एक प्रगतिशील गुज़ारिश..
साढ़े सत्ताईस की संख्या वाले हमारे छुटंकी हिंदी ब्लॉगजगत (ओह, कैसा तो विकराल! गुस्से में लाल?.. चिट्ठाजगत भले रोज़ हमारे, तुम्हारे और कितने सारे बंधु-बानरों के मेल बॉक्स में छै और नये ब्लॉगों की रजिस्ट्री की डाक भेजती रहे, उन धूप के भटकौओं को स्नेह की छतरी कौन पहुंचाने जाता है? पहनाने? कुल साढ़े सत्ताईसे हैं जो धूम मचा ले, धूम वाली रसबहार, दे दनादन्न वाला तरवाली संहार घुमा रहे हैं!) में इन दिनों फिर ज़रा बहस का बाज़ार गर्म है. हालांकि सुन रहे हैं बंबई से बाहर दूसरे शहरों में बरसात हुई है, लेकिन उससे चढ़ी गरमी पर असर नहीं पड़ा है.. कप-प्लेट टूट रहे हैं, लोगों के होश सम्हलें इसके पहले फिर छूट रहे हैं. कुछों को एकदम मौका मिल गया है, अदबदा के छुटे हुए हैं. हमेशा के थे! दुष्यंत कुमार की दुनिया वाले शेरों को ज़रा इधर-उधर रिसायकलिंग करके, मैत्रेयीदेवी मंजुनाथ महाविद्यालय के, तीन वर्षों से स्थगित किंतु इस मर्तबा बहाल, सालाना चुनाव के जुझारू प्रत्याशियों की तर्ज़ पर- आस्तीन चढ़ाये, मुंह में पानवाला ख़ून सजाये- टहल रहे हैं. टहल से ज़्यादा भटक रहे हैं. क्योंकि बीच-बीच में कोई नौसीखिया मज़ा खराब करने भी चला आता है कि गुरु, वाइस प्रिंसिपल के लच्छन ठीक नहीं लग रहे, इलेश्शन मुल्तवी हो सकते हैं? मुल्तवी होगा जब घंटा होगा, अभी तो गरम है न? अभी तो कहीं भी (ज़्यादातर लड़कियों के हॉस्टल में) लड़कियों तक पहुंचने का, उनसे चार बातें कहने का, मुस्करा के उन्हें देखने का, और सबसे ज़्यादा यह देखने का कि वे मुस्कराकर हमारी ओर कब देखती हैं, और जब देखती हैं तो उनका हमारी ओर देखना हमें, हाय, कितना तो अच्छा लगता है?
ओह, चुनरी के फेर में मैं फिर बहक गया. प्रगतिशील बिगनिंग के इन्नोसेंटी शुरुआत के बाद स्वयं खुद को ग़लत करने लगा? ख़ैर, मसला यह है कि बड़ा धुआं उड़ रहा है. बमचक के बम और चक्कू दोनों चल रहे हैं. कभी बड़ी ज़रूरी बातों पर तो कभी ऐसे ही- दुष्यंत कुमार वाली तैयारी करके आये थे तो कहीं तो इसे ठेलेंगे न, गुरु?- वाले अंदाज़ में चल रहे हैं. इसी चलाचली में एगो जॉन लेनन के अवतारो अवतरित हो गए हैं. उल्टे-सीधे सब नाके तक इनके हॉट डिस्क, फ़रमाइश-बेफ़रमाइश, मानसी दोहा बनकर धुले-गंदे सब दीवारों पर छा गए हैं. कहीं कहीं तो ऐसा-इतना छाये कि झरोखे की रोशनी, अंदर की हवा-पानी सबके लाले पड़ गए, नतीजतन इनकी छवाहट को छांटना पड़ा! मगर इन जॉन द फिल्थ की थोड़ा हटकर सक्सेस स्टोरी है. जॉनवा (या लेननवा?) योको ओनो के साथे नंगई वाली फ़ोटो उतरवाये थे, ये ससुर, अकेले ही सब उतार ले रहे हैं. और कभी-कभी तो अलबत अइसा उतार रहे हैं कि बेचारा फोटू खिंचवैया तक फ्लैश भले खींच दे रहा होए, नंगई से घबराके आंख मूंद लेय रहा है! हद है. मगर क्या हद है. क्यों है. जय जॉन पेलन?
ठीक है, ठीक है, ढिठाई है, पर उसकी कौनो सीमाई है कि नहीं है? हमारी भी है. पोस्ट का उद्देश्य बहसाकांक्षी भाइयों व बहिनियों, व विविध प्रकार के नंदन कानन के लल्लनों व ललनाओं से इतना भर कातर परार्थना है, और इसको ज़रा कान देयकर सुन लें, कि भले आप तहे दिल जॉन लेपन के रॉक एंड रॉल ठेलन की वर्जनाओं के टूटे बंध अपने यहां खोलकर परम सत्यमेव हो जाना चाहते हों, भगवान के लिए इस सत्य साक्षात्कार को मॉडरेशन की तंग सिक्युरिटी से गुजरने दीजिए! हाई बीपी के मुझसे बुजूर्ग मरीज़ों को अवांछित सत्यों का साक्षात कराके बेबात मौत की तरफ़ मत ठेलिये! जानता हूं क्रांतिकारी दौरों में कीट-फतिंगे मारे जाते हैं, और उनके मरने की स्टोरी कोई बड़ी मेंशनेबल न्यूज़ स्टोरी नहीं होती.. लेकिन.. यहां-वहां-जाने कहां-कहां जॉन पेलन के नवोवतार की तर वाणी की टिपाणी न पढ़कर ये कीट-फतिंगे इस रसभरे जीवनभार को थोड़ा और ही ढो लें तो क्या क्रांति का बड़ नुकसान हो जायेगा? कि अवांछित टिपाणी का सेंट फैलाये, हाई बीपी वाले को बिना डरवाये साढ़े सत्ताइसी संसार की क्रांति न हो पावेगी?
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
बात तो सही कही है आपने सरजी.
पर क्या होनी को कोई टाल सकता है?
और फ़िर साढ़े सत्ताइसी है तो क्या पाँच सौ साढ़े सत्ताइसी भी होंगे फ़िर हज़ार साढ़े सत्ताइसी भी होंगे. क्रांतियाँ भी होती ही रंहेगी.
"ये जिंदगी के मेले दुनिया मी कम ना होंगे."
भगवान के लिए इस सत्य साक्षात्कार को मॉडरेशन की तंग सिक्युरिटी से गुजरने दीजिए!
-बिल्कुल सहमत.
ये क्या लिखा है प्यारे प्रमोदभाईजी,
माडरेशन क्या होता है ? हमे तो पाडकास्टिंग की तकनीक सिखा दीजिए...सबसे हाथ जोड़ कर देख लिया , कोई नहीं सिखाता। हम भी अपनी आवाज़ सुनाना चाहता हूं पर करूं क्या ?
ये माडरेशन क्या होता है ?
@क्या अजित भाई,
आपके हाथों मॉडरेट होकर तो यहां लोग ज़िंदगी की पहली चोरी का किस्सा सुना रहे हैं? मैं तो सीनाजोरों की मार से गिरे-पड़े चोट खायों की कह रहा था. रही पाडकास्टिंग की बात तो वही क्यों, अभी आपको बहुत कुछ सीखाना है! मगर आप स्वस्थ्य सिखवैया साबित हो कहां रहे हैं? अभी तक एक बार किसी सवाल पर ठीक से कहीं पंगा लिया? एक बार कमज़ोर सी फांस में फंसे थे, तो उस फटे में भी हमें ही पैर फंसाना पड़ा था.. याद पड़ता है?