Thursday, May 29, 2008

ब्‍लूबेरी नाइट्स..

किसी ब्रुश से उछलकर फैल गया रंग हो जैसे, रात के कालेपन में सबर्बन रेल की नीली-बैंगनी लकीरें चमकती फुफकारती गुज़रती है. ट्रेन की धड़धड़ाती आवाज़ मानो उफ़नते मन की बचैनी का आईना हो, उम्‍मीदों के टूटने सी चिटककर एकदम-से पसर जाती है; आंखें तड़पकर एक चेहरा ढूंढ लेना चाहती हैं.. बार के काउंटर पर एक अनक्‍लेम्‍ड चाभी पड़ी मिलती है, रोज़-रोज़ बार में पहुंचनेवाला चाहा वह चेहरा नहीं मिलता.. दिल को सुकून. नहीं मिलता.. काली रातों में छिटके रंगों-सा कितने सारे अरमानों का मन नशीली बहको में ज़ाया होता है. कोने खुरचन इकट्ठा होती चलती है.. चोट खाये उम्रों की.. तक़लीफ़ों की.. मुंह फेरकर अंदर सब जज़्ब कर लेने, छुपा लेने की.

लिज़ी हंसती हुई कहती है जिस आदमी से अलग ज़िंदगी का ख़्याल करना मुश्किल, उसे अलविदा कैसे कहती? नहीं कहा. कहे बिना निकल आयी. फिर कोये-सी खाली आंखों के सूनेपन में रोती है. वह क्‍या उम्‍मीद है लिज़ी जिसे खुद में बांधकर रखना चाहती है.. आंखों की नींद के उड़ जाने की तरह एक बेमुरव्‍वत मोहब्‍बत को खुद से बाहर करके उड़ा क्‍यों नहीं देती?..

जेरेमी ने सब उड़ा दिया है इसलिए हंसता है.. हंस सकता है? लेकिन फिर उसकी नज़रों में इतना नेह और आवाज़ में ऐसी मिठास क्‍यों है? एक टूटे दिल की संगत उसे अच्‍छा आदमी बनाये रखती है? या इसका सबब बनती है कि वह अपने आसपास के समूचे टूटन को सहेजता, लोकता मनुष्‍य बने? जेरेमी चुप रहकर सब कहना चाहता है, लेकिन लिज़ी उसकी चुप्‍पी को कहां सुनती है? जेरेमी से बातें कर सके इसके लिए वह कितने शहरों के खाक़ छानती है, कि नौकरियों के कामकाजी घंटों में खुद को भुलायी रहे.. पास रहकर कहना कहां हो पाता है, दूर चिट्ठि‍यों में मन की लकीरें ज़ाहिर करे.. जेरेमी चिट्ठि‍यां पढ़ता है, और चुप रहता है.

जबकि अर्नी चुप रहकर शराब पीता है और तब तक पीता है जब तक कि बेसुध न हो जाये. क्‍योंकि जिससे कहना चाहता है वह बीवी श्‍यू तो उसका चेहरा तक देखना नहीं चाहती. वह औरत उस हर चीज़ से नफ़रत करती है जो उस आदमी से जुड़ी है जो उसकी जवानी चुरा ले गया.. और जब वही अर्नी नहीं रहता तो खुद से नफ़रत करने लगती है, क्‍यों? इसलिए कि अब कोई दुबारा उसे खोजता मेज़ पर बेसुध नहीं होगा?.. आदमी प्‍यार क्‍यों करता है? अर्नी की तरह किसी चाहना में तड़प-तड़पकर पीने और फिर गुज़र जाने की खातिर? औरत क्‍यों करती है.. कि वह खुद पर लुट जानेवाले के पागलपने पर हंस सके? और जब हंसी आवारापने की हदें छूने लगे तो उसके नश्‍तर को खुद में डुबो के फिर रो सके?..

लेस्‍ली होशियार होने, सबको पहचानने का ढिंढोरा पीटती है.. खुद को रत्‍ती भर जानती है? ज़िंदगी ऐसे जीती है जैसे ताश की बाजी हो.. और बेचारी एक दिन ताश का ढेर होकर रोने लगती है.. ज़िंदगी में लेस्‍ली ने इतने झूठ सजा रखे हैं कि सच्‍चायी कहीं भी जुए में हारती रहती है.. उसके भरोसे मेज़ पर उछाले सिक्‍के की तरह अटके रहते हैं, जाने किस करवट बैठें..

मगर जाने क्‍या अंतरंग है प्‍यार में मार खायी लिज़ी अपना भरोसा बनाये रखना चाहती है- अंधेरों के अपने झुटपुटे की रोशनी में, अपनी चिट्ठि‍यों, अपने कोये-सी आंखों की मासूम ईमानदारी में.. कौन जानता है- कैफ़े में सबका अप्रीतिकर, सबसे अनछुआ रह जानेवाले ब्‍लूबेरी पाइ को खानेवाली लड़की के आगे सचमुच कभी अच्‍छे दिन आयें? राइ कूडर के सुरीले संगीत के संगत सा? दारियस खोंदजी की नशीली सिनेमाटॉग्राफ़ी सा?

(वॉंग कार वाई की माई ब्‍लूबेरी नाइट्स देखकर)

8 comments:

  1. गुरु, कुल मिलाके अंडा और मुर्गी!

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  2. क्या पढ़ते हैं जो ऐसा अद्भुत लिख पाते हैं. कई बार सोचता हूँ कि यह सामान्य तो नहीं दिखते मगर फिर आपसे मिलन के क्षण याद आते हैं और बस, धरातल पर आ जाता हूँ बिना किसी निर्णय के.

    गजब लिखते हैं, बनाये रखिये. मत भटकिये यहाँ वहाँ...अपनी चीन यात्रा को अंजाम तक पहुँचायें तो ई बुक बनाई जाये. :)

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  3. दिखाने की जुम्मेवारी आप पे..

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  4. सब ईमेज़ेस हैं.... सोल कहां है?

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  5. "आदमी प्‍यार क्‍यों करता है? अर्नी की तरह किसी चाहना में तड़प-तड़पकर पीने और फिर गुज़र जाने की खातिर? औरत क्‍यों करती है.. कि वह खुद पर लुट जानेवाले के पागलपने पर हंस सके? और जब हंसी आवारापने की हदें छूने लगे तो उसके नश्‍तर को खुद में डुबो के फिर रो सके?.."

    नहीं.
    इसके अलावा भी बहुत कुछ है.
    क्यूं नहीं है क्या?

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  6. कहा से ले आते है आप ये भाषा और ये अंतरमन की कुढन जिजिविषा ?

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  7. नीली नशीली रातें अपने साथ हजारों हजार कहानियां लिए चलती हैं और हर कहानी में हजार भाव। लेकिन एक भाव जो शायद हर हानी में कामन होता है वो होता है प्यार की खोज। जो या तो मिलता नहीं और मिलता है तो आपका रहता नहीं।

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