Monday, May 26, 2008

पता नहीं कैसी तो पुरानी..


पिछले दिनों एक लिखाई कर रहा था, लिखाई फुर्र हुई, बन चिड़ि‍या जाने दूर कौन पेड़े लुकाय गयी. पिछले दिनों तय किया था नेट पर कुछ भारतीय कृषि की गोड़ाई करेंगे, इंडस्‍ट्री की हौंड़ाई करेंगे, मगर तय करने और मन की बहकने के बड़े छत्‍तीस के आंकड़े हैं, मन बहका और हम धुआं उड़ाते, आग नहाते किसी और रेल पर निकल लिये. सुनते हैं अट्ठारहवीं सदी में मुग़लों की मटियामेटी के बाद मुल्‍क ऐसी ही आग में बजबजाया हुआ था. टुकड़ि‍यां थीं, लूट औ’ क़त्‍लोगारत के गिरोह थे, अफग़ानी थे सिख थे कभी मरहट्ठे थे. भागते घोड़ों की धूल की गर्द छंटती तो उठती आग के बगूले दीखते, काठ का दरकना और फूस का चिटचिटाना सुनता, आहों की सिसकियां और तबाहियों की बेमतलब तौल दीखती. रेल की खिड़की अलसायी उनींदे में उठंगा मैं मां को बाहर की झांकी दिखाना चाहता था, थोड़ा अपने लिए थोड़ा अपने से बाहर इतिहास सजाना चाहता था. मां ने मुंह फेरकर अपनी चुप्‍पी में इत्‍ति‍ला की कुछ नया नहीं कर रहा, बाहर का जो दिखाना चाहता हूं, अंदर वह उम्रभर जीती रही है, इतिहास भले नहीं जानती मगर सारा जीवन और क्‍या किया, इन्‍हीं चिंदी-चिंदी चिथड़ों को सीती रही है. मैं इस तरह सन्‍न होना नहीं, निर्लिप्‍त की आश्‍वस्ति चाहता था, ज़रा सी बहकन में रेल चढ़ा था, रेल को अपने जीवन पर चढ़ाना नहीं चाहता था! मां सिर हिलाती रही, नम आंखें नीची किये चुप्‍पे मुस्‍कराती रही, समय-समाज रेल से बाहर कहां था, रेल मुझी में गुजर रहा था.

7 comments:

  1. अब ठीक है,यही चिपके रहो, रेल को डिरेल मर होने दो , आप साहित्यकार नही हो, पतन शील के प्रणेता हॊ, ध्यान रखो इसलिये ना चिरकुट साहित्यकारो जैसी ना टुच्ची बाते करो ना इनमे फ़सॊ,आप पतनशील लिखो हम उसको समझने के लिये शब्द संचायिका लिख मारेगे , दोनो इकट्ठे छपवायेगे किसी को पटाकर :)

    ReplyDelete
  2. राहत की बात,,,,,,,पिफर से अज़दक को पढ़ रहे हैं।

    ReplyDelete
  3. @शायदा, बस आप बिफर के मत पढ़ि‍येगा. वैसे सुधर के हम भी बीच-बीच में कहां-कहां जाके क्‍या-क्‍या तो पढ़ आते हैं, फिर हम भी बिफरने ही तो लगते हैं! शायद आपसे पिफर के पढ़ना सीखना पड़े..

    ReplyDelete
  4. जी, बिल्‍कुल दम साधे पढ़ रहे हैं, क़सम खा रखी है इधर-उधर देखकर भी कुछ न कहेंगे। पतित-पावन सब के लिए लिखें आप तो, और हां कुछ समय तक पिफर ही पढ़ना होगा, कहीं कीबोर्ड में प्रॉब्‍लम है।

    ReplyDelete
  5. सही है.
    शायद कई दिनों बाद अज़दक को पढ़ा है.
    यही है राइट च्वाइश सरजी.
    पढ़ कर आनंद आया.
    शायद कुछ आंसू भी.

    ReplyDelete
  6. शायद कई गल्पों से कई गुना बेहतर ! सीन कट न हुआ होता तो ...?

    ReplyDelete
  7. रेल को गुज़रने दीजिए और पुलों को भी थरथराने दीजिए....

    निर्लिप्‍त की आश्‍वस्ति या निर्लिप्त सी आश्वस्ति !!!

    ReplyDelete