Wednesday, May 28, 2008

अंधारे-उजियारे की भावुकता..


जा रहा हूं. जाऊंगा
इस जगर-मगर से निकलकर
उस जगर-मगर देश जाऊंगा
सुगनी से कहूंगा गीत सुना
मनोहर से कहूंगा हरमपंथी कहां
छूटती है, बुचना, ला, बीड़ी पिला
टूटही ईंटा के चूल्‍हे पर टूटही
देकची चढ़ाऊंगा, बसाइन भात पकाऊंगा
पड़ोस की मड़ई से भिनसारे चुरायी लौकी
की बतिया और माहुर चटनी में मीस के
खाऊंगा. शीतला मौसी मुंह बनायेंगी तो
तुनक के कह दूंगा, ज़ादा शहरातिन
मत बनो. हमरी औकात यही है, अपनी
औकात से क्‍या लजाना? जबरिया हमसे
न ठनो. पप्‍पू से कहेंगे का पप्‍पू
सइकिलिया फिर पंचर पड़ी है, मरदे?
पप्‍पू चिमरख पाइंट पर हाथ पोंछता
टूटही कठवत के पानी में ट्यूब बुड़ायेगा
हमरी सिफ़ारिश पर फटही आवाज़ में
ओ, नील गगन के तले का बेसुर सुनायेगा
हम पइडल घुमाकर उतरल चेन सजायेंगे
सुगनी से पूछेंगे खंडाला नहीं शिवाला
चलती है का? अपनी खड़र-खड़र खड़खड़ि‍या
संझा के झुरमुट में उतारकर पता नहीं कवने
दुनिया की भुक् भुक् अंधारे उजियारे में उतरायेंगे?

7 comments:

  1. बाह बाह बाह...ई हुई न बात.
    बड़ी इच्छा होता है हमको भी...ऐसा ही करने का..

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  2. इस जगर-मगर से....उस जगर-मगर तक, ज़ादा शहरातिन न बनने से शिवाला तक, वाह-वाह।

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  3. हम पइडल घुमाकर उतरल चेन सजायेंगे
    सुगनी से पूछेंगे खंडाला नहीं शिवाला
    चलती है का? अपनी खड़र-खड़र खड़खड़ि‍या
    संझा के झुरमुट में उतारकर पता नहीं कवने
    दुनिया की भुक् भुक् अंधारे उजियारे में उतरायेंगे?

    कहानी मे ट्विस्ट है...

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  4. और नील गगन के तले का बेसुर कब सुनवाईयेगा ?

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  5. चलिए मैं भी पीछे से आता हूँ.

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  6. भाई प्रमोदजी,अद्भुत लिखा है आपने..बहुत दिनों बाद ऐसी कोई उम्दा कविता पढ़ी है..लिखते रहें गज़ब ढा रहे हैं....

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  7. वाह! गजब!

    हमउ चलब तुहार साथे. कैरियर मा धंस जइबे.हैंच पऊबु कि नाहि हो?

    बहुत उम्दा सैर कराये हैं, बधाई.

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