Sunday, June 29, 2008

कितना समझता और सही चाहता है भारतीय मध्‍यवर्ग?..

भारतीय मध्‍यवर्ग में एक काफी बड़ा तबका है जिसे लगता है देश के विकास के रास्‍ते में पता नहीं ये किसान और आदिवासी क्‍यों रोड़ा बन रहे हैं. ऐसे तबकों की यहां-वहां आहुति हो जाये, सो ही बेहतर. इस तबके को गुजराती विकास के नाम पर राज्‍य के एक पुराने, बड़े समुदाय का राज्‍य की मुख्‍यधारा से कट जाना स्‍थानीय विकास की कोई बड़ी कीमत नहीं लगी, और उस सबक को देश के दूसरे हिस्‍सों में भी लागू करने की वह कामना करता हो तो इसमें ख़ास ताज़्ज़ुब नहीं. हममें बहुत लोग हैं जो भारत को तरक़्क़ी के अमरीकी मॉडल की ओर बढ़ता देखने में ही देश का सर्वोपरि हित समझते हैं.. और इस मॉडल के प्रति ज़ाहिर किया गया कोई भी संशय, सवाल चट तरक़्क़ी-विरोधी, और उससे ज़रा आगे जाकर राष्‍ट्रदोह में बदल जाता है!

समाज-चिंतक व बुद्धिजीवी (जिनकी संख्‍या अपने देश में वैसे भी दिनोंदिन कम होती जा रही है) अशीष नंदी भारत के इस मध्‍यवर्ग से बहुत खुश नहीं हैं जो विकास पाने के लिए तानाशाही वृत्तियों को देश के कंधे पर बिठा रहा है. भारत के सामने क्‍या आसन्‍न चुनौतियां हैं के जवाब में उनका कहना है कि मौज़ूदा आर्थिक व सामाजिक दृष्टि यह है कि समाज के निचले तबके का दस प्रतिशत भाड़ में जाये. हमें बड़ी खुशी होगी अगर यह समूची आबादी किसी तरह बिला जाये, मर जाये! हमारे वित्‍तमंत्री समेत हम सबों के अंदर यह धारणा पैठ गयी है कि गरीबी से पिंड छुड़ाने का इकलौता रास्‍ता ‘विकास’ और औद्योगिकरण है, मानो सा‍माजिक परिवर्तन का एक यही मॉडल हो जिसके बारे में हम जानते हों. दुनिया की छह फ़ीसदी आबादी वाला अमरीका दुनिया की तीस फ़ीसदी स्‍त्रोतों का भक्षण करता है. लेकिन हम दुनिया की छह फ़ीसदी आबादी नहीं हैं. अमरीका बनने के लिए हमें दुनिया के बाकी सब लोगों की हत्‍या कर डालनी होगी और संसार के सभी स्‍त्रोतों की लूट पर काबिज होना होगा तब भी हम अमरीकी जीवन-स्‍तर को हासिल नहीं करेंगे!

राष्‍ट्रीय राज्‍य की धारणा हिंदू धारणा नहीं है. यह उन्‍नीसवीं सदी की यूरोपीय खोज है, और खुद यूरोप इसकी जड़ता से बाहर आ चुका है, जबकि हम अब तक इससे चिपके हुए हैं. जैसाकि रवींद्रनाथ ठाकुर ने कभी कहा था, भारत में राष्‍ट्र बनाने की कोशिश कुछ वैसी ही है जैसे स्वित्‍ज़रलैण्‍ड की अपने लिये नौसेना खड़ी करने की कोशिश. एक अनुमान के अनुसार, 28 वर्षों में गंगा खत्‍म हो जायेगी. पता नहीं तब शायद इस मध्‍यवर्ग की आंखें खुले जो एक ख़ास इनकमग्रुप में शामिल होकर अपने को मध्‍यवर्ग मान रहा है, मूल्‍य उसके मध्‍यवर्गीय नहीं..

तहलका के ताज़ा अंक में भारतीय मध्‍यवर्ग के बारे में यह और अन्‍य काफी सारे दिलचस्‍प विचार रख रहे हैं अशीष नंदी. आप पढ़ि‍ये, और सोचिये..

एक और वजह है जिससे श्री नंदी इन दिनों फिर से ख़बरों में हैं.. गुजराती चुनाव में मोदी की जीत के बाद टाइम्‍स ऑफ़ इंडिया में उनके लिखे एक लेख पर अहमदाबाद के ‘बुद्धिजीवियों’ ने उनके खिलाफ़ अदालत में मुकदमा दायर किया, और उस विरोध के विरोध में इन दिनों एक हस्‍ताक्षर अभियान चला हुआ है.. नंदी के पक्ष में चल रहे हस्‍ताक्षर अभियान का लिंक यह रहा..

(ऊपर अशीष नंदी की फ़ोटो तहलका से साभार)

Saturday, June 28, 2008

संडे के एह, गिरिधारी.. ओह, बिरिजबिहारी!

बनवारी, गजोधर, गिरिधर, बिहारी.. या प्रीतकुमारी.. नाम में क्‍या रखा है? भावना में रखा है.. कोई याद किया गया, वह महत्‍वपूर्ण है.. लेकिन नहीं ही भी है.. पूछिये तो याद करने के नेह में आत्‍मा किस कदर नहायी होती है, वह महत्‍वपूर्ण है.. या स्‍वर.. या स्‍वर के अंदर आरोह-अवरोह के विविधरूपी ज्‍वर. ज़रूरी नहीं पक्‍का वही गायें, जिनकी आवाज़ में पक्‍की पगडंडियां व पक्‍के रस्‍ते हों.. कच्‍चे मुंड़ेर पर खड़े भी कभी-कभी पक्‍के का सपना बुन सकते हैं! नहीं बुन सकते? हो सकता है आप न बुन सकते हों, मगर मैं तो हर वक़्त कोशिश करता हूं.. कम से कम आवाज़ निकाल लेने भर के स्‍तर पर तो करता ही हूं..

तो बनवारी की दुनिया की नेहभरी याद की हमारी कोशिश पर ज़रा एक मर्तबा कान फेर के देखिये. और हां, फट से कान मोड़ मत लीजियेगा! हारमोनियम पर संगत कर रहे बाबू विकास पंडित शुरू में थोड़ा घबड़ा रहे थे, और सुर में आने में ठीक मात्रा में समय खा रहे थे. जल्‍दी ही हारमोनियम से घबराकर सिंथ के कीज़ पर लौटे तब कहीं जाकर कुछ-कुछ हमारी जुगलबंदी भी ऊपर उठते-उठते फटने से बच-बच गयी. जितना बची है, उसे अपनी कच्‍ची समझ में ढालते हुए हमारे पक्‍केपने की दाद दें.. हां, ऊपर-ऊपर दाद देते हुए ऐसा नहीं कि अंदर-अंदर साथ ही कुछ लोग यह भी सोचें कि स्‍वर की ऊंचाई है, ठीक है, मगर लिखायी क्‍या है? इसी लिखायी पर इतरा रहे हैं, इससे अच्‍छा तो समीर लिख लेता है? लिख ही लेते होंगे, भई, उनका पेट भरा होता है! गुलज़ार भी लिख लेंगे, उनकी तो गिलास भी भरी होती है. लेकिन खाली पेट मैं ऊंचा गाने के साथ-साथ ऊंचा सोच भी लूं, और साथ में जब बाबू विकास पंडित हारमोनियम की जलेबी फेर रहे हों (आवाज़ बीच-बीच में हमारे कंधे से नीचे झुककर माइक में ठेल दे रहे हों, उसका दु:ख तो ख़ैर, क्‍या कहें), यह कुछ आपको हमसे अतिशय अपेक्षा नहीं लगती? ससुर, संडे को गा रहे हैं, और फुलमतिया की जगह आपको सुना रहे हैं, काफी नहीं है?..

अब ज़्यादा दिमाग मत पेरवाइये, नीचे पेश है, धीरज और धरम से सुनिये: हे बनवारी! हो बनवारी..


Friday, June 27, 2008

सुबह-सुबह की अचकन में तीन बिम्‍ब..


अनजाने देहातों के जगर-मगर, पहाड़ के लम्‍बे विस्‍तार और जाने कैसी, किन-किन अंधेरों से गुज़रती पगडंडियों के बाद का दृश्‍य क्‍या होगा? दूर तक निकली आयी दौड़ों की थकान, हंफनी के बाद फिर कोई नयी दौड़ होगी? या अवकाश-सदृश भी कुछ होगा?..

पता नहीं किस जंगल के अस्‍तबल या कारख़ाने के ज़ि‍बहघर से छूटकर भागा था घोड़ा. सांस खींचे तीन रातें भागता रहा था, अब एक पहचाने पेड़ के नीचे दम लेने को खड़ा था, थाहता उत्‍तर जाऊं कि दक्खिन. पेड़ के ऊपर अल-कबीर का नियन साइन चढ़ा था, नियन साइन में बिजली के तलवार जड़े थे. घोड़ा उत्‍तर-दक्खिन थाहने का आदी था, ऊपर के बारे में समाज ने उसे शिक्षित नहीं किया था..

गेंहू, जवार के बाद, हे ईश्‍वर, अब वृष्टिजल का कारोबार भी करवा ही डालो, बहरियाओ मुल्‍क से, करवाओ निर्यात बरसात के पानी का, बिक्री के सूचकांक में, मालिक, ऊपर चढ़वाओ. क्‍योंकि ऐसा है प्रभु, धन्‍य हैं इस देश के लोग, अभी तक सन्‍न कहां हो पा रहे हैं. जोरू छीन जायेगी तो कहेंगे ईश्‍वर की यही माया थी, घर का नल और सुबह का कलकल छीनेगा तब शायद कुछ और करेंगे, ऊपर तककर, हे ईश्‍वर, तुमको याद नहीं करेंगे?

Thursday, June 26, 2008

क्‍या हम अर्जेंटीना से सबक ले सकते हैं?..

ऐसा क्‍यों है कि कोई चींटी हाथ या कंधे पर अपना खेल दिखाती दिखती है तो हम बड़ी सफाई से उसका खेल विफल कर देते हैं, जबकि शहर-शहर, देश भर में चल रहे आततायी आर्थिक खेलों की सच्‍चायी देखने की जगह, बाज़ार में छातों के बदले भावों मात्र में उलझकर रह जाते हैं.. उसके बाद यह नहीं होता कि बाज़ार या सड़क पर कहीं अपने गुस्‍से का इज़हार करें, बजाय घर आकर पसर लेते हैं? आर्जेंटीना से कोई सबक नहीं ले सकते? कल नाओमी क्‍लाइन की लिखी, एवी लेविस डायरेक्‍टेड एक डॉक्‍यूमेंट्री (द टेक) देखते हुए चिंताओं की इन्‍हीं पगडंडियों में टहल रहा था.. फ़ि‍ल्‍म काम से बहरियाये मजदूरों का बंद फैक्‍टरियों पर कब्‍जा करने व मजदूर कॉपोरेटिव की शक्‍ल में उन फैक्‍टरियों की दुबारा शुरुआत करने की मूल कहानी के साथ-साथ अर्जेंटीना, व समूची दुनिया में नियो-लिबरल इकॉनमी के काम के तौर-तरीकों के पोल-पट्टी भी उतारती है.. और यह काम नाओमी काफी सीधे व धारदार अंदाज़ में करती हैं! ज़रा कुछ नमूने देखिये..

फ़ि‍ल्‍म के एकदम शुरू में शाम की नियन रोशनी में जगमगाते ब्‍युनेस आयरस (आर्जेंटीना की राजधानी) के कुछ एरियल शॉट्स हैं.. बैकग्राउंड में नैरेटर की पंक्तियां हमें बताती है- ऊपर से देखने पर ब्‍युनेस आयरस अब भी यूरोप या उत्‍तरी अमरीका ही लगता है.. चमचमाती कंपनी के लोगोस खरीदारियों के लिए आपको उकसातीं, बड़े भीमकाय बैंकों के टॉवर सेविंग और इन्‍वेस्‍टमेंट की आपको सूरतें बताते.. लेकिन नीचे.. बैंक्स सुरक्षात्‍मक स्‍टील के कवचों में बंद हैं, दरवाज़े और दीवारों पर लोगों ने नारों की पुताई कर रखी है (बैंक के मुख्‍य दरवाज़े पर हमें ‘लुटेरे!’ पेंट किया दीखता है.. फिर कचड़े में खोजायी करते बच्‍चे दिखते हैं). डिज़ाइनर लेवल्‍स पहने ये बच्‍चे कभी अमरीकी फास्‍ट फुड खाया करते थे, अब कचड़ों में खाने की चीज़ें ढूंढ रहे हैं. यह कोई ऐसा-वैसा गरीब देश नहीं.. बल्कि एक अमीर देश जिसे गरीब बना दिया गया!..

फ़ि‍ल्‍म पांचवे दशक के दरमियान काली-सफ़ेद एक पुराने फुटेज के इस्‍तेमाल से मीरामार रेसोर्ट पर अलग-अलग उम्र के पर्यटकों की नयी-नयी बन रही अमीरी के आराम व इतमिनान की कुछ तस्‍वीरें दिखाती है.. नैरेटर की आवाज़ हमें सूचित करती है- पचास वर्ष पहले, कैनेडा और ऑस्‍ट्रेलिया के तर्ज़ पर अर्जेंटीना फर्स्‍ट वर्ल्‍ड के पायदान चढ़ रहा था. उन स्‍वर्णिम वर्षों के शासक, ह्युआन पेरोन ने अमरीकी व यूरोपियन मॉडल पर देश का निर्माण किया; बड़े सार्वजनिक उद्यम और मेड-इन-अर्जेंटीना फैक्‍टरी अर्थव्‍यवस्‍था इसकी रीढ़ थे. नतीजा अर्जेंटीना का मध्‍यवर्ग समूचे लातिनी अमरीका का सबसे संपन्‍न तबका बना. यहां से थोड़ा नब्‍बे के दशक और राष्‍ट्रपति कारलोस मेनेम के शासन में फास्‍ट-फॉरवर्डी छलांग लगाते हैं.. मेनेम ने भी देश का कायाकल्‍प किया, मगर अबकी बार, इंटरनेशनल मनिटरी फंड के रूलबुक में बतायी नीतियों के पीछे-पीछे चलते हुए: सार्वजनिक उद्यमों में कटौती की, मजदूरों की छंटनी की, कॉरपोरेट्स को गोद में बिठाया सार्वजनिक संपत्ति जहां-जिसको बेच सकते थे, उसका बेधड़क धंधा किया. अर्जेंटीना में इसे ‘द मॉडल’ की ताज़पोशी मिली.. ‘टाइम’ जैसी अंतर्राष्‍ट्रीय अमरीकी पत्रिकाओं के मुख्‍यपृष्‍ठ पर ‘मेनेम मिराकल’ जैसे कवर-स्‍टोरीज़ छपे.. (आईएमएफ के तत्‍कालीन मै‍नेजिंग डायरेक्‍टर को हम एक मीटिंग संबोधित करते, सबको बताते सुनते हैं कि कैसे अर्जेंटीना, सच्‍चे अर्थों में, बड़े ही मजबूत आधारों पर नयी सदी में प्रवेश कर रहा है!)..

अगले ही क्षण एवी लेविस की आवाज़ हमें आगे की सच्‍चायी का खुलासा करती बताती है कि ग़लत. कि मेनेम मिराकल नहीं डिसास्‍टर साबित हुआ. आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे पहुंच गयी. उसने एक पूंजीवादी वाईल्‍ड वेस्‍ट की स्‍थापना कर दी थी. लोग बेरोजग़ारी के जाल में फंस गए थे, जबकि राष्‍ट्रीय संपत्ति कहीं किसी भी दिशा में जाने को मुक्‍त हो गयी थी. और अर्जेंटीनी मुद्रा जैसे ही नीचे गिरना शुरू हुई, ठीक यही हुआ भी. बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां देश का 40 बिलियन डॉलर्स कैश उड़ाकर रातों-रात चंपत हो गयीं. ऐसी कोई नीति नहीं थी जो उनके हाथ बांधती, उन्‍हें रोकती. सरकार घबरायी और उसने देश के सभी बैंक अकांउटों को फ्रीज़ कर दिया. नतीजा यह हुआ कि आम अर्जेंटीनी मुंह बाये अमीरों को अपना पैसा लेकर भागते देखते रहे, जबकि खुद उनके जीवन भर के बचत पर ताला चढ़ गया! आम लोगों से यह बात पची नहीं. जल्‍दी ही, लाखों लोग सड़कों पर उतर चुके थे, और नारा लगा रहे थे- ‘इनमें से एक-एक को जाना होगा!’ उनकी मंशा लगभग-लगभग पूरी हुई. इन अर्थों में कि महज़ तीन हफ़्तों में अर्जेंटीना ने पांच राष्‍ट्रपतियों का चेहरा देखा. और ठीक उसी महीने जिसमें एनरॉन ने अपने को दिवालिया घोषित किया, अर्जेंटीना भी उसी राह गयी, दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी सर्वसंप्रुभता संपन्‍न डिफॉल्‍ट का चेहरा बनी आर्जेंटीना! एक देश जो अपने कर्जों से मुकर रहा था, बैंक जो लोगों को अपनी बचत तक नहीं पहुंचने दे रहे थे.. पूंजीवाद के सामान्‍य नियमों से स्‍वयं व्‍यवस्‍था मुंह चुरा रही थी!..

इस तरह से, अर्जेंटीना में सड़कों पर उतरा जनज्‍वार व विरोध किसी एक राजनीतिक या उसकी नीतियों के खिलाफ़ नहीं था.. यह लोगों द्वारा समूचे ऐसे विकासी मॉडल का अस्‍वीकार था.. वही जो सियाटल से शुरू होकर दक्षिण अफ्रीका तक अलग-अलग जगहों में हो रहा है.. जिस तरह से यह नवउदारवादी आर्थिक नीतियां वैश्विक हैं, उसी तरह से उनका विरोध भी..

अपने यहां भी महंगाई बढ़ने के सारे बांध खुल गये हैं, रुपये का अवमूल्‍यन भी अपनी राह है ही.. लेकिन विरोध और विद्रोह के हमारे तेवर क्‍यों नहीं?.. सोचना शुरू कीजिये, हमारा-आपका टाईम अब शुरू हो गया है..

(ऊपर की फ़ोटो में फ़ि‍ल्‍ममेकरद्वयी क्‍लाइन और लेविस साथ बैठे हैं)

Wednesday, June 25, 2008

द आर्ट ऑव.. मेसिंग अप..

पता नहीं ऐसा क्‍यों है कि अपने यहां आदमी माइक्रोफोन सामने आते ही रहता तो अपने उसी पुराने ज़मीन पर है, मगर उसकी आवाज़ जाने किन राजेश खन्‍नायी ऊंचाइयों-सच्‍चाइयों में जाकर छिप जाती है.. और फिर वहीं छिपी रहती है.. ऐसे शख्‍स के बारे में सोचकर लगता है वह फेल हुए बेटे का रिपोर्ट कार्ड हाथ में लेकर भी पता नहीं क्‍यों बात कुछ राजेश खन्‍ना के अंदाज़ में ही करेगा.. या गोभी के पुलाव की बात करते हुए पता नहीं उसे किस ऊदबिलाव में बदल देगा? आज सोचा तो आंसू भर आये की तर्ज़ पर आज बोल रहा हूं तो पता नहीं क्‍यों ज़बान भरभरा रही है.. आप सुनकर भर्राइयेगा नहीं.. और सोने रात का खाना खाकर ही जाइयेगा.. नहीं? ठीक है, मुझे खिलवाकर जाइयेगा..

बारिशी अंधेरे में बिन भांग एक उलट दोपहर के चित्र..

सरपट भागते घोड़े नहीं दीखते, जाने कौन किसकी सवारी होती कि बारिशी जत्‍था पलक झपकते में बांग्‍ला स्‍कूल के पिछवाड़े से लाल्‍टू के घरवाले मैदान तक पहुंचता, सबको अपनी चपेट में लिये-लिये और अगले मिनट संकरे डेली मार्केट की दुकानों के कमज़ोर टीनों पर अपनी गोलियां पटपटाता! झारसुगुड़ा से लाये कपड़े के थानों और संबलपुरिया साड़ि‍यों से घिरा मेघनाथ एस्‍बेस्‍टस के बजते छत के नीचे ट्यूब की टिमटिमाती रोशनी में घबराया-दुबका बैठा होता, मानो अब-तब में जब कभी भी उसके दुकान की छत गिरे, मृत्‍यु का वरण वह वहीं दुकान के अंदर करे, घर लौटने की हड़बड़ाहट में साइकिल पर प्रतिकूल हवाओं और बारिश से जूझते हुए सेक्‍टर पंद्रह के अपने मकान तक के रास्‍ते के कीचड़-कादो में नहीं..

काली गाय को नाथकर मंदिर के पीछेवाला मैदान पार करा सोमारु भी, अचक्‍के में चल आयी इस बरसाती हमले में, एकदम अकबकाया गइया पर चिचियाकर मंदिर की दिशा में भाग खड़ा होता.. पत्‍ते इकट्ठा करने पीपल के पेड़ पर चढ़ा ब्रृजभूषण का बेटा नंदन तो वहीं ऊपर शाखों में फंसा रोने लगता! जबकि उसका रोना पेड़ के नीचे खड़ी शांत व निस्‍पृह जनार्दन की गाय और तापस का झबरा कुत्‍ता ‘गोपा’ तक सुनते नहीं होते.. और सुनते होते भी, तो उसे सीरियसली लेते नहीं..

रुना आंटी के घर के आगे पता नहीं कब की और किसकी छोड़ी एक पुरनिहा एम्‍बेसेडर कार का मुरचाइल अस्थि-पिंजर होता, जो दुस्‍साहस में नंगे देह बारिश की मारों को झेलता और उफ़्फ़ तक न करता! उसके सामनेवाले हरे मैदानी टुकड़े में, पहले से ही भरे बड़े गड्ढे के भूरे पानी पर पट-पट बारिश की तीरें छूटतीं.. जंगले की सलाखों में आंख और गाल धंसाये बाबुन कहता- भूल के भी गड्ढे के पास मत जाना.. गड्ढे के खोह में सात सांप छिपे हैं!

घर में सब कुशल मंगल होता.. मतलब मैदान में फुटबाल खेलते हुए फिसलकर किसी बेटे के घुटने पर चोट आयी न होती, न रसोई में चूल्‍हे के पीछे सांप का कोई बच्‍चा गोला डालकर छिपा होता, और न ही मर्तबान के अचार में फफूंद पड़ा होता, फिर भी पता नहीं क्‍यों मां, मुंह पर आंचल रखकर लंबी आह छोड़ती.. बाबूजी सीमेंट के नंगे फ़र्श पर बगल में बाल्‍टी में भिगोया आम लिये बैठे होते और बादामी का गुठली चूसते हुए, बाहर से भींजकर कीचड़-सने गोड़ से लौटे मनोज को देखकर बरजते- का लेने लौटे हो, छोहाड़ा परसाद? बहरिया अभी और मजा करते?

मनोज, जो कुछ लेने नहीं लौटा होता, मगर सामने आम की बाल्‍टी देखकर अब लौटने की सार्थकता समझ आयी की अनकही समझदारी में चटपट बाबूजी के बगल चुका-मुकी जाकर बैठ जाता.. और फिर दीदी बरजने लगतीं कि कीचड़-कादो के गोड़ से घर गंदा कर रहा है, तो गुठली चाभते हुए बाबूजी- दीदी को नहीं, पता नहीं किसे संबोधित करते हुए- मुस्‍की काटकर जवाब देते बरसात में घर गंदायेगा नहीं तो क्‍या अगरबत्‍ती का धुआं छोड़ेगा?..

गुलाब के पौधों से लगे छोटे गलियारे में स्‍टैंड पर लगी चुमकी के बाबा की एटलस साइकिल चुपचाप खड़ी बरसात के चोट सहती होती, जबकि परदा खिंचे खिड़कियों पर नज़र ताने-ताने मेरी आंखें दुखने लगतीं, मगर फिर भी चुमकी का कोई पता न चलता.. झमाझम होती ऐसी बरसात में तीन-तीन दिन गुजर जाते और चुमकी का चेहरा देखे बिना मैं भयानक उदासी और घबराहटों के बाद बारिश से नफ़रत करने लगता.. ऐसी बेहया बरसात को कैसे सांप का ज़हर पिला दूं की रणनीति बुनने लगता.. ओह, फिर भी बारिश कहां थमती?

Tuesday, June 24, 2008

ओ बिहार! के कुछ पुराने, पुरनिया कौतुक..

पता नहीं तेईस वर्ष तक किस प्रशासनिक पेंच के फेर में उड़ीसा के साथ फंसे बिहार को बंगाल से मुक्ति और भारतीय नक़्शे पर स्‍वतंत्र जगह पहली अप्रैल, 1912 को मिली. मिली-जुली आबादी थी तब 3.8 करोड़. नवगठित प्रांत ने अपना प्रशासकीय राज-काज शुरू किया तो टेंट में रोकड़ था कुल सवा करोड़ रुपये. पुनर्गठन से पहले बंगाल में न खरचे जा सके मद से साढ़े पांच लाख की अतिरिक्‍त मदद मिली. इस तरह कुल आरंभिक 1.305 रोकड़ से बिसमिल्‍लाह हुआ; जिसमें 85 लाख तो नए प्रांत के कामकाज को शुरू करवाने में ही खर्च हो जाना था, बचे हुए में से बारह लाख को जमा रोकड़ की तरह रखते हुए बकिया का तैंतीस लाख ही- जहां जो बनाना-बिगाड़ना था- खरचे और पानी के लिए उपलब्‍ध था!

सबसे ज़्यादा आमदनी भू-राजस्‍व से आती थी (1923-13 में 1,57,39,000 रु.), उसके बाद नंबर उत्‍पाद करों से होनेवाली आय का था. 1928-29 तक हालांकि उत्‍पाद करों ने भू-राजस्‍व को पीछे छोड़ दिया था. फिर भी अन्‍य प्रांतों की तुलना में राजस्‍व की वृद्धि दर यहां काफी कम थी. इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा, समझनेवाले स्‍थायी बंदोबस्‍तवाली जंमीदार प्रथा को बताते रहे.. 1919-20 में पूरे प्रदेश में कुल 1,11,885 जागीरें (एस्‍टेट्स) थीं, जिनमें स्‍थायी बंदोबस्‍तवालों की संख्‍या थी 1,00,027. माने सबसे ऊपर ब्रितानी सरकार के सीधे प्रबंधन वाली 324 जागीरों से अलग, स्‍थायी बंदोबस्‍त वाली जंमिदारियों का ही बोल-बाला था. 20,000 एकड़ से अधिक की जागीरवाली रियासतों की संख्‍या थी 474, जबकि नब्‍बे फीसदी जागीर 500 एकड़ से कमवाली थी.

जमींदार बाबू साहब शौकीन तबियत के लोग हुआ करते थे. संगीत, शिकार, मोटर चलाने में सुखी रहनेवाले. इससे फुरसत मिलती तो पूजा-पाठ, धार्मिक आयोजन, यज्ञ आदि में व्‍यस्‍त रहते. एकाध (जैसे आरा के हरि जी का परिवार) को छोड़कर किसी की भी उद्योग-धंधे में खास रुचि नहीं थी..

बिहार से लेबर माइग्रेशन (स्‍थानीय ज़बान में ‘दौरा’) उन्‍नीसवीं सदी के आखिर से ही फलता-फूलता रहा है. इन विदेशिया मजदूरों के कारण ही बिहारी ग्रामीण इलाकों में मनिऑर्डर अर्थव्‍यवस्‍था की नींव पड़ी. 1887 ई. में ही गया जिले में 7,22,070 रुपये मनिऑर्डर से आया था. 1896-97 में मुजफ्फरपुर में 15 लाख रुपये आया था जो 1910 ई. में बढ़कर 34 लाख रुपये हो गया. यह माइग्रेशन कलकत्‍ता और असम के चाय-बागानों तक ही सीमित नहीं था, लोग फिजी और मारीशस तक निकल रहे थे. 1901-11 के लिए दौरान उपनिवेशों के लिए 11,676 लोग भर्ती किये गये जिनमें आधे से अधिक बिहार के थे और उसमें भी 3,473 तो सिर्फ़ शाहाबाद जिले के थे.

उद्योग उन दिनों बिहार में गिने-चुने ही थे. सबसे बड़ी टाटा आयरन एंड स्‍टील कंपनी (टिस्‍को) का नाम आता है, फिर दूसरा बड़ा उद्योग था जमालपुर का ईस्‍टर्न इंडियन रेलवे वर्कशॉप्‍स. 1922 में टिस्‍को में कार्यरत 40,000 लोगों की तुलना में जमालपुर में काम करनेवालों की संख्‍या थी करीब 12,000..

शिक्षा का सीन माशाअल्‍ला था. जो जैसा था उसमें उच्‍च शिक्षा पर पूरी तरह ऊंची जातियों और अशराफ मुसलमानों का बर्चस्‍व था. हां, कुछेक धनी-मानी कुर्मी-यादव-कोइरी परिवार के छात्र भी इस क्षेत्र में प्रवेश पा रहे थे. सबसे ज़्यादा दलितावस्‍था दलितों और लड़कियों की थी. मिडिल स्‍कूल में 1922 तक में दलित उपस्थिति सिर्फ़ 1, और 1927 तक में वह बढ़कर 2 हुई! हाईस्‍कूलों में ऐसे दलित छात्रों की संख्‍या 1927 में 0.3 फीसदी (प्रति हजार सिर्फ़ 3) थी. स्‍कूलों और कॉलेजों में दूर-दूर तक दलित छात्रों का नामोनिशान तक नहीं था.

प्रसन्‍न कुमार चौधरी, श्रीकांत लिखित 'बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम', वाणी, 2001 से साभार.

Monday, June 23, 2008

दुनिया की अमीरी के चिथड़े..या लिथड़े?

पता नहीं कहां-कहां की फटही में मूड़ी घुसाके तुरही बजाता रहता हूं. जबकि सतही से ज़रा ऊपर उठ कर कोई पुस्‍तकाकार रूपाकार भी सजा सकता था? दूसरे राजकमल और वाणी करते रहते, मैं पेंग्विन इंडिया के दफ़्तर से बाहर आ सकता था? या देखकर दूसरे सन्‍न रह जायें, मैं धन्‍य, ऐसी कोई फ़ि‍ल्‍म भी बना सकता था. सकता था? रात-रात जागकर मैं, ओह, कैसी तो गज़ब स्क्रिप्‍ट लिख लेता, मगर पैसा कौन लगा सकता था?.. यह लंचनंतर संतोष के डकार वाली कविता पंक्तियां नहीं हैं, दोपहर के भोजन से दूरी से उपजी मार्मिक, मरोड़कारी जेनुइन चिंतायें हैं..

कब यह सब होगा? निजी स्‍तर की तीन-चार लौमहर्षक कार्यवाइयां कब मैं एक्ज़ि‍क्‍यूट करूंगा? दूसरे कब कुछ करेंगे? दिल्‍ली में अपने पुराने संगी संगम के माथे चढ़ा रहता हूं, कि ससुर, नौकरी के पैसों से अघाये मत रहो, कुछ सार्थक विचार-मणि बाहर लाओ! संगम मुझे जवाब देने की जगह खांसी खांसने लगते हैं. जबकि अनिल और हर्षवर्द्धन से मैंने कल कहा कि इतनी आर्थिक, अर्थपूर्ण चिंतायें हैं आप लोगों के पास, यह वीडियो तक कैसे ट्रांसलेट हो, इसकी जुगत क्‍यों नहीं भिड़ाते, तो अनिल तो मुंह के आगे हाथ रखकर, संगम की ही तर्ज़ पर, खांसने लगे; हर्षवर्द्धन, अपने नाम को सार्थक करते हुए, हंसने लगे. पता नहीं मुझ पर हंस रहे थे या मेरी सलाह पर. बहुत बार मुझे भी अपने कहे पर हंसी आती है, मगर थोड़ी देर बाद- अनिल की तरह मुंह के आगे हाथ रखकर खांसने की जगह, मैं दिमाग़ में कुछ नया भांजने लगता हूं..

दो दिन पहले, अभय की दया (दया से ज़्यादा उसकी जेब के पैसों से) से एक किताब हाथ आयी (आकार वालों ने उसका हिंदी अनुवाद भी छापा है, मगर वह छह सौ की है, जबकि मैंने जो उठायी, अभय के जेब में जिसने एक सूराख़ बनायी, अंग्रेजी वाली वह महज डेढ़ सौ की थी, डेढ़ सौ से और ज़्यादा मज़ेदार यह था कि दिल्‍ली, चेन्‍नई की जगह उसे खड़गपुर के एक छोटे प्रकाशन ने छापा था).. और ‘विश्‍व अर्थव्‍यवस्‍था में ग़ैर-बराबरी और रोजग़ार- दोषी कौन’ के शुरू के दो अध्‍यायों से गुज़रने के बाद कुछ-कुछ बड़ा तृप्‍त हूं. आर्थिक विषयों वाली किताबों के साथ ज़्यादा दिक्‍कत यह होती है कि चार पन्‍नों के बाद इस तरह आंकड़ों के टेबल सजने लगते हैं कि मेरे जैसा खुद को समझदार लगानेवाला पाठक भी अकबकाकर खुद को मूर्ख महसूसने लगता है, और थोड़ी देर तक ऐसा महसूसते रहने के अनंतर, किताब के लेखक और प्रकाशक को मूर्ख समझकर किताब से बाहर चला आता है, और फिर बाहर ही आवारा टहलता रहता है!

माइकल डी येट्स की ‘नेमिंग द सिस्‍टम’ के साथ ऐसा नहीं है. मैं अभी भी किताब के अंदर ही हूं, और आखिर तक बना रहूंगा ऐसी उम्‍मीद बनी हुई है. सोवियत संघ के विघटन के बाद क्‍यूबा, दक्षिणी कोरिया, वेनेज़ुएला व बोलिविया जैसे कुछ देशों से अलग समूची दुनिया में जिस ग्‍लोबल नवउदारवादी अर्थव्‍यवस्‍था का एकछत्र राज है, और उसके पुरोधा इसे दुनिया से देर-सबेर गरीबी दूर करने का इकलौता मंत्र बताते घूम रहे हैं, किताब इस मंत्र के एक हज़ार प्रतिशत झूठ.. पूंजीवादी विस्‍तार के इतिहास और वर्तमान के क्रिया-व्‍यापारों की सरल, समीक्षा करती एक बड़ी तस्‍वीर हमारे सामने पेश करती है, जिसे पढ़ते हुए मुझे लग रहा था ऐसी सामग्री सभी राष्‍ट्रीय अख़बारों के मुखपृष्‍ठ पर छापा जाना चाहिये, लेकिन चूंकि वह हमारे-आपके हित में छपती नहीं, तो ऐसी सामग्री भूले से भी छापने से रहीं, मगर गांव के चौपालों पर खड़े होकर उन्‍हें सुनाया जाना तो चाहिये ही? गोवा में लोहिया के सम्‍मान की ख़बर लिये घूम रहे रवीश यह ज़ि‍म्‍मा उठा सकते हैं.. उठायेंगे? नहीं तो फिर बलिया, बलरामपुर के चौपालों तक बकिया ऐसे कौन छापामार सिपाही हैं जो इन ख़बरों को वहां तक पहुंचाने के लिए मुझे वहां टांगकर ले जायेंगे?..

दोषी कौन की सामग्री पर आनेवाले दिनों में और लिखूंगा..

तब तक के लिए ज़रा इस एक छोटे से टेबल पर आंख फेरिये:

Some Astonishing Facts
From a 1998 study by the United Nations

1. The richest fifth of the world’s people consume 86% of all products, while the poorest-fifth purchases 1.3%- everything from meat to paper and automobiles.

2. The three richest persons in the world have assets greater than the combined GDPs of the 48 poorest nations (note that this is a comparison of wealth to income). So, if the three richest persons sold their assets they could buy the total output of these 48 countries.

3. If the poorest 47% of the world’s people (2.5 billion persons) pooled their yearly incomes, they could just purchase the assets of the world’s wealthiest 225 individuals.

4. A tax of 4% levied on the wealth of these same 225 wealthy people would pay for basic and adequate health care, food, drinking water and safe sewers for every person on earth.
और विचारिये!

Friday, June 20, 2008

अभी-कभी कैसी पुकार..?

लगता है अभी कहीं कोई आवाज़ नज़दीक से पुकार रही है.. महीन, हल्‍की.. मैं कान गड़ाये सुनता हूं अब पहुंच रही है, कब पहुंच रही है.. पहुंचा ही चाहती है? लेकिन पहुंचती नहीं. या पहुंचती भी होगी तो मुंहअंजोर में नये पत्‍तों की सरसराहट, या दस महीने के बच्‍चे की सी फुसफुसाहट के किसी ऐसे झिलमिल दुश्‍वारियों में पहुंचती होगी जिसे मैं अपनी चेतना में थाह नहीं पाता.. गुज़र गयी के अचंभे और गुज़रेगी ही अभी-कभी की भोली उम्‍मीद में अकबकया उंगलियों पर पल गिनता हूं.. एक-दो-तीन.. तीन-दो-एक.. झपकियों, उनींदे, अचकचाये क्षणों के खालीपने को खाली-खाली-से सुरों से सजाता तकता रहता हूं, लेकिन नहीं आती. क्‍या, कौन, कैसी आवाज़ का फ़रेब है जिसमें धड़कते नंगे दिल को तश्‍तरी पर सजाये, कनपटी पर कोई अफ्रीकी नगाड़ा सुनता मैं बैठा होता हूं? कोई तुक है? क्‍या सुख है?..

जाने फिर भी क्‍या है कि उम्‍मीद की कमज़ोर, मलिन, कैसे-कैसे तक़लीफ़ों को जी चुकी डोंगी, छलावे के झिलमिल पानी में रात दर रात फिर-फिर बाहर निकल आती है.. कि आसगांव जायेंगे, उजासगांव जायेंगे. कल नहीं पाये तो क्‍या आज रस्‍ते में आवाज़ का वह जामुन भरा-भरा ज़रूर कहीं मिलेगा! पीछे कहीं कोई फीक़ी हंसी हंसके कहता है धत्‍त्! डोंगी हंसी को अनसुना करती पानी में छप्‍प् निकल चलती है..

मैं चेहरे पर हाथ फेरता बुदबुदाता हूं क्‍या आवाज़ है, कैसी आवाज़ है जो पुकार-पुकार रही है, और एक ज़रा सी दूरी पार नहीं कर पा रही?..

फिर लड़की से बातचीत.. माने एकालाप

चाहता तो लड़की की आंखों में गहरे झांक कर, उसकी आत्‍मा लूट कर, निर्मोही परदेसी की तरह किसी नये गंतव्‍य की ओर निकल लेता; मगर जाने मन में कैसे तो मानवीय उद्रेक थे कि एडवेंचरस नादिर शाह की तरह निर्मम आचरण करने की जगह, मैं अंधे सूरदास की तरह कोमलाकांक्षी बना रहा, लड़की की बजाय, कमरे की सूनी दीवारों पर न टंगे चित्रों को निरखता, उनके घटियापे पर उदास होता रहा. इसीलिए, स्‍वाभाविक था लड़की ने जब पूछा कैसा महसूस कर रहा हूं, तो मैं एकदम से उखड़ गया. अरे, क्‍या मतलब है कैसा महसूस कर रहा हूं? जहां-जहां पहुंच रहा हूं, बारिश बंद हो जा रही है, ऐसे में आदमी क्‍या खाक़ होलुलु महसूस करेगा? और मेज़ के उधर बैठी मुंह के आगे पेंसिल घुमाती तुम खामख़ा खुद को बहुत भाव मत दो कि तुम्‍हारी तीन फीक़ी मुस्‍की से मैं ये और वो महसूसने लगूंगा! हद है?.. इसी तरह का लड़की की बाबत कुछ अंट-शंट सोचता मैं कमरे से निकलने को छटपटाने लगा- वैसे ही जैसे ईराक से ढेरों फौजी निकलने को अकुलाते रहे होंगे- मगर तभी लड़की की हाथ की कुछ पुर्चियों को देखकर याद आया कि लड़की डॉक्‍टर है, और फ़ि‍लहाल वह लजाते हुए मुझे भले देख रही हो, उसका लजाकर देखना एक दिल-लुटवैये से ज़्यादा एक मरीज़ की तरफ देखना भी हो सकता है?..

मन में इस बोझिल ख़्याल के उठते ही, अधउठा मैं, वापस कुर्सी में धंस गया.. एक बेचारी नज़र से लड़की को देख, पता नहीं क्‍यों तो भावुक होने लगा. महसूस करने का जो एक रफ़, स्‍केची स्‍टेटमेंट मैंने लड़की के आगे पेश किया होगा, उसका मोटा-मोटी खाक़ा कुछ इस तरह का है:

क्‍या बताऊं, क्‍या महसूस करता हूं, डाक्‍टर? बताना संभव है? आप झेल पाओगी? पटना में छह सौ रुपये का कमरा लेकर बिन-बिजली अंधेरी अकेली बरसाती रातें गुज़ारी हैं तुमने? या बिहार शरीफ में बासी आलू की तरकारी खाकर कभी बीमार पड़ी हो कि तुम्‍हें बतलाऊं मैं क्‍या महसूस करता हूं? भगवतीचरण वर्मा के ‘भूले-बिसरे चित्र’ में दबाकर रखे तीन सौ रुपये थे, और घर में वही उतने ही पैसे थे जो मोहनदास इस वादे के साथ ले गए थे कि अगली सुबह पहले काम की तरह वापस कर देंगे, और आज अट्ठारह साल हो रहे हैं फिर मोहनदास का चेहरा नहीं दिखा और आप पूछती हैं मैं क्‍या महसूस करता हूं?

दांत के डाक्‍टर की कुर्सी में फंसा व्‍यक्ति डाक्‍टर को अपने चमकते, तेज़ औज़ारों के साथ छेड़छाड़ करता देख मरीज़ क्‍या महसूस करता है इससे क्‍या फर्क़ पड़ता है? शोमा चौधुरी कैसे-कैसे तो तीखे मर्मस्‍पर्शी सवाल किये जा रही थी जिसका वित्‍तमंत्री निहायत अमानुषिक, फूहड़ जवाब दिये जा रहे थे, उससे किसी को फर्क़ पड़ा था? नब्‍बे के दशक से लगभग समूची दुनिया की बौद्धिकता जब पूरी तरह अमरीका व वॉशिंगटन कंशेंसस के आगे न केवल घुटने टेक चुकी हो, बल्कि फुदक-फुदक कर उसकी तरफदारी, तीमारदारी में नित नये तर्क ढूंढ-ढूंढ कर ला रही हो, बता रही हो कि विकास के अमरीकी मॉडल से अलग इस भूखंड के पर विकास की अन्‍य कोई सूरत एक्सिज़्ट ही नहीं करती; वैसे में चॉम्‍स्‍की और तारिक अली जैसे कुछ सिरफिरे न केवल समीक्षा व आलोचना का धारदार-जोरदार बिगुल बजाये-जिलाये रखे हों, बल्कि शावेज़ और मोरालेस की निहायत छोटी, अर्थहीन दुनिया में दुनिया के व्‍यापक अर्थ भी ढूंढ लेते हों?.. जबकि मैं अपने सादे भटकाव तक को ठीक-ठीक अर्थपूर्ण बना पाने में असफल रह जा रहा हूं और फिर भी आप ज़ि‍द करती हैं कि मैं आपको बताऊं कि क्‍या महसूस करता हूं? क्‍या बताऊं क्‍या महसूस करता हूं?..

Thursday, June 19, 2008

आंट वी स्‍पेशल? येस, वी आर?

कैसी भी तुलना का ख़्याल प्रहसन है.. सिर से पैर तक सब प्रहसन ही है, नहीं है?

पता नहीं शेर, लोमड़ी या सियार ऐसी चिंताओं में हलकान होते होंगे या नहीं कि आज फिर बारिश- वह कौन सी तो मोहब्‍बत थी की तरह- दिल भींजाने की जगह, दिल जलाकर निकल गयी? या चमरख बसाइन तकिये के नीचे दबाकर रखी डिब्‍बेवाली सुरती सिधर गयी तो उसके बाद वाली कहां से पायेंगे? इस बरसात में अरवी के पत्‍ते की पकौड़ी और लौकी का बजका खायेंगे, या फटही छाता झुलाते हुए यूं ही दिन में तीन मर्तबा बाज़ार जाकर किसी चूते हुए खपड़ैल के नीचे स्‍वयं को फलतुव्‍वै मलिनावस्‍‍था में पायेंगे? या कड़ाही से होता हुआ बजका हाथ और पेट में पहुंचकर आत्‍मा तर कर ही गया, और उसके अनंतर चाय की सुड़कारों से एक वरीय उच्‍चस्‍तरीयता को प्राप्‍त हो रहा हो, तब शेर, लोमड़ी या सियार- या केंचुआ, झींगुर, फतिंगा कोई भी- बीड़ी सुलगाकर नेपाली क्रांति की दशा-दिशा पर विचारमग्‍न होते होंगे, या परदा तानकर, महकव्‍वा चादर पर पसरे फूलकुमारी से गोड़, और दिल दबवाने को मुखातिब होते होंगे?

ओह, जब सुबहिया संवार झर-झर झरने, हररने को हो, उसकी जगह सूक्‍खल निर्झर के मूसल बरस रहे हों, तब क्‍या मन ऐसे ही व्‍यर्थ वितान बुनता है? जानवरों से मनुष्‍य के साम्‍य की कल्‍पना क्‍या किसी भी रूप में क्षम्‍य होगी? हो सकती है? अपने यूपी के होनहार हाईस्‍कूलिया बच्‍चों की तरह जानवरों के बीच ऐसा कभी हुआ है कि सरकार ने इम्‍तहान में नक़ल पर पाबंदी लगा दी तो तड़-तड़ बीस लाख लड़के मैदान मार ले गए! माने इम्‍तहान में पास होने से रह गए? और शर्म से कोई पंडिजी गड़ही में बूड़े भी नहीं? सामाजिक प्रतिक्रिया व शैक्षिक संस्‍कारी संवेदना का ऐसा उच्‍चस्‍तरीय तीक्ष्‍ण-तत्‍काली प्रदर्शन जानवरों में विरले लक्षित होगा. पता नहीं केरल व कलिंगवालों में कितना है, यूपी वालों में भदर-भदर के है. ऐसी तीक्ष्‍ण लक्ष्‍यकारी संवेदना..

और यह सिर्फ़ हाईस्‍कूल के तीक्ष्‍णमना बुद्धिवैभव कीर्तिमानी नौजवानों की ही बात नहीं है, मिडिल फेल उन गृहलक्ष्मियों की भी गौरवगाथा है जो सास के कमरे और आंगन में कपड़ा डालने के दरमियान इतनी मर्तबा आना-जाना करती हैं कि उतनी दूरी में अहमदशाह अब्‍दाली अफग़ानिस्‍तान से दिल्‍ली ही नहीं, धनबाद के कोयला खदान तक लूट आता, लेकिन इन गृहलक्ष्मियों से एक बार सवाल पूछ लें कि ओ धन्‍ये, जीवन में कितनी दफ़े धान के खेत से बाहर के संसार गयी हो? तो बेचारी (ज़्यादा सुकुमारी) चेहरा को ज़रा एक ओर मोड़े दांत से हल्‍के-हल्‍के होंठ काटती रहेगी, और लगेगा कि अब जवाब दे रही है तब दे रही है, लेकिन देगी नहीं, होंठ तो काटती ही रहेगी, बहुत हद तक आपका दिमाग भी काट आयेंगी!

किसी भी तरह के तुलनात्‍मक अध्‍ययन का ख़्याल दरअसल घृणास्‍पद है. जानवर- वह चाहे शेर हो या सियार या ससुर, कीड़े-फतिंगे- निहायत अस्तित्‍ववादी जीव हैं. गोड़ खुजाने, दुम हिलाने, या यहां-वहां कुछ बहा आने से ज़्यादा उन्‍हें दूसरे विषयों की चिंता नहीं सालती, जबकि मनुष्‍य, ख़ासतौर पर यूपी वाला, दिन में इतनी मर्तबा अमिताभ बच्‍चन और वह कैसे तो गजब हैं, और कितने तो अद्भुत हैं जैसी विहंगम चिंताओं से अपना दिमाग मांजता रहता है. और जब उसमें मंज जाता है तो उसके बाद इधर-उधर और पता नहीं कहां-कहां निरखने-अध्‍ययन करने के अनंतर भारतीय क्रिकेट की दशा-दिशा पर चिंतन करने लगता है!

Tuesday, June 17, 2008

तीन अविस्‍मरणीय महान विदेशी कवितायें..


||एक||
सल्‍वादोर डाली का भेदभरा चित्र था या
मालिक-मकान का बढ़ा हुआ पित्‍त था
सूखी बारिश में हरहरा मचल रहा था
या शायद वजह थी कहीं हंगरी के किसी
छोटे शहर मेरी कविताओं की चर्चा हुई थी
सोफ़े पर मैं गदबद फिसल रहा था
माथे पर मोमबत्‍ती की लौ की मुकुट
चढ़ाये, ओहो, कैसा तो चमक रहा था
रसोई में पक रहा था, छत पर कूक रहा था.

||दो ||
इस गली में दुबारा फिर कभी
वापस मत आना, प्रिये, कितनी बार
याद दिलाऊंगा गली में तीन चिरकुट
हैं, चार सियार, आठवां स्‍वयं मैं हूं
और पंद्रह वर्ष पहले से
जानती हो विश्‍वसनीय नहीं हूं
वैसे ही जैसे इस देश के चुनाव
देहात की शिक्षा, महानगरों में संस्‍कृति
और हमारी हाथ की लक़ीरों में
प्‍यार विश्‍वसनीय नहीं है.

||तीन||
खेत में गोभी का फूल
खिला है, बैल के माथे गूमड़
सिपाही के चूतड़ पर फुंसी
फली है, मेरी छाती में,
प्रिये, कविता कलकल!
पिछली सदी के पूर्वार्द्ध के यूगोस्‍लावी (या रोमैनियन?) महाकवि अंद्रेई दानिशोविच की दुर्भाग्‍यवश अप्राप्‍य रही आयी रचनाओं से कुछ चुनिंदा अंश. हालांकि एक साहित्यिक सट्टेबाज मित्र इन पंक्तियों का मूल स्‍पैन के किसी देहात में चिन्हित करने की ज़ि‍द कर रहे हैं. मगर मैं उनकी इस ज़ि‍द को बहुत सीरियसली ले नहीं रहा हूं, क्‍योंकि इस ऊलजुलूल बिना पर तो इन पंक्तियों की ऑरिजिन तो रक्‍सौल और राऊरकेला तक में ठेली जा सकती है?

Monday, June 16, 2008

चोरों और लुटेरों की

भारतीय लोकतंत्र किसके बूते सांस लेता, एक कदम दायें, और तीन कदम पीछे चलता है? जवाब है, गुंडों और लुटेरों के. पढ़ लीजिये. ध्‍यान से पढ़ि‍येगा. उत्‍तर-दक्षिण कहीं भी इस फलते-फूलते लोकतंत्र के किसी राज्‍य के ज़रा दबे-छिपे हिस्‍से की किताब के पन्‍ने पलटना शुरू कीजिये, पाइयेगा हर जगह कोई न कोई होनहार व काबिल गुंडा और लूटेरा समूह लोकतंत्र को मजबूत करने में सरकार के हाथ बंटा रहा है! सरकार बेचारी से ऐसा हो ही नहीं पाता कि बिना ऐसे काबिल समूहों के काबिल मदद के अपने को खड़ी कर ले. और खड़ी कर भी ले तो खड़ी रह सके!

इसके आगे बड़ी सीधी सी बात है कि सरकार अगर गुंडों व लुटेरों के समर्थन से अस्तित्‍व में आती है (और बनी रहती है) तो वह काम भी गुंडों व लुटेरों के हित में करेगी, न कि उस सर्वसामान्‍य चिरकुट जनता के जिससे उसे एक घेले का फ़ायदा नहीं होने जा रहा? इसीलिए बहुत सारे राज्‍यों में यह कहानी भी आमतौर पर देखियेगा कि कोई पगलेट आदमी, या समूह, जनहित में कोई इनिशियेटिव लेता है- मान लीजिए ऐसा कोई भी इनिशियेटिव जो सरकार के साथी-सहोदरों के हित में बिल खोदने लगे- तो सरकार की पहली प्रतिक्रिया क्‍या होती है? सरकार गुंडों के बचाव में आगे खड़ी हल्‍ला मचाना शुरू करती है कि देखिये, पगलेट तत्‍व जनता को उकसाने का काम कर रहे हैं! मामला थोड़ा और गंभीर होने लगे तो ऐसे तत्‍वों को ‘राष्‍ट्रविरोधी’ व्‍यापार में लिप्‍त देखा जाने लगता है. ज़्यादा तक़लीफ़ देने लगें तो ऐसे ‘उकसावेबाज’ आसानी से जेल में ठेल भी दिये जाते है (एक नहीं इस देश में बहुत सारे बिनायक सेन जेलों में बंद मिलेंगे), उसकी प्रतिक्रिया में इधर-उधर कुछ हल्‍ला होता है तो सरकार उसे कोई ख़ास भाव भी नहीं देती. जबकि यह आपको रेयरली दिखेगा कि असल गुंडे व लुटेरे (व हत्‍यारे) कभी जेल में ठेले जायें. ठेले जाते भी हैं तो वह मोस्‍टली किसी पॉवर बैलेंस की कार्यवाही का नतीजा होती है, या प्रशासनिक ‘अकुशलता’ का; और ऐसी गलती हो गयी भी होती है तो थोड़ा आगे जाकर उसे तत्‍परता से बहुत जल्‍दी दुरुस्‍त भी कर लिया जाता है!

Saturday, June 14, 2008

बना रहे.. जो भी है?..

ऐसी कोई विशेष आकुलता नहीं है, लेकिन लगता है बनारस में कुछ महीने गुज़ार लूं तो शायद मैं भी मुंह चुभलाता पान खाने लगूं (सब खाते हैं. रिक्‍शे पर बैठी सवारी मुंह की जुगाली करती रहती है, तो रिक्‍शेवाले सिपाही की उंगलियों पर भी कत्‍थे और चूने की रौनक रहती है).. हिंदी जगत की दूसरी अन्‍य ऐंड़े-बेंड़ेपन व मूर्खताओं की तरह बंदरों को जीवन में स्‍वीकार करके आपस में मुंह बिराने के खेल में धन्‍य हो लूं! चार कदम यह खेल और आगे निकले तो शायद अस्‍सी घाट की सीढ़ि‍यों पर, भांग की गोली के सुरीले रौ में, किसी मित्रवर को यह समझाने भी लगूं कि बंधुवर, बहुत छिनक रहे हो? छिनको मत, सब अविरल अजस्‍त्र धारा है, जब तक हो, मस्‍त रहो, बमभोले का सुमिरन करते, ठुमरी-दादरा ठेलते हुए यह समां और समय गुज़र जाने दो!..

बनारस की पतली गलियों के कचर-मचर की गहीनलोक में जीवन का कोई भी नाटकीय रुपांतरण असंभव नहीं लगता. हो सकता है इसी बहाने मुझे भी दो बंद गाने की समझ आ जाये? दुनिया सुलटाने की? फिर बीच सड़क यह सोचते सांस न अटके कि साइकिल रिक्‍शे पर से गुज़रकर जा रही है, या टेम्‍पोवाला सबको बेमतलब बनाता- जहां एकदम जगह नहीं है वहां भी जगह निकाले- जाने किस लयकारी में, आगे तीर की तरह निकला न केवल चला जा रहा है, बल्कि बकिया में से किसी की जान भी नहीं जा रही है! ओहोहो, अहाहा, कैसे तो कैसी जिजीविषा एकदम मूर्तिमान बनी रहती है..

वैसे कभी-कभी इसीमें ज़रा टिनहा-सा व्‍यतिक्रम भी आ जाता है.. कि रिक्‍शे और टेम्‍पो अचाही मोहब्‍बत में ठिल गये, कुछ तू-तड़ाक का व्‍यापार बुनने लगा.. कोई लघुकाया, संसार को माया मान रही महिला चपेटे में फंस गयी, मुंह से जाने किसको तो संबोधित करके तीन गाली निकालीं, फिर निकलते-निकलते सड़क के दूसरी छोर के मंदिर की दिशा में सिर-नमन का एक श्रद्धा सुमन भी ठेल दीं!

पता नहीं क्‍या है कि भाई लोग भांग की गोलियां खाते हैं, क्‍योंकि मैं तो बिना खाये नशे में था.. हो सकता है अभी भी हूं?

Tuesday, June 10, 2008

छोटे शहर में.. कुछ नोट्स..

बड़े शहरों के नियमित जीवन से बाहर छोटे शहरों में लौटना सुखी और दु:खी होना है.. ज़्यादा सोचने लगिये, तो दोनों मर्मांतक स्‍तर पर होना है. सुखी इसलिए कि स्‍वाद, शब्‍द, संवाद, संबंधों की एक दुनिया चट् पहुंच में उतर आती है, महानगरीय जीवन में जो अदृश्‍य व असंभव बना रहता है. दु:ख इसका कि चौतरफा रखरखाव व इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के गड्ढे दीखते हैं (ऐसा नहीं कि महानगर में नहीं दिखते, या नहीं हैं).. लेकिन छोटे शहर में, यहां-वहां घूमते हुए महसूस होता है जैसे प्रशासकीय प्रबंधन के ढेरों ऐसे पहलू हैं, जिनका कोई देखवैया नहीं है, जहां, बड़े शहरों के बरक्‍स बहुत-बहुत ज़्यादा मात्रा में, लगता है मानो सर्वसामान्‍य बेहाली-बदहाली के भांवरों में भटकने को छोड़ दिये गए हों, और उनके जीवन में किसी बेहतरी के आने-लाने की बात, बदलता समय व उसका नियंता प्रशासन भूल गए हों!

एक चिरकुट पुराने कलाकार परिचित हैं (मित्र नहीं कहूंगा, क्‍योंकि उम्र में मुझसे बड़े हैं, चिरकुटई में तो हैं ही!).. सफ़ेद काग़ज़ पर इंडियन इंक से चिचरियां खींचकर मुग्‍ध-मदन बने रहते हैं. माया के केंद्र में विचरते हुए विस्‍तारण का कभी मोह सालता है तो प्रगतिशील लोरियों पर भी फिसल आते हैं.. मुक्तिबोध और शागाल की छेड़ने, व पीछे-पीछे अपनी छेरने लगते हैं.. इधर दो दिनों पहले फिर उनकी फिसलन से साक्षात हुआ तो मन में यह एक शेरनुमा चीज़ निकल आयी, आप भी नोश फ़रमायें:
प्रगतिशीलता उद्यम है, लगे रहें,
क्‍योंकि अवसरवादिता में दम है.
पता नहीं क्‍या है कि यह विशिष्‍टता भी, इस शक्‍ल में, छोटे शहरों में ही दिखती है. बच्‍चे को चुपवाते हुए, सड़क पर, ठेले पर तरकारी की खरीदारी करते हुए यह विशिष्‍ट साढ़े तीन से सवा चार फुटवाली एक नस्‍ल मिलती है, जिसकी ऊंचाई मेरे लिए गहरा नस्‍ली रहस्‍य है. अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग लोगों की बातें सुनते हुए मैंने कुछ थियरीज़ बनाये हैं, मगर इस चार फुटिया मीनार के माथे और आंखों में जब कभी कोई हंसी देखता हूं, मेरी सारी थियरीज़ फेल हो जाती हैं!

चलते-चलते की ठेलमठेली में यह एक बिम्‍ब:

भीड़ के अनवरत के गजर-मजर में शहर खाली, इतना सूनसान क्‍यों लगता है? फर्लांग, मीटर कितने तो किलोमीटर गुज़र जाते हैं, एक अदद सुकूनदेह चेहरा नज़र नहीं आता. कहां गयी हैं अच्‍छी, नेक़, भलमनई, संवेदनशील लड़कियां? किस देवता की श्रद्धा में किस मंदिर लुकायी पड़ी हैं, किस रिक्‍शे किस सड़क हैं गुज़र रहीं? कौन सीढ़ी उतर रहीं किस छत पर खड़ी, नया ज्ञानोदय के ज्ञानदान से आगे, किस उलझाव से मुंहजोरी कर रही हैं, मुंह में बड़े-बड़े गोलगप्‍पे भर रही हैं? पता नहीं कभी कितना भर तो सोचती हैं, और जब सोचती हैं तो क्‍या सोचती हैं छोटे शहर की अच्‍छी, नेक़, भलमनई, संवेदनशील लड़कियां?

एक यह भी:
परमोद जी छूट आये बरेली से
तेल जैसे भर भहर आया तेली से!