Friday, May 30, 2008

गर्मी के बेदम होंगे?..

पता नहीं कहां तो पहुंचे हुए एक कवि ने ठीक ही कहा है कि दुनिया में कम न होंगे, झमेले जमके होंगे! जहां तक मुझे याद पड़ता है लाल किशन की पंक्तियां नहीं हैं, न किशन लाल की हैं. काकेश को फ़ोन करके जानना चाहा तो वह सीधे मुकर गए, चंद्रभूषण ने तो, ख़ैर, नौकरी ही बदल ली, और जहां तक मेरी बात है मुझे याद नहीं पड़ता मैंने कोई कविता लिखी हो, और लिखी भी हो तो उसमें- बहुवचन, एकवचन किसी भी शक़्ल में- झमेला का ज़ि‍क्र किया हो? जबकि इससे इंकार नहीं कर सकता कि अलबत्‍ता दुनिया के बारे में ज़रूर बोलता रहता हूं. जबकि सच्‍चायी यह भी है कि मेरी दुनिया आमतौर पर तीन, और नाटकीय परिस्थितियों के दबाव में ज़्यादा से ज़्यादा बीस किलोमीटर के एक चक्‍कर से ज़्यादा दूर नहीं जाती, जाती भी है तो बहुत जल्‍द फिर वापस अपने डाल (या डेरे?) पर आ भी जाती है. लेकिन झमेले में उलझा कहां मैं दुनिया में उलझने लगा? हालांकि बाबू राजेश रोशन भी कोशिश कुछ ऐसी ही कर रहे हैं. उलझाने वाली. मगर मैं इन सब फिजूल हवालों से नहीं हिलनेवाला.

अमीरी-गरीबी में बढ़ती खाई.. अरे, मतलब क्‍या है इसका? मैं तो गरीबी-गरीबी में बढ़ती खाई, आनेवाले दिनों की न खाई जानेवाले.. अखाये दिनों की.. सोच-सोचकर गला जा रहा हूं! और गरीबी से ज़्यादा तो फ़ि‍लहाल घमौरी समस्‍या है. अभी कल ही सपने में देखा बेकरी में पाव सेंक रहा हूं, और पाव की ही तरह सिंक भी रहा हूं. आज टपरे के नीचे ईस्‍त्रीवाले के भेस में के सपने की बारी है. पता नहीं कहां-कहां के बारे में कवि लोग लिख रहे हैं, गर्मियों के बारे में कोई नहीं लिख रहा? किसी कवि ने ही कहा था जहां न पहुंचे रवि तहां पहुंचे कवि. सही कहा था, लेकिन अधूरा कहा था. मेरे कहने को होता तो मैंने कहा होता, जंह-जंह रवि जायें, तंह-तंह कविवर डेरायें, एसी में मुंह चुरायें!

ओह, पता नहीं मैं क्‍यों कहने को आकुल हो रहा हूं कि दुनिया में ग़म न होंगे, जब गर्मी के बम न होंगे.. लेकिन कहते-कहते खुद को रोक ले रहा हूं कि दस लोग फटे में पैर फंसाने चले आयेंगे कि किसने कहने का हक़ दिया, तुम कवि कब से हो गए, बे? गर्मी का बम नहीं होगा लेकिन बम की गर्मी तो रहेगी? फिर ग़म कैसे न रहेंगे?

मैं इस तरह की बहसबाजी से उकता रहा हूं, उसी तरह जैसे रवीश गम्‍भीरता से उकताकर पता नहीं किस सुरम्‍य व्‍यंग्‍य मार्ग पर चलने को आतुर हो रहे हैं. बेजी भली हैं, कहने से बाज नहीं आयीं, ज़रा मुस्‍करा दो? एसी वाले लैपटॉप पर लिखते हुए सोची नहीं थीं मैं लोडशेडिंग वाले डेस्‍कटॉप से जवाब दूंगा, और मुस्‍कराने नहीं, गरमाने की कहानी लिखूंगा!

ओह, दुनिया में झम के होंगे, पता नहीं कब होंगे, अभी तो गर्मी के बेदम होंगे!

11 comments:

  1. आज टपरे के नीचे ईस्‍त्रीवाले के भेस में के सपने की बारी है.

    गरमी से ऐसे ही बेदम होते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब आप कहेंगे कि:

    आज टपरे के नीचे स्त्री के भेस में के सपने की बारी है.

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  2. यह वाली कविता मेरी है, मूंगफली वाले को कॉपी बेच दी थी. कहाँ मिली?

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  3. गुरूजी (आज से यही कहूँगा)
    चिकोटी काट रहे हो.
    काटो, खूब काटो.
    मजा आ रहा है कसम से.

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  4. @किशन बाल,

    ऐसी गरमी में मज़ा आ रहा है? और अपने को कवि कहते हैं?
    और @समीरन भैया, स्‍त्री के भेस वाले सपने से गरमी जानी हो तो हम आज ही शरारा सिलने को दे दें, पैसा आप कनैडियन डालर वाला डाक से पठा दीजियेगा?

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  5. गुरूजी मजा और सज़ा हम कवीयों को गर्मी या सर्दी से नही आता बल्कि ये तो दिमाग मे ही होता है.
    अब आप पूछोगे की वो (दिमाग) कंहा है?
    नहीं.....नहीं...... पूछो......पूछो....
    चलिय हम बता देते हैं.
    वही होता तो फ़िर क्या बात थी?
    अगर होता तो इस वक्त क्या.........

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  6. गुरूजी..
    गुरूजी.. गुरूजी....
    सो गए क्या?

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  7. नहीं, लाल बाल, सपने में हूं.

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  8. लगे रहिये गुरूजी
    अब तो कले भेटायेंगे
    पिरणाम.

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  9. हद है, बाबू, सपनो में चैन से नै रहने दोगे?

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  10. लेखको के ये पंगे ,दुनिया मे कम ना
    गरियायेगे ये आपस मे ,झमेले जम के होंगे
    प्रमोद तुम्हारे पास तो, है चीन का अभी वीजा
    हमे तो झेलना है, अफ़सोस तुम ना होगे

    कोई साहित्यकार है यहा, कोई पत्रकार बडा है
    फ़िर भी ब्लोगरो के सर से ,ये ताज कम ना होगे
    कविता लिखी थी हमने, तुम ढूढ आये दुनिया
    यू नाराज हम बहुत है, पर अखलाक कम ना होगे"

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  11. परमोद जा,
    झम बहुत दिन बाद कहीं देखा। याद आया बचपन में बागड़ चाचा का नारा था- मार देब बम से, उड़ जईबा झम से ।
    यह झम डिसअपियर नहीं अंतर्घ्यान होना है और बम में गरमी होती है। बाम्बस आर मेनली आफ थ्री टाइप इन इंडिया नोन एज जाड़ा बम, गरमी बम एंड बरखा बम एंड दे आल आर कैपेबल आफ किलिंग इक्वल नंबर आव पीपल एवरी सीजन। वन पोएट नेम रगुवीर साहाया हैव रिटेन अ पोएम पहले जाड़ा आया......

    तो जरा आरजे की तरह कहिए-यह रेडियो मिर्ची की मारदेबबमसेउड़जईबाझमसे सेवा है अब कौमी लिटरेरीखबरें खबरें सुनिए- एक पोएट (पोवा नहीं पोएट) इंडिया में गरमी पर कविता लिख रहा है। उसकी पोएट्री में सूरज की चालीस वाट का बल्ब है, लू की जगह पेडस्टल चला चमकीली पन्नी उ़ड़ा हरीकेन है, सुराही की जगह पेप्सी की प्लािस्टक की बीस वाली बाटल है और पथिक को उसने अभी घर के दरवाजे पर एक रूपए लेकर पानी का पाऊच पिलाया है। उसे डस्ट एलर्जी है सो उसने एसी के लिए लोन अप्लाई किया है। और हां अभी उसने एक चैनल की आलोचक लगती लड़की से बाईट में कहा कि वह ग्लोबल वार्मिंग पर लिखेगा। गरमी पर लिखना पिछड़ापन है, वह काम पहले ही नई झुलनी की छईयां बलम दुपहरिया छहांय ला हो नामक सवॆकालिक महान पोएट्री में किया जा चुका है।

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