    अब मान भी लें कि किसी ने धोखाधड़ी से तरक््की पायी या साध के किताब छपवायी....यार ये कोई अनूठा कार््य तो है नहीं कि मन को विचलित कर जाये अौर मनों लीटर अाँसू ब्लॉगजगत में बहा दिया जाये...

    यार ब्लॉगर लोग हैं अापलोग....क्यों साहित््यकारों सा अाचरण करते हैं... लिखने को बहुत कुछ है.... अच््छा लिखें ताकि हम अच््छा पढ़ सकें....

    -विस्मृत

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  16. भाई प्रमोद जी,
    सोचा आपका ध्यान बंटाया जाए। जिस ठोंगे में आज जीरा लाया था, उसी पर यह फोटो और खबर छपी थी। ठोंगे का पुराना पढ़वैया होने के नाते वही किया जो कर सकता था। आप भी पढ़िये और जी चाहे तो पोस्टाकार छाप दीजिए।
    अनिल यादव, लखनऊ। ई-मेल का पता फर्जी नहीं है, तस्दीक किया जाता है।

    सारनाथ की गाजरवाली

    उस दिन, उस छोटी सी खबर और उससे भी ज्यादा साथ छपी फोटू ने गुदगुदाया। सारनाथ गई एक घुमक्क़ड़ विदेशी युवती ने सड़क की पटरी पर बैठी बुढ़िया से दो रूपए का गाजर खरीदा और स्कूली लड़कों जैसे खिलवाड़ भाव से बिना पैसा दिए जाने लगी। हो सकता है कि युवती को उसमें अपने बचपन की कोई रिगौनी आंटी नजर आ गई हो। लेकिन उस देहातिन को जैसे आग लग गई और वह दौड़कर उस युवती से जूझ गई। युवती को वाकई मजा आ गया, शायद एक गंवई हिन्दुस्तानिन से पहली बार अनायास वास्तविक संवाद स्थापित हो गया था। पुलिस के सिपाहियों और देसी लहकटों को वह रोज झेलती होगी लेकिन उसे बर्दाश्त नहीं था कि कोई ललमुंही विदेशिन उसे उल्लू बनाकर दांताखिलखिल करती हुई चली जाए।इसी बीच गाजर भारत-यूरोप के बीच पुल बन चुका था।फोटू में खड़े युवती के साथी का चेहरा कुछ ऐसा प्रफुल्ल था, जैसे सारनाथ के परदे पर कोई ओरियंटल फिल्म देख रहा हो। उसके आराम से खड़े होने के पीछे का आत्मविश्वास रहा होगा कि वह बुढिया, बैलेंस डाइट पर पली, दिन भर उसके साथ पैदल भारत नापने वाली उसकी छरहरी साथिन का क्या बिगाड़ पाएगी? बाई द वे यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि इस युगल को यह घटना जिंदगी भर याद रहेगी। इसमें हाऊ डू यू फील अबाउट बेनारस जैसी रस्मी बोरियत नहीं थी। तंत्र, मंत्र, योगा और होली गंगा का फंदा नहीं था। इसमें खांटी भारतपन था जिसे वे अपने देश जाकर लोगों को बताएंगे।तो अखबार में छपी फोटू में परमआधुनिक यूरोप के साथ एक भारतीय देहातिन भिड़ी हुई थी।कल्पना में न समाने वाला यह पैराडाक्स लोगों को गुदगुदा रहा था। लेकिन गाजर वाली के लिए यह झूमाझटकी कोई खिलवाड़ नहीं थी। ललमुंही विदेशिन के लिए दो रूपए का मतलब कुछ सेंट या पेंस होगा लेकिन गाजरवाली के लिए इसका मतलब है। कुप्पी में डाले गए दो रूपए के तेल से कई रात घर में रोशनी रहती है।दस-बीस के सिक्के चलन से बाहर हो गए हैं फिर भी गाजर का कुछ सेंटीमीटर का पुल पारकर आप उन लोगों की अर्थव्यवस्था में झांक सकते हैं जो हमारे बहुत करीब रहते हुए भी आमतौर पर हमें नजर नहीं आते। मिर्जापुर, सोनभद्र से लाकर महुए के पत्तों के बंडल पान की दुकानों पर बेचने वाले मुसहरों को पत्ता पीछे एक पैसे की आमदनी होती है। रेलवे स्टेशन पर नीम की दातुन बेचने वालों को एक छरका एक रूपए में पड़ता है और वे एक चार टुकड़े कर के आठ-आठ आने में बेचते हैं। चने का होरहा या मौसमी तरकारियां बेचने वालों को देर रात तक सड़कों पर ऐसे ग्राहकों का इंतजार रहता है जो दो रूपया कम ही देकर उनकी परात या खंचिया खाली कर दें। लोग चिप्स का पैकेट बिना दाम पूछे खरीद लेते हैं लेकिन उनसे इस अंदाज में मोल भाव करते हैं जैसे वे उन्हें ठगने के लिए ही आधीरात को सड़क पर घात लगाकर बैठे हों।चूरन, चनामुरमुरा, गुब्बारे, फिरकी और प्लािस्टक के फूल बेचने वाले दस बीस रूपए की आमदनी के लिए सारा दिन गलियों में पैदल चलते रहते हैं। बनारस में अब भी पियरवा मिट्टी के ढेले बिकते हैं, जिन्हें शहनाज हुसैन सबसे बेहतरीन हेयर कंडीशनर बताती हैं। इन्हें बेचने-खरीदने वाले दोनों के लिए दो रूपया रकम है।अभी मार्च के आखिरी हफ्ते में आयकर-रिटर्न भरने में सारा देश पसीना-पसीना हो रहा था। तरह-तरह के खानों वाले ठस सरकारी कागजों का अंबार था और कर विशेषग्यों की चौर्य-कला से विकसित देसी तिकड़में थी। जो चख-चख थी उसका सार यह था कि सरकार बड़ा अत्याचार कर रही है, यदि कोई ईमानदारी से इनकम-टैक्स भर तो भूखों मरेगा और उसके बच्चे भीख मांगेगे। लिहाजा बीमा के प्रीमियम, धर्माथ चंदे और मकान किराए की फर्जी रसीदों, एनएससी वगैरा के जुगाड़ं फिट किए गए ताकि अपना पैसा अपने पास रहे। .यहां कुछ हजार का सवाल था और सारनाथ की गाजरवाली के सामने अदद दो रुपयों का। क्या अब भी ललमुंही विदेशिन से गुत्थमगुत्था बुढ़िया पर अब भी हंसा जा सकता है। अगर आयकर विभाग को झांसा देकर कुछ हजार बचा लेने वाले बाबुओं और सड़क किनारे बैठी बुढ़िया के बीच खरीद-बेच के अलावा कोई और रिश्ता बचा हुआ है तो नहीं हंसा जाएगा।वाकई, क्या ऐसा कोई रिश्ता है?

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